गुरुवार, 7 सितंबर 2017

मै लिखता हूँ कोई गीत


रंगनाथ द्विवेदी। जौनपुर (उत्तर-प्रदेश)।
जब बेचैन कर देता है------------ मेरे अंदर का मरुस्थल मुझको, तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत। जब------------ शब्द के होंठ पे चुभती है कोई नागफनी, तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत। जब पथ की रेत पे-----------
चलता जाता हूँ दूर पथिक सा और फूट जाते है पाँव के छाले, तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत। जब------------ बहुत सन्नाटा मेरे भीतर का, उधेड़ता है मुझको--------- तब मै लिखने बैठता हूँ कोई गीत। बोता हूँ रेत पे कुछ शब्द, पर कटिले वृक्ष के विरवे ही पनपते है, उन्ही वृक्षो की------------ खरोंच जब आ जाती है बन के पीर, तब मै लिखता हूँ कोई गीत।

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