बुधवार, 13 सितंबर 2017

गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये



रंगनाथ द्विवेदी।
शर्मिंदा हूं----------------
सुनूंगा घंटो कल किसी गोष्ठी में, उनसे मै हिन्दी की पीड़ा, जो खुद अपने गाँव मे, शहर की अय्याशी के लिये-------- अपने पनघट की हिन्दी छोड़ आये।

गंभीर साँसे भर, नकली किरदार से अपने, भर भराई आवाज से अपने, गाँव की एक-एक रेखा खिचेंगे, जो खुद अपने बुढ़े बाप के दो जोड़ी बैल, और चलती हुई पुरवट की हिन्दी छोड़ आये।
फिर गोष्ठी खत्म होगी, किसी एक बड़े वक्ता की पीठ थपथपा, एक-एक कर इस सभागार से निकल जायेंगे, हिन्दी के ये मूर्धन्य चिंतक, फिर अगले वर्ष हिन्दी दिवस मनायेंगे,
ये हिन्दी के मुज़ाहिर है एै,रंग--------- जो शौक से गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये।

@@@आप सभी को हिन्दी दिवस की ढ़ेर सारी बधाई।


रंगनाथ द्विवेदी का रचना संसार अलविदा प्रद्युम्न - शिक्षा के फैंसी रेस्टोरेंट के तिलिस्म में फंसे अनगिनत अभिवावक

जिनपिंग - हम ढाई मोर्चे पर तैयार हैं

आइये हम लंठों को पास करते हैं

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