सोमवार, 7 अगस्त 2017

निर्णय लो दीदी ? ( ओमकार भैया को याद करते हुए )



                              happy  raksha bandhn , कार्ड्स मिठाइयाँ और चॉकलेट के डिब्बों से सजे बाजारों के  बीच कुछ दबी हुई सिसकियाँ भी हैं | ये उन बहनों  की  हैं जिनकी आँखें राखी से  सजी दुकानों को देखते ही डबडबा जाती  हैं   और आनायास  ही मुँह  फेर  लेती हैं | ये वो अभागी  बहनें  हैं जिन्होंने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर अपने भाई को खो दिया    है | भाई - बहन का यह अटूट बंधन ईश्वर की इच्छा के आगे अचानक से टूट कर बिखर गया | अफ़सोस उन बहनों में इस बार से मैं भी शामिल हूँ | भाई , जो भाई तो होता ही है पुत्र , मित्र और पिता की भूमिका भी समय समय पर निभाता है | इतने सारे रिश्तों को एक साथ खोकर खोकर मन का आकाश बिलकुल रिक्त हो जाता है | यह पीड़ा न कहते बनती है न सहते |




लोग कहते हैं की भाई बहन का रिश्ता अटूट होता है | ये जन्म - जन्मांतर का होता है | ये जानते हुए भी की  ओमकार भैया की कलाई पर राखी बाँधने और उनके मुँह में मिठाई का बड़ा सा टुकड़ा रखने का सुख अब मुझे नहीं मिलेगा मैं बड़ों के कहे अनुसार पानी के घड़े पर राखी बाँध देती हूँ | जल जो हमेशा प्रवाहित होता रहता है , बिलकुल आत्मा की तरह जो रूप और स्वरुप बदलती है परन्तु स्वयं अमर हैं | राखी बांधते समय आँखों में भी जल भर जाता है | दृष्टि धुंधली हो जाती है | आँखे आकाश की तरफ उठ जाती हैं और पूँछती हैं..."भैया आप कहाँ हैं ?"

                                                       मैं जानती हूँ की बादलों की तरह उमड़ते - घुमड़ते मन के बीच में अगर ओमकार भैया के ऊपर कुछ लिखती हूँ तो आँसुओं का रुकना मुश्किल है , नहीं लिखती हूँ तो यह दवाब सहना मुश्किल है | 16 फरवरी को ओमकार भैया को हम सब से छीन ले जाने वाली मृत्यु उनकी स्मृतियों को नहीं छीन सकीं बल्कि वो और घनीभूत हो गयी | तमाम स्मृतियों में से एक स्मृति आप सब के साथ शेयर कर रही हूँ | 
                                                                        बात अटूट बंधन के समय की है |    कहते हैं  बहन छोटी हो या बड़ी ममतामयी ही होती है | और भाई छोटा हो या बड़ा , बड़ा ही होता है | 


बचपन से ही स्वाभाव कुछ ऐसा पड़ा था की अपनी ख़ुशी के आगे दूसरों की ख़ुशी को रख देती | अपने निर्णय के आगे दूसरों के निर्णय को | उम्र के साथ यह दोष और गहराता गया | हर किसी के काम के लिए मेरा जवाब हां ही होता | जैसे मेरा अपना जीवन अपना समय है ही नहीं | मैं व्यस्त से व्यस्ततम होती चली जा रही थी | कई बार हालत यह हो जाती की काम के दवाब में  घडी की सुइंयों के कांटे ऐसे बढ़ते जैसे घंटे नहीं सिर्फ सेकंड की ही सुइयां हों | काम के दवाब में कई बार सब से छुप कर रोती भी पर आँसूं पोंछ कर फिर से काम करना मुझे किसी का ना कहने से ज्यादा आसान लगता |

                                       भैया हमेशा कहा करते की दीदी हर किसी को हाँ मत कहा करो | अपने निर्णय खुद लिया करो | पर मैं थी की बदलने का नाम ही नहीं लेती | शायद ये मेरी कम्फर्ट ज़ोन बन गयी थी जिससे बाहर आने का मैं साहस ही नहीं कर पा रही थी | बात थी अटूट बंधन के slogan की | मैंने " बदलें विचार , बदलें दुनिया " slogan रखा | भैया ने भी कुछ slogan सुझाए थे | मुझे अपना ही slogan सही लग रहा था | पर अपनी आदत से मजबूर मैंने भैया से कहा ," भैया , जो आप को ठीक लगे | वही रख  लेते हैं | भैया बोले ," दीदी आज कवर पेज फाइनल होना है , शाम तक और सोंच लीजिये | मैंने हां कह दिया |


शाम को भैया का फोन आया ," दीदी क्या slogan रखे | मैंने कहा ," भैया जो आप को पसंद हो , सब ठीक हैं | दीदी एक बताइये , भैया का स्वर थोडा कठोर था | सब ठीक हैं भैया मेरा जवाब पूर्ववत था | भैया थोडा तेज स्वर में बोले ," दीदी , निर्णय लीजिये , नहीं तो आज कवर पेज मैं फाइनल नहीं करूँगा | आगे एक हफ्ते की छुट्टी है | मैगज़ीन लेट हो जायेगी | फिर भी ये निर्णय आपको ही लेना है | निर्णय लो दीदी |


मैंने मैगजीन का लेट होना सोंच कर तुरंत कहा ," भैया बदलें विचार - बदलें दुनिया ' ही बेस्ट है | मैगजीन छपने चली गयी | लोगों ने slogan बहुत पसंद किया | बाद में भैया ने कहा ," दीदी

जीवन अनिश्चिताओं से भरा पड़ा है | ऐसे में हर कदम - कदम हमें निर्णय लेने पड़ते हैं | कुछ निर्णय इतने मामूली होते हैं की उन का हमारी आने वाली जिंदगी पर कोई असर नहीं पड़ता | पर कुछ निर्णय बड़े होते हैं | जो हमारे आने वाले समय को प्रभावित करते हैं | ऐसे समय में हमारे पास दो ही विकल्प होते हैं | या तो हम अपने मन की सुने | या दूसरों की राय का पालन करें | जब हम दूसरों की राय का अनुकरण करते हैं तब हम कहीं न कहीं यह मान कर चलते हैं की दूसरा हमसे ज्यादा जानता है | इसी कारण अपनी " गट फीलिंग " को नज़र अंदाज़ कर देते हैं | अनिश्चितताओं से भरे जीवन में कोई भी निर्णय फलदायी होगा या नहीं न हमारा न किसी और का सुझाया हुआ, ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता | गलतियों की सम्भावना दोनों में है | हम केवल आज वो निर्णय ले सकते हैं जो हमें आज सही लग रहे हैं , चाहे वो हमारे द्वारा सुझाये हुए हों या दूसरे के द्वारा परन्तु जरूरी नहीं है इससे वही परिणाम आये जो हम चाहते हैं | ऐसे में बेहतर है हम वो निर्णय लें जो हमारी अंतरात्मा कह रही है | अगर भविष्य में वो गलत भी साबित हुआ तो भी हम दूसरों पर आरोप मढ कर उनकी आलोचना करने से बच जायेंगे |


शायद जिंदगी का यह पहला बड़ा निर्णय था जहाँ मैंने इस बात की प्रवाह नहीं करी की इससे कहीं मेरे भाई की फीलिंग हर्ट तो नहीं होगी |की उसका सुझाया slogan मैंने स्वीकार  करने से इनकार कर दिया |  इसके तुरंत बाद दुसरा  निर्णय लिया' ना' कहने का | हर उस  जान पहचान वाले को जिन्होंने मेरे निजी समय की निजता की अवहेलना की थी | शुरू शुरू में सबको बहुत बुरा लगा | फिर सब अपनी सीमा समझने लगे | हां अब मैं बहुत खुश थी ,परिवार में सभी और  भैया भी , जिनके मैगजीन में लिए निर्णय अब मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ नकारने   लगी थी  |



आज भैया नहीं है | अक्सर परिस्तिथियाँ ऐसी आ जाती है की आत्मविश्वास डगमगा जाता है | फिर जाने कहाँ से भैया की गुस्से में भरी तेज आवाज़ कानों में बजने लगती है ," निर्णय लो दीदी " और मैं तुरंत निर्णय  ले लेती हूँ | फिर आसमान की तरफ देखती हूँ , " भैया अब तो आप खुश हैं ना " 

वंदना बाजपेयी

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4 टिप्‍पणियां:

  1. आपके भैया ने बिल्कुल सही सुझाव दिया था कि हमें खुद के निर्णय खुद लेने की हिम्मत दिखानी होगी। सुंदर प्रस्तुति।

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  2. दीदी,आज आपकी ये पोस्ट पढ़कर वह काली रात याद आ गई जब 20 वर्ष की उम्र में मैंने अपने से दो वर्ष छोटे भाई को खो दिया था। बहुत हिम्मत करने पर भी उस घटना को नहीं लिख पाती। अब शायद कभी लिख पाऊँ। आज भी पहली राखी तो उसी को बाँधती हूँ,पानी के कलश को, उसकी फोटो के सामने। मन भर आया है।

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    1. जी मीना जी , बहुत तकलीफदायक हैं ये यादें ... वंदना बाजपेयी

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