शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

सक्सेस के लिए जरूरी है हौसलों की उड़ान



विपरीत परिस्तिथियों में भी पा सकते हैं सफलता 

कु. इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
व्याख्याता (कंप्यूटर.साइंस)
शा.स्नातकोत्तर महाविद्यालय,नरसिंहपुर (म.प्र.)
कुछ भी नहीं
इस दुनिया में
'असंभव'
...
बस,
एक अवरोध का
'अ' ही तो हटाना हैं
... 
लो जी बन गया  
'संभव' ।।


हम अक्सर अपने जीवन में तब असफल नहीं होते जब किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के अपने अभियान में विफ़ल हो जाते हैं बल्कि सही मायनों में हार वह हैं जब हम भरपूर प्रयास और जी-तोड़ मेहनत करने के भी बाद मिली पराजय को स्वीकार नही कर पाते और हताश होकर बैठ जाते हैं फिर कभी ख़ुद को तो तो कभी दूसरों को कोसते हुये या फिर फ़िज़ूल से बहानों में उलझकर कर्म करने की जगह अपने आपको किसी खोल या कंदरा में छुपाकर हक़ीकत से आँख मिलाने से कतराते हैं अमूमन होता यही हैं कि जब हम अपने देखे गये स्वपन या निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते तो अत्यधिक निराश हो जाते हैं जिससे प्रायः हमारा मनोबल टूट जाता हैं ऐसी स्थिति में हम हमेशा अपनी हार का ठीकरा किसी और के सर पर फोड़कर या थोपकर ख़ुद को निर्दोष साबित करने में जुट जाते हैं और किसी ऐसी वजह को तलाश लेते हैं जो हमें संतुष्ट कर सके कि दोष हमारा नहीं वरन किसी और का था इन्हीं परिस्थितियों में जन्म होता हैं कुछ तथाकथित आधारहीन से तर्कों का जिसे सामान्यतः 'लक' या ‘भाग्य’ का नाम दे दिया जाता हैं और फिर उसके उपर सारा इलज़ाम धरकर हम चिंतामुक्त हो आराम से सो जाते हैं मेरा ख्याल हैं जो भी लोग तकदीर, किस्मत, भाग्य, ज्योतिष, भविष्यवाणी या ऐसे ही किसी अन्य खोखले शब्दों का सहारा लेते हैं और अपनी नाकामियों को इनके सर पर मढ़ देते हैं दरअसल वो ख़ुद ही भीतर से पोले होते हैं तभी  उनको इस तरह की किसी बैशाखी की जरुरत पड़ती हैं क्योंकि इन्हें ख़ुद में तो कोई कमी नज़र आती नहीं न ही वे अपने दोष ही देखना चाहते हैं इसलिये ही इन अकर्मण्यों ने इस तरह के शब्दों को ईज़ाद किया हैं गर कभी सोचे तो समझ में आयेगा कि जीवन किसी अदृश्य हवाओं में लिखी इबारत या हथेलियों में खिंची लकीरों से नहीं बल्कि हमारे चलने और कर्म करने से आगे बढ़ता हैं    

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क्या हैं भाग्य ???
...
मन का हो तो
कहते उसे 'सौभाग्य'
...
मन का न हो तो
कहते उसे 'दुर्भाग्य'  
...
ये सब हमारे ही
गढ़े हुये शब्द हैं जनाब
जीवन मिलता एक बार ही
तो कहो 'अहोभाग्य'
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जीवन को सुख-दुःख, हार-जीत, गम और ख़ुशी का सम्मिश्रण कहा गया हैं इसलिये इसमें इंद्रधनुष की तरह भावनाओं का हर एक रंग मिलता हैं जो हमें समय के साथ अलग-अलग अहसास देकर एकरसता से उबरता हैं और जीने की उमंग भी देता हैं ऐसे में जब ख़ुशी के बाद गम या जीत के बाद हार मिल जाये तो घबराना नहीं चाहिये बल्कि नकारात्मक परिस्थितियों से भी सीख लेना चाहिये जो सिर्फ हमें निराश ही नहीं करती बल्कि कोई सीख भी देती हैं जिसे यदि हम समझ जाये तो उसी हार से जीत का रास्ता भी बना सकते हैं । ये सिर्फ हमारी सोच का ही नतीजा होता हैं जो हम विपरीत माहौल में हथियार डाल देते हैं जबकि यदि गंभीरता से सोचे और मनन करे तो पायेंगे कि इनमें ही जीत के सुप्त बीज पड़े होते हैं जिन्हें केवल अपनी मनोनुकूल अवस्था न होने के कारण हम नजरअंदाज़ कर देते हैं जबकि यदि हम इन्हें खोजकर परिश्रम से सींचे तो वो हमारे सपने के साकार वृक्ष में परिणित होकर हमें अपनी सुखद छाया में आश्रय दे सकते हैं । जब किसी जीतने वाले की कहानी पढ़ते या सुनते हैं तो पता चलता हैं कि उनमें और हममें क्या अंतर हैं क्यों वो सर्वोच्च और हम निचले पायदान पर बैठे हैं और किस तरह उन्होंने इस तरह के किसी स्थिति के आने पर हार मानकर बैठने की बजाय अपनी पराजय को जय में बदला । ये सही हैं कि  ऐसे हालात में बहुत कम ही लोग होते हैं जो उठ पाते हैं और फिर उन ऊंचाइयों तक पहुँच पाते हैं जिसका स्वपन उन्होंने देखा था बाक़ी तो सब किसी न किसी न किसी  बहाने की दीवार खड़ी कर उसके पीछे अपने आपको छुपा लेता हैं और अपनी विफलता का सही आकलन करने की बजाय पलायन का रास्ता चुन लेते हैं

असफ़लता के हौसलों की उड़ान :
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अक्सर लोग अपनी चाँद सी दूर नज़र आने वाली मंजिल को पाने की खातिर उसकी राह में आने वाली रुकावटों से घबरा जाते हैं और मिलने वाली पराजय का आकलन करने की बजाय उसे ही अपना मुस्तकबिल मान वही थम जाते हैं लेकिन जीत का चाँद तो उसका ही होता हैं ना जो उसके लिए सबसे लड़ जाते हैं ।  

हार में छिपी हैं
उसे जीतने की राह ।
देख मनन कर के
फिर ले परचम लहरा ।।

सुनने में बड़ा अविश्वसनीय लगता हैं लेकिन ऐसा बहुत लोगों की ज़िन्दगी में हुआ हैं जब वो अपने उद्देश्य को पूरा करने में असफ़ल हुये पर उन्होंने हार नहीं मानी और जिस वजह से सफ़लता उनसे दूर जा रही थी उसका मार्ग भी उन्होंने अपनी उसी असफलता से खोजा आज जिस रौशनी में हम अपना जीवन गुजारते हैं जिस कृत्रिम प्रकाश से हम एक क्षण में अंधकार को दिन में बदल लाते हैं वो जिस शख्स की देन हैं उसे अपने जीवनकाल में इसे बनाने के लिए एक लंबा समय और अनवरत प्रयोग करने पड़े तब जाकर वो एक सही विधि खोज पाये जिससे उसे पता चला कि वो अब तक जिन तरीकों से इसे ईज़ाद करने की कोशिश कर रही था दरअसल वो सभी युक्तियाँ गलत थी लेकिन अपनी सफ्लता श्रेय भी उसने उन्हीं सारे असफ़ल प्रयोगों को दिया जी हाँ, मैं उसी महान वैज्ञानिक ‘थॉमस अल्वा एडिसन’ की बात कर रही हूँ जिसने हम सबको बल्ब’ के रूप में ही एक अनुपम सौगात नहीं दी जिसकी बदौलत हमने रात को दिन में बदल पाने में सक्षम हुये बल्कि अपनी असीमित कल्पनाशक्ति से एक हजार से अभी अधिक अविष्कारों को अपने नाम किया लेकिन ये सब कोई एक दिन में या एक बार में ही संभव नहीं हुआ बल्कि इसके लिए उन्हें कई साल तक अनगिनत तरीके अपनाने पड़े जिसका उपयोग कर उन्होंने लगभग दस हजार से अधिक प्रयोग किये जो एक के बाद एक लगातार फेल होते रहे और जब किसी ने उनसे हंसकर कहा कि आपने इतने सारे प्रयोग किये परंतु तब भी आप अपनी इच्छित वस्तु नहीं बना पाये आपकी तो सारी मेहनत और इतना समय बर्बाद हो गया तो उन्होंने चिढ़ने या गुस्सा होने की जगह उसे उतनी ही विनम्रता से जवाब दिया कि इन सारे तरीकों ने उसे ये बताया कि इनसे बल्ब का निर्माण नहीं किया जा सकता कभी सोचकर देखें कि उन्होंने कितनी गहरी बात कही कि यदि हमारा प्रयास विफ़ल हो जाये तो हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि अब कुछ नहीं हो सकता और ये काम तो मेरे बस का नहीं बल्कि ये सोचना चाहिये कि अब तक हम जिस तरह से उसे कर रहे थे वो तरीका सही नहीं था और हमें पुनः उसके दोहराव से बचना हैं क्योंकि हमारी इस असफ़लता ने हमें ये सबक दिया कि जिस तरह से हम कोशिश कर रहे हैं वो उस मंजिल तक पहुँचने के लिये अनुपयुक्त हैं और बस आपकी सारी निराशा एक नई ऊर्जा से सराबोर हो जायेगी । बस, यही फ़र्क होता हैं हारने और जीतने वाले में कि सब जहाँ हार मान लेते ‘विजेता’ वही से जीत खोज लेते तो अब जब भी किसी रणनीति  के अनुसार चलने पर भी जीत हासिल न हो तो उसमें परिवर्तन कर नई तरह से एक नई शुरुआत करें तब तक जब तक कि अपने लक्ष्य को नहीं पा जाते । इसी तरह जब कभी हम ‘अब्राहम लिंकन’ की जीवनी पढ़े तो पाते हैं कि अपने पुरे जीवन में उन्हें अनगिनत असफलताओं और निराश के एक बड़े दौर का सामना करना पड़ा पर कोई भी उनके हौंसलों को न तोड़ सका । सिर्फ एक दो नहीं आप अपने आस-पास या इतिहास में तलाशेंगे तो असंख्य कहानियां आपको मिलेगी जिन्होंने अपने हौंसलों की टक्कर से नामुमकिन सी दिखने वाली असफ़लता की दीवार को तोड़कर सफ़लता को आज़ाद किया उन्हें वो तश्तरी में परोसकर नहीं दी गई ।

अक्षमता के हौंसलों की उड़ान :
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अमूमन हम अपने किसी शारीरिक दोष की वजह से भी ख़ुद का सही आकलन नहीं कर पाते जबकि वही ऐसे भी लोग हुये जिन्होंने अपनी हर कमी को अनदेखा कर सिर्फ और सिर्फ अपने लक्ष्य पर ही अपना निशाना साधा और ऐसा कि फिर कोई उनके हौंसलों के तीर को उनकी मंजिल के ध्येय से भटका नहीं पाया ।

गर,
मन हो सक्षम
समझे न ख़ुद को कम
भले ही हो शरीर अक्षम ।।

कई तो ऐसे भी लोग हैं इस दुनिया में हुयें जो पूर्ण रूप से स्वस्थ्य और हर तरह से सक्षम होने के बाद भी अपना मनचाहा मुकाम नहीं पाते और दूसरों पर दोषारोपण कर खुद को बड़ा तीसमारखां समझते हैं जबकि इसी दुनिया में ऐसे भी लोग हुयें जिन्होंने किसी भी बाधा या अवरोध को अपने सपनों की मंजिल के रास्ते की रुकावट नहीं माना उन्होंने भले ही अपने रास्तों में परिवर्तन किया हो मगर किसी भी हाल में अपने ध्येय से समझौता नहीं किया । आज भी जब हम सब ‘हेलेन एडम्स केलर’ की कहानी पढ़ते हैं तो नतमस्तक हो जाते हैं कि एक ऐसी भी महिला हुई इस दुनिया में जिसकी सभी ज्ञानेन्द्रियों का होना या न होना बराबर था फिर भी उसने हार नहीं मानी बल्कि विश्व के समस्त निराशवादी लोगों के बीच अपनी अनोखी हौसलों से परिपूर्ण जीवन गाथा के रूप में एक ऐसा अविस्मरणीय प्रेरणा से भरपूर अद्भुत कीर्तिमान स्थापित कर के गयी कि शारीरिक रूप से पूर्ण व्यक्ति भी खुद को अपंग समझे साथ ही ये सिद्द किया कि मन के हारे हार हैं मन के जीते जीत । वो जन्म से ऐसी नहीं थी बचपन की एक गंभीर बीमारी ने उन्हें एक साथ अपनी सभी इंद्रियों से मरहूम कर दिया था और वो एक ही पल में एक साथ अंधी, गूंगी, बहरी हो गई लेकिन ये क्या उनके भीतर सहस्त्र गुनी ज्ञान की रौशनी जाग्रत हो गई, अंतर्द्रष्टि अदृश्य को देखने लग गई और आत्मा सूक्ष्म-से-सूक्ष्म से ध्वनि का श्रवण करने लगी । ये सब संभव हुआ उस सकारात्मक सोच से जिसने उन्हें निराशा के घोर अंधकार में भटकाने की जगह संभावनाओं के अनंत दरीचे खोल दिये जिससे आती कर्मठ ऊर्जा ने उनके रोये-रोये में नवीन आशा का संचार कर दिया और उन्होंने लोगों की बात को समझने का एक निराला ही ढंग ख़ोज लिया वे बोलने वाले के हिलते होंठों का स्पर्श कर उसे समझने की कोशिश करती और बहुत जल्द उन्होंने स्पर्श की इस तकनीक में महारत हासिल कर ली न सिर्फ पढ़ना बल्कि बोलना भी सीख लिया और अपने अथक प्रयासों से वो इस दुनिया की पहली बधिर-दृष्टिहीन स्नातक बन गई साथ ही कई ग्रंथ और आलेख लिख लोगों के लिये एक असाधारण प्रेरणा स्तंभ बन गई समय की शिला पर अपने अमिट निशान छोड़ गई जो आज भी हम सबको घोर अवसाद के पलों में ये सोचने मजबूर करते हैं कि विकलांगता शारीर की नहीं मन की होती हैं जब इंसान की सोचने-समझने और कुछ करने की इच्छाशक्ति दम  तोड़ देती हैं

आश्चर्यजनक कि जहाँ लोग सभी शारीरिक सक्षमता के बावजूद भी कुछ करना नहीं चाहते वहां ऐसे भी लोग हैं जो बिना हाथ बिना पांव के भी हिमालय पर चढ़ जाते हैं विचित्र किंतु सत्य ऐसे दृढ इच्छाशक्ति से भरपूर अनेकों लोगों इस धरा पर हुयें हैं जिनकीं हौंसलों की उड़ान के लिए आसमान भी कम पड़ गया । ऐसे में गर, कोई अपनी शारीरिक अक्षमता को आड़ बनाकर खुद की नाकाबिलियत को स्वीकार नहीं भी करना चाहे तो ये साफ़ ज़ाहिर हैं कि उसके हौंसलों में कोई कमी हैं उसके इरादे ही कमजोर हैं वरना उड़ने वाले तो पिंजरा लेकर भी उड़ जाते हैं । ऐसे ही एक और अद्वितीय हस्ती की कहानी मुझे याद आ रही हैं जिसके हौंसलों ने उसे बिना पांव के ही अपनी उस अदम्य इच्छा को पूरा करने का साहस दिया जिसके लिए पैर निहायत जरूरी समझे जाते हैं । भरतनाट्यम की एक बेजोड़ नृत्यांगना ‘सुधा चंद्रन’ जिसने बालपन से ही अपने आपको नृत्य कला के प्रति समर्पित कर दिया था और युवा होते-होते वो इस क्षेत्र की एक उम्दा कलाकारा बना गई थी और लगभग १९८१ की बात हैं जब वो मंच पर अपनी थिरकन से दर्शकों को  मंत्रमुग्ध कर देने का ख्याल लिये एक कार्यक्रम में शिरकत करने जा रही थी कि अचानक हुयें रोड एक्सीडेंट के माध्यम से क्रूर नियति ने उनसे उनका वो पांव छीन लिया जिसके दम पर उन्होंने ने ना जाने कितने समारोह में अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन के शोहरत के झंडे गाड़े थे और आज वो अस्पताल के एक पलंग पर लाचार पड़ी थी । इस हादसे ने भले ही उनसे उनका एक पांव छीन लिया हो मगर वो वो उनके साहस और मनोबल को छू भी न सकी और उनके अंदर की बेचैन तड़फती ख्वाहिश ने वापस अपनी दुनिया में लौटने को तरसती एक नर्तकी को कृत्रिम पैर के रूप में एक अनमोल सौगात दी और सिर्फ तीन साल के भीतर ही अपंग-अपाहिज हो चुकी लड़की फिर से न सिर्फ नाच उठी बल्कि अपने जीवन पर बनने वाली फिल्म में खुद अभिनय कर एक अभिनेत्री का ख़िताब भी हासिल करने वाली अनुकरणीय मिसाल बन गई । दैहिक अक्षमता के बावजूद भी जब कोई अपना ध्येय पा सकता हैं तो पूर्ण सक्षम को तो कुछ सोचना ही नहीं चाहिये बस अपने चारों तरफ नज़र दौड़ाये और देखे कि ये किस तरह बिना किसी का सहारा लिये ये अपने आपको सिद्ध करते हैं ।

नापसंदगी के हौसलों की उड़ान :
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यूँ तो हर कोई समझता हैं कि वो अपने सपनों को पूरा करने के लिए जरूरी हर एक काबिलियत से परिपूर्ण हैं लेकिन जब किसी के द्वारा उसको अस्वीकार किया जाता हैं तो उसका आत्मविश्वास लड़खड़ा जाता हैं ऐसे में वही इस रणक्षेत्र में जीत पाता हैं जो मैदान में आने वाले हर एक शत्रु को मार गिराता हैं ।

आज जिसे हम नकारते
देख उसके हौसलों की उड़ान
फिर उसको ही अपनाते ।।

यदि आपको लगातार किसी की अवहेलना या बहुत से लोगों के द्वारा नापसंद किये जाने या नकारे जाने का दंश भी झेलना पड़े तो घबराये नहीं क्योंकि ऐसे अनगिनत महान लोग हुयें हैं जिन्हें सम्पूर्ण काबिलियत होने के  बावजूद भी अपने शुरुआती दौर में हर कई लोगों से अपमानित हों पड़ा लेकिन ये उनका हौंसला ही था जो दबा नहीं, डरा नहीं, झुका नहीं और जब उसने अपनी छलांग लगाई तो वही जमात उनके कदमों को छूने दौड़ी चली आई । आज जिन्हें हम ‘भारत कोकिला’ देश का स्वर मान गर्व करते हैं जिसके बूते पर हम विदेशों में भी जाने जाते हैं वही स्वर साधिका ‘लता मंगेशकर’ भी कभी अपनी उसी आवाज़ के लिये नकार दी गई थी जो आज उनकी अपनी ही नहीं हम सबकी और इस वतन की पहचान हैं । शुरू में सबका मानना था ये आवाज़ बहुत पतली हैं और उनके गायन में भी उनकी मातृभाषा ‘मराठी’ का लहज़ा होने से वो उतना प्रभावित नहीं करता पर ये सब सुनकर उन्होंने अपने कदमों को पीछे ले जाने की जगह उन सब कमियों को दूर कर संगीत की दुनिया में अपने नाम का वो परचम लहराया कि हर एक पुरुस्कार यहाँ तक कि देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ उनकी झोली में चला आया । इसलिये गर आपके और आपके लक्ष्य के बीच में कोई इस तरह का भी अवरोध आ रहा हैं तो परेशां न हो क्योंकि यहाँ तो लोगों ने भगवान के अवतार लेने पर उन पर भी उँगलियाँ उठाई तो फिर आप तो महज़ माटी के पुतले हैं ।  

इसी तरह अब जरुर ‘अमिताभ बच्चन’ को इस सदी का महानतम आभिनेता मानकर ‘स्टार ऑफ़ द मिलेनियम’ का दर्जा दे दिया गया हैं लेकिन कभी वो दौर भी था कि हर निर्माता-निर्देशक इनसे कतराता था कोई भी इन्हें अपनी फिल्म में नहीं लेना चाहता था यहाँ तक कि हर कोई इनकी लंबाई और आवाज़ की बुराई करता था और लगातार होती फ्लॉप फिल्मों ने उन्हें लोगों की नजरों में मनहूस भी साबित कर दिया था । उनके जीवन में भी निराशा का एक क्षणिक पल आया और उन्होंने मुंबई नगरी छोडकर अपने घर लौटने का निश्चय कर लिया कि तभी उन्हें रेलवे स्टेशन में ही अपनी सभी पिछली नाकामियों को मिटाकर कामयाबी की एक नई इबारत लिखने का अवसर मिला जिसे उन्होंने उसी तरह लपका जिस तरह कोई प्यासा पानी की एक बूंद को झपटता हैं । फिर उन्होंने अपने आपको पूरी तरह उसमें इस कदर झोंका कि पुरानी छवि को मिटाकर एक नवीन ‘एंग्री यंग मैन’ की इमेज को गढ़ा जिसके बाद उन्होंने वो दौर भी देखा जब हर एक फिल्मकार उन्हें अपनी मूवी में लेना चाहता था और जिस शख्सियत में उन्हें सिवाय अवगुण के कुछ भी नज़र नहीं आता था उसे ही एकदम मुकम्मल मान उसकी तारीफों के पुल बांधता था । उनकी प्रारंभिक असफलता और निराशा की कहानी बताती हैं कि सफ़लता से किस तरह तस्वीर बदल जाती हैं जो लोग आपसे कतराते हैं वही आपके दीवाने हो जाते हैं जबकि पहले भी आप वही थे अब भी वही हैं लेकिन उस वक़्त आप पर असफ़ल की मोहर लगी थी इसलिये सबको आप में खामियां नज़र आ रही थी लेकिन जैसे ही आपको सफ़लता की पारसमणि ने छुआ आप एकाएक ही स्वर्ण की तरह न सिर्फ निखर गये बल्कि उसकी तरह बहुमूल्य भी हो गये ।

ये कहानियां बताती हैं कि कमी कोई नहीं न शरीर न साधनों न प्रकृति या भगवान की जो भी हैं वो सिर्फ हमारी अपनी इच्छाशक्ति और कुछ न करने की कमजोरियों की हैं । हर एक व्यक्ति समान प्रतिभाशक्ति और शारीरिक क्षमता के साथ भले ही जन्म नहीं लेता मगर, जो भी व्यक्ति अपने जीवन में कुछ भी अनोखा करना चाहता हैं वो उसके लिये आवशयक तमाम योग्यताएं अपने दमखम पर अर्जित कर अपना निश्चित ध्येय प्राप्त कर ही लेता हैं फिर चाहे मार्ग में कितनी भी बाधायें क्यों न आये । हम जब खुद के ही विकास का इतिहास पढ़ते हैं तो पाते हैं कि कभी हम लोग आज की तरह सभ्य ज्ञानी और इन सभी सुविधाओं से युक्त समाज में नहीं रहते थे लेकिन आज जो कुछ भी बदलाव आया हैं वो सब अपने आप नहीं हुआ हैं । हमने ही अपनी जिज्ञासाओं और जानने की कोशिशों से समाज और तमाम जरुरी चीजों का अविष्कार किया हम सबने पढ़ा हैं कि कभी हम लोग जंगल में रहने वाले निरे जानवर थे जिसे कुछ भी न पता था और आज आधुनिक तकनीकी युग में सर्वसुविधाभोगी संपन्न सुशिक्षित में तब्दील हो गये तो एकदम अकर्मण्य बन सब कुछ भूल गये । ईश्वर ने हमें कुदरत के वरदान से बख्शा था बाकी सब हमने ही निर्माण किया लेकिन सृजन करने वालों की तादाद कम और उपभोग करने वालों की अधिक हैं इसलिये भी हमारे देश की तरक्की रुकी हुई हैं ।    

बाँध लो
कर्मों की ड़ोर
जीवन की पतंग से
थाम लो कसकर छोर
फिर जाने दो उसे उपर की और
देखना वो ढूंढ ही लेगी मंजिल की ठौर ।।

नये साल के इस सुअवसर पर इससे बढ़कर शुभ-शुरुआत और क्या होगी कि आप खुद को सकारात्मक विचारों से भर ले और कुछ नये ठोस इरादों और दृढ संकल्पों से इसका स्वागत करें फिर चाहे आपके इन तयशुदा ख्वाबों के मध्य कितने भी रोड़े आये आप सबको पार करते जाये । वैसे तो हर साल ही हम उसके आते ही न जाने कितने सारे नये-नये संकल्प लेते हैं लेकिन धीरे-धीरे एक-एक कर सारे दिन खत्म हो जाते हैं पर हम शायद ही किसी को पूरा कर पाते हैं क्योंकि उनको साकार करने हमारे हौंसलों का ईधन कम पड़ जाता हैं । जब भी आप अपने किसी सपने को साकार करना चाहे तो इन सब बातों का ध्यान रखें कि जो भी आपके साथ हो रहा हैं वो सिर्फ अकेले आपके साथ नहीं हो रहा न ही पहली बार ही ऐसा हुआ हैं न सिर्फ आप अकेले हैं जिसकी किस्मत खराब हैं या जिससे ईश्वर नाराज़ हैं ये तो महज़ अपनी नाकामयाबी को तुष्ट करने और खुद गलती को न मानने के चंद ऐसे तीर हैं जो हमारे बहानों के तरकश में पड़े ही रहते हैं और जिन्हें हम जब चाहे जहाँ भी चाहे चला देते हैं लेकिन अंदर हक़ीकत हम भी जानते हैं कि कमी कहीं हमारे ही हौसलों में रह गई हम ही ने हर मान ली या हमने ही अपनी विफलता को अपना भाग्य समझ लिया जबकि हमने पाया कि जिनके हौंसलों की परवाज़ बुलंद होती हैं वो कभी भी अपने परों को बंद कर अपनी उड़ान को रोकते नहीं बल्कि उसमें हौसलों की थोड़ी-सी जो कसर बाकी रह जाती हैं उसे मिला देते हैं । इसलिये गर हम भी ये कर पाये तो किसमें हिम्मत जो हमें रोक पाये बस इन सूत्रों को आजमाये और खुद को ऊंचाइयों पर खड़ा पाये ।


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खुल गई हैं
तीन सौ पैंसठ दिनों की
फिर एक नवीन कोरी किताब
अब आप जो भी चाहे लिखे जनाब
और मुस्कुराकर कहे नूतन वर्ष को आदाब...।।
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