गुरुवार, 17 अगस्त 2017

क्या आत्मा पूर्वजन्म के घनिष्ठ रिश्तों की तरफ खिंचती है ?


लेखिका – श्रीमती सरबानी सेनगुप्ता
जीवन भर दौड़ने भागने के बाद जब जीवन कि संध्या बेला में कुछ पल सुस्ताने का अवसर मिलता है तो न जाने क्यों मन पलट पलट कर पिछली स्मृतियों में से कुछ खोजने लगता है | ऐसी ही एक खोज आज कल मेरे दिमाग में चल रही है , जो मुझे विवश कर रही है यह सोचने को कि ईश्वर कि बनायीं इस सृष्टि में , जन्म जन्मांतर के खेल में कुछ कड़ियाँ ऐसी जरूर हैं जो हमें पिछले जन्मों के अस्तित्व पर सोचने पर विवश कर देती हैं |

बुधवार, 16 अगस्त 2017

फौजी की माँ


उत्पल शर्मा "पार्थ" 
राँची -झारखण्ड
वक़्त हो चला था परिवार वालों से विदा लेने का, छुट्टी ख़त्म हो गयी थी। घर से निकलने ही वाला था सहसा सिसकियों की आवाज से कदम रुक गए, मुड़ कर देखा तो बूढी माँ आँचल से अपने आंसुओं को पोछ रही थी। 

सूट की भूख


 सरबानी सेनगुप्ता  
आज जहाँ भी जाओ लेडीज सूट और कुर्तों का बोलबाला है | चाहे वो मॉल  हो या पटरी पर लगी दुकानें | सूट की भूख दिन को ही नहीं रात को भी औरतों को जगाये रखती है | यहाँ मैं अपने मोहल्ले का जिक्र कर रही हूँ |

हे श्याम सलोने



©किरण सिंह
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हे श्याम सलोने आओ जी 
अब तो तुम दरस दिखाओ जी 

राह निहारे यसुमति मैया 
तुम ठुमक ठुमक कर आओ जी 

आओ मधु वन में मुरलीधर
प्रीत की बंशी बजाओ जी

कोई तो हो जो सुन ले



कभी - कभी हमें एक तर्क पूर्ण दिमाग के जगह एक खूबसूरत दिल की जरूरत होती है जो हमारी बात सुन ले - अज्ञात 
                                 उफ़ !कितना बोलते हैं सब लोग , बक - बक , बक -बक | चरों तरफ शोर ही शोर | ये सच है की हम सब बहुत बोलते हैं | पर सुनते कितना हैं ?हम सुबह से शाम तक कितने लोगों से कितनी साड़ी बातें करते हैं | पर  कभी आपने गौर किया है की जब मन का दर्द किसी से बांटना चाहो तो केवल एक दो नाम ही होते हैं | उसमें से भी जरूरी नहीं की वो पूरी बात सुन ही लें | 

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस व् जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं



अद्भुत संयोग है की इस बार जन्माष्टमी व् स्वतंत्रता दिवस एक साथ मनाया जा रहा है | लीलाधर , नन्द नंदन योगेश्वर श्रीकृष्ण जिन्होंने जन्म के साथ ही परतंत्रता के खिलाफ युद्ध की शुरुआत कर दी थी | उन्होंने अपने जीवन पर्यंत उस समय प्रचलित अनेकों बन्धनों अनेकों कुरीतियों व् परम्पराओं को तोडा व् उनसे आज़ादी दिलवाई | आज ये अनुपम संयोग संकेत दे रहा है की भले ही सन १९४७ में हमें स्वतंत्रता मिल गयी हो पर आज़ादी की लड़ाई अभी बाकी है | ये लड़ाई किसी विदेशी आक्रांता के खिलाफ नहीं वरन अपने ही देश में व्याप्त भ्रष्टाचार , धर्मिक विद्वेष व् सामाजिक कुरीतियों के साथ हैं | जिनसे हमें स्वयं ही अपने - अपने स्तर पर लड़ना है और स्वतंत्र होना है |
आप सभी को स्वतंत्रता दिवस व् जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें

देश भक्ति के गीत




डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई, देहरादून, उत्तराखंड
जय गान करें
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भारत का जय गान करें
आओ हम अपने भारत की
नई तस्वीर गढ़ें
भारत का....
अपनी कीमत खुद पहचाने
हम क्या हैं खुद को भी जाने

पिजड़े से आजादी

यूँही नही मिली एै दोस्त-------------- गुलाम भारत के पिजड़े की चिड़ियाँ को आजादी। यूँही नही इसके पर फड़फड़ाये खुले आकाश----- बहुत तड़पी रोई पिजड़े मे इसके उड़ने की आजादी।

कान्हा तेरी प्रीत में - जन्माष्टमी के पावन पर्व पर डॉ . भारती वर्मा की कवितायें



कान्हा तेरी प्रीत में ~पढ़िए प्रभु श्रीकृष्ण को समर्पित डॉ . भारती वर्मा की कवितायें 


1--कान्हा
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कान्हा तेरी प्रीत में
हुई बावरी मैं
तेरे रंग में रंग कर
हुई साँवरी में 
भावे न अब कछु मोहे
तुझे देखती मैं
दिवस हो या रैन अब

सोमवार, 14 अगस्त 2017

गीता के कर्मयोग की काव्यात्मक व्याख्या


गीता का तीसरा अध्याय कर्म योग के नाम से भी जाना जाता है प्रस्तुत है गीता के  कर्मयोग  की सरल काव्यात्मक व्याख्या /geeta ke karmyog ki saral kaavyaatmak vyakhya 

श्रीमती एम .डी .त्रिपाठी ( कृष्णी राष्ट्रदेवी ) 

अर्जुन ने प्रभु से  कहा 
सुनिए करुणाधाम 
मम मन में संदेह अति 
निर्णय दें घनश्याम 

पन्द्रह अगस्त


15 अगस्त पर एक खूबसूरत कविता

---रंगनाथ द्विवेदी

अपनो के ही हाथो--------- सरसैंया पे पीड़ाओ के तीर से विंधा, भीष्म सा पड़ा है------पन्द्रह अगस्त।

क्या है स्वतंत्रता सही अर्थ :जरूरी है स्वतंत्रता, स्वछंदता, उच्श्रृंखलता की पुनर्व्याख्या




डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई, देहरादून, उत्तराखंड
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            स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? 
स्वतंत्रता का अर्थ वही है जो हम समझना चाहते हैं, जो अर्थ हम लेना चाहते हैं। यह केवल हम पर निर्भर है कि हम स्वतंत्रता,स्वाधीनता,स्वच्छंदता और उच्छ्रंखलता में अंतर करना सीखें।

दोस्त


यात्रा




वंदना बाजपेयी
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ये जीवन एक सफ़र ही तो है और हम सब यात्री 

जीवन की गाडी तेजी से आगे भागती जा रही है | खिड़की से देखती हूँ तो खेत खलिहान नहीं दिखते | दिखता है जिन्दगी का एक हिस्सा बड़ी तेजी से पीछे छूटता जा रहा | वो बचपन की गुडिया , बचपन के खिलौने कब के पीछे छूट गए , पीछे छूट गए वो चावल जो ससुराल में पहला कदम रखते ही बिखेर दिए थे द्वार पर , बच्चों की तोतली भाषा , स्कूल का पहला बैग , पहली सायकिल ... अरे - अरे सब कुछ पीछे छूट गया | घबरा कर खिड़की बंद करती हूँ | 

रविवार, 13 अगस्त 2017

‘‘स्वतंत्रता दिवस’’ पर विशेष लेख : भारत बनेगा फिर से विश्व गुरु


15 अगस्त ‘‘स्वतंत्रता दिवस’’ पर विशेष लेख

- डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

(1) हम लाये हैं तूफान से किश्ती निकाल के:-

भारत के लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी कुर्बानियाँ देकर ब्रिटिश शासन से 15 अगस्त 1947 को अपने देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराया था। तब से इस महान दिवस को भारत में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने देश की आजादी के लिए एक लम्बी और कठिन यात्रा तय की थी। देश को अन्यायपूर्ण अंग्रेजी साम्राज्य की गुलामी से आजाद कराने में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान तथा त्याग का मूल्य किसी भी कीमत पर नहीं चुकाया जा सकता।

आइये स्वतंत्रता दिवस पर संकल्प लें नए भारत के निर्माण का


15 अगस्त ‘‘स्वतंत्रता दिवस’’ पर विशेष लेख

- डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) हम सब मिलकर संकल्प लेते हैं, 2022 तक नए भारत के निर्माण का:-
            1942 में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने एक संकल्प लिया था, ‘भारत छोड़ोका और 1047 में वह महान संकल्प सिद्ध हुआ, भारत स्वतंत्र हुआ। हम सब मिलकर संकल्प लेते हैं, 2022 तक स्वच्छ, गरीबी मुक्त, भ्रष्टाचार मुक्त, आतंकवाद मुक्त, सम्प्रदायवाद मुक्त तथा जातिवाद मुक्त नए भारत के निर्माण का। भारत के लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी कुर्बानियाँ देकर ब्रिटिश शासन से 15 अगस्त 1947 को अपने देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराया था। तब से इस महान दिवस को भारत में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने देश की आजादी के लिए एक लम्बी और कठिन यात्रा तय की थी। देश को अन्यायपूर्ण अंग्रेजी साम्राज्य की गुलामी से आजाद कराने में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान तथा त्याग का मूल्य किसी भी कीमत पर नहीं चुकाया जा सकता।

कस्बे की लड़की से नदिया एक्सप्रेस तक - झूलन गोस्वामी, महिला क्रिकेटर

प्रस्तुति - मीना त्रिवेदी
संकलन - प्रदीप कुमार सिंह 
वह अपने इलाके की सबसे लंबी लड़की थीं। सड़क पर चलतीं, तो लोग पीछे मुड़कर जरूर देखते। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के छोटे से कस्बे चकदा में पली-बढ़ीं झूलन को बचपन में क्रिकेट का बुखार कुछ यंू चढ़ा कि बस वह जुनून बन गया। एयर इंडिया में नौकरी करने वाले पिता को क्रिकेट में खास दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि उन्होंने बेटी को कभी खेलने से नहीं रोका। मगर मां को उनका गली में लड़कों के संग गेंदबाजी करना बिल्कुल पसंद न था। बचपन में वह पड़ोस के लड़कों के साथ सड़क पर क्रिकेट खेला करती थीं उन दिनों वह बेहद धीमी गेंदबाजी करती थीं लिहाजा लड़के उनकी गंेद पर आसानी से चैके-छक्के जड़ देते थे। कई बार उनका मजाक भी बनाया जाता था। टीम के लड़के उन्हें चिढ़ाते हुए कहते-झुलन, तुम तो रहने ही दो। तुम गेंद फेंकोगी, तो हमारी टीम हार जाएगी।

नदी की धारा


डॉ० मधु त्रिवेदी
प्राचार्य
शान्ति निकेतन कॉलेज ऑफ बिज़नेस
मैनेजमेन्ट एण्ड कम्प्यूटर साइन्स आगरा।


जीवन संध्या में दोनों एक दूसरे के लिए नदी की धारा थे | 
जब एक बिस्तर में जिन्दगी की सांसे गिनता है तो दूसरा उसको सम्बल प्रदान करता है, जीवन की आस दिलाता है।दोनों जानते थे कि जीवन का अन्त निश्चित है, फिर भी जीवन की चाह दोनों में है। होती भी क्यों न हो, जीवन के आरम्भ से दोनों के लिए एक मित्र, सहपाठी और जीवनसाथी एवं बहुत कुछ थे। 

पवित्र ‘‘गीता’’ सभी को कर्तव्य एवं न्याय के मार्ग पर चलने की सीख देती है!



जन्माष्टमी पर्व  पर विशेष लेख /janmashtami par vishesh lekh 

- डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक, 
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

(1) पवित्र ‘‘गीता’’ हमें कर्तव्य एवं न्याय के मार्ग पर चलने की सीख देती है:-

श्रावण कृष्ण अष्टमी पर जन्माष्टमी का पावन त्यौहार बड़ी ही श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा की जेल में हुआ था। कर्षति आकर्षति इति कृष्णः।

कृष्ण की गीता और मैं


सत्या शर्मा 'कीर्ति '
और फिर न्याय की देवी के समक्ष वकिल साहिबा ने कहा --- गीता पर हाथ रख कर कसम खाइये...............
मैंने भी तत्क्षण हाथ रख खा ली कसम ।

पर क्या मैनें जाना कभी गीता को ?
कभी पढ़ा कि गीता के अंदर क्या है ?
कौन से गूढ़ रहस्य हैं उसके श्लोकों में ? 

शनिवार, 12 अगस्त 2017

जब आप किसी की तरफ एक अँगुली उठाते हैं तो तीन अंगुलियाँ आप कीतरफ उठती हैं

भा भू अ पुरस्कार - प्रसंग
सात समंद की मसि करौं
स्त्री लेखको को जो लानतें - मलानतें पिछले दिनों भेजी गईं , उसका निरपेक्ष विश्लेषण कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है. साथी पुरुषों से अनुरोध है कि जरा रुक कर सोचें --

अस्पताल गोरखपुर

गोरखपुर के उन बह रहे तमाम आँसुओ को समर्पित एक पीड़ा-------
चालीस बच्चो की मौत पे भी शिकन नही------- बड़ी मोटी है तेरी सियासी खाल गोरखपुर। आॅक्सीजन की सप्लाई रुक गई, अभी तलक आजाद है सी.ऐम.ओ.(C.M.O.), मुझे तो शक है कि, इन बच्चो की मौत के है--------- यही दलाल गोरखपुर।

आखिर हम इतने अकेले क्यों होते जा रहे हैं ?


वंदना बाजपेयी
मुंबई की आशा जी की घटना बेहद दर्दनाक है | कौन होगा जिसका मन इन हृदयविदारक तस्वीरों को देख कर विचलित न हो गया हो | ये घटनाएं गिरते मानव मूल्यों की तरफ इशारा करती हैं | एक दो पीढ़ी पहले तक जब सारा गाँव अपना होता था | फिर ऐसा क्या हुआ की इतने भीड़ भरे माहौल में कोई एक भी अपना नज़र नहीं आता | हम अपने - अपने दायरों में इतना सिमिट गए हैं की की वहां सिर्फ हमारे अलावा किसी और का वजूद हमें स्वीकार नहीं | अमीरों के घरों में तो स्तिथि और दुष्कर है | जहाँ बड़े - बड़े टिंटेड विंडो ग्लास से सूरज की रोशिनी ही बमुश्किल छन कर आती है , वहां रिश्तों की गुंजाइश कहाँ ? अभी इसी घटना को देखिये ये घटना आशा जी के बेटे पर तो अँगुली उठाती ही है साथ ही उनके पड़ोसियों व् अन्य रिश्तेदारों पर भी अँगुली उठाती है | आखिर क्या कारण है की उनका कोई भी रिश्तेदार पड़ोसी उनकी खैर - खबर नहीं लेता था | ये दर्द नाक घटना हमें सोंचने पर विवश करती है की आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ? आखिर क्यों हम इतने अकेले होते जा रहे हैं ?

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

संवेदनाओं का मीडियाकारण: नकारात्मकता से अपने व् अपने बच्चो के रिश्ते कैसे बचाएं ?


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अभी हाल में खबर आई की मुंबई की एक वृद्ध माँ का बेटा जब डेढ़ साल बाद आया तो उसे माँ का कंकाल मिला | खबर बहुत ह्रदय विदारक थी | जाहिर है की उसे पढ़ कर सबको दुःख हुआ होगा | फिर सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्टों की बाढ़ सी आ गयी | जहाँ कपूत बेटों ने अपने माँ – बाप को तकलीफ दी हर माता – पिता ऐसी  ख़बरों को पढ़ कर भयभीत हो गए | कहीं न कहीं उन्हें डर लगने लगने  की उनका बेटा भी कपूत न निकल जाए | कहीं उन्हें भी इस तरह की किसी दुर्घटना का शिकार न होना पड़े | 

हमारे बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं..!


 किरण सिंह
जिन्होंने अपने सुन्दर घर बगिया को अपने खून पसीने से सींच सींच कर उसे सजाया हो इस आशा से कि कुछ दिनों की मुश्किलों के उपरान्त उस बाग में वह सुकून से रह सकेंगे ! परन्तु जब उन्हें ही अपनी सुन्दर सी बगिया के छांव से वंचित कर दिया जाता है तब वह  बर्दाश्त नहीं कर पाते .और खीझ से इतने चिड़चिड़े हो जाते हैं कि अपनी झल्लाहट घर के लोगों पर बेवजह ही निकालने लगते हैं जिसके परिणाम स्वरूप घर के लोग उनसे कतराने लगते हैं ...! तब बुजुर्ग अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं ! "उनके अन्दर नकारात्मक विचार पनपने लगता है फिर शुरू हो जाती है बुजुर्गों की समस्या  ! 

एवरेस्ट की सबसे यंग विजेता - पूर्णा मलवथ


            
प्रस्तुति - पूजा कुमार 
संकलन - प्रदीप कुमार सिंह

पूर्णा मलवथ एक बार फिर चर्चा में हैं। कारण वे उन सबसे यंग लोगों में हैं जिनपर बायोपिक बनी है। पूर्णा नाम से फिल्म रिलीज हो चुकी है। दरअसल पूर्णा वेमिसाल व्यक्तित्व की है। वे आदिवासी परिवार से आती हैं। उनके माता-पिता खेतिहर मजदूर हैं। जिन्होंने खेलने-कूदने की उम्र में ऐसा कारनामा कर दिया है, जिसे आज तक इतनी कम उम्र में किसी ने नहीं किया। उन्होंने एवरेस्ट की चोटी तक फतह की जब उनकी उम्र केवल 13 वर्ष थी।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

भूमिका


रचना व्यास 

चातुर्मास में साध्वियों  का दल पास ही के भवन में ठहरा था।  महिमा नित्य अपनी सास के साथ प्रवचन सुनने जाती थी। समाज में ये संचेती परिवार बड़े सम्मान की दृष्टी से देखा जाता था। अर्थलाभ हो या धर्मलाभ -सबमें अग्रणी।

बुजुर्गों को दें पर्याप्त स्नेह व् सम्मान


सीताराम गुप्ता,
दिल्ली
     आज दुनिया के कई देशों में विशेष रूप से हमारे देश भारत में बुज़ुर्गों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे में उनकी समस्याओं पर विशेष रूप से ध्यान देना और उनकी देखभाल के लिए हर स्तर पर योजना बनाना अनिवार्य है। न केवल सरकार व समाजसेवी संस्थाओं को इस ओर पर्याप्त धन देने की आवश्यकता है अपितु हमें व्यक्तिगत स्तर भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। कई घरों में बुज़्ाुर्गों के लिए पैसों अथवा सुविधाओं की कमी नहीं होती लेकिन वृद्ध व्यक्तियों की सबसे बड़ी समस्या होती है शारीरिक अक्षमता अथवा उपेक्षा और अकेलेपन की पीड़ा। कई बार घर के लोगों के पास समय का अभाव रहता है अतः वे बुज़्ाुर्गों के लिए समय बिल्कुल नहीं निकाल पाते। एक वृद्ध व्यक्ति सबसे बात करना चाहता है। वह अपनी बात कहना चाहता है, अपने अनुभव बताना चाहता है। वह आसपास की घटनाओं के बारे में जानना भी चाहता है। बुज़्ाुर्गों की ठीक से देख-भाल हो, उनका आदर-मान बना रहे व घर में उनकी वजह से किसी भी प्रकार की अवांछित स्थितियाँ उत्पन्न न हों इसके लिए बुजुर्गों  के मनोविज्ञान को समझना व उनकी समस्याओं को जानना ज़रूरी है।

बुधवार, 9 अगस्त 2017

दर्द से कहीं ज्यादा दर्द की सोंच दर्दनाक होती है






दर्द की कल्पना उसकी तकलीफ को दोगना कर देती है | क्यों न हम खुशियों की कल्पना कर उसे दोगुना करें – रॉबिन हौब 

             एक क्लिनिक का दृश्य डॉक्टर ने बच्चे से कहा कि उसे बिमारी ठीक करने के लिए  इंजेक्शन लगेगा और वो बच्चा जोर – जोर से रोने लगा |नर्स मरीजों को इंजेक्शन लगा रही थी |  उसकी बारी आने में अभी समय था | बच्चे का रोना बदस्तूर जारी था | उसके माता – पिता उसे बहुत समझाने की कोशिश कर रहे थे की बस एक मिनट को सुई चुभेगी और तुम्हे पता भी नहीं चलेगा | फिर तुम्हारी बीमारी ठीक हो जायेगी | पर बच्चा सुई और उसकी कल्पना करने में उलझा रहा | वो लगातार सुई से चुभने वाले दर्द की कल्पना कर दर्द महसूस कर रोता रहा | जब उसकी बारी आई तो नर्स को हाथ में इंजेक्शन लिए देख उसने पूरी तरह प्रतिरोध करना शुरू किया |

गुमनाम


डिम्पल गौड़ 'अनन्या'

अहमदाबाद गुजरात 


आज भी नहीं ठहरोगे ? मालूम है तुम्हारा अक्स मेरे अन्दर पलने लगा है !
क्या ? यह नहीं हो सकता ! मेरी कुछ मजबूरियाँ हैं वेदैही !
मेरी ज़िन्दगी खुद एक मजबूरी बनकर रह गयी है विवेक ! सच कहूँ तो तुम कायर निकले !एक व्यंग्य उछला |


चोटी काटने वाले से दुखी हूँ


रंगनाथ द्विवेदी
औरतो की कट रही चोटी पे एक लेखकीय सहानुभूति

कुछ औरतो के चोटी कटने की खबर सुन------ मेरी लुगाई भी सदमे मे है। वे सोये मे भी उठ जा रही बार-बार, फिर चोटी टटोल सो जा रही, अभी कल ही तो उसने-------

टाईम है मम्मी


किरण सिंह
जॉब के बाद ऋषि पहली बार घर आ रहा था..!कुछ छःमहीने ही हुए होंगे किन्तु लग रहा था कि छः वर्षों के बाद आ रहा है ! बैंगलोर  से आने वाली फ्लाइट पटना में ग्यारह बजे लैंड करने वाली थी.पर मेरे पति को रात भर नींद नहीं आई.उनका वश चलता तो रात भर एयरपोर्ट पर ही जाकर बैठे रहते..! ! कई बार ऋषि से बात करते रहे कब चलोगे.. थोड़ा जल्दी ही घर से निकलना..सड़क जाम भी हो सकता है...... आदि आदि..! उनकी इस बेचैनी को देखते हुए मैंने थोड़ा चुटकी लेते हुए कहा चले जाइए ना रात में ही एयरपोर्ट..!

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

नया नियम



 रश्मि सिन्हा 
शहर में एक नया कॉलेज खुला था। बाद से बैनर टंगा था ,यहां शिक्षा निशुल्क प्राप्त करें,और वहां छात्र और छात्राओं का एक भारी हुजूम था।

तभी एक छात्र की नज़र एक बोर्ड पर पड़ी, जिसपर एडमिशन के नियम व शर्तें लिखयी हुई थीं। जिसमे लिखा था," केवल उन्ही को प्रवेश,शिक्षा, निशुल्क दी जाएगी जो अपने नाम के साथ,"सर नेम के रूप में,दूसरे धर्म या सम्प्रदाय का नाम लगाएंगे, उदाहरणार्थ, रोहित शुक्ला की जगह रोहित खान या रोहित विक्टर।


जब मैंने पहली बार पाँच सौ का नोट देखा - हनुमक्का रोज




संकलन- प्रदीप कुमार सिंह
           मेरे पिता दुर्गा दास कन्नड़ थियेटर के एक सम्मानित कलाकार जरूर थे, मगर घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। कर्नाटक के बेल्लारी जिले के एक छोटे से कस्बे मरियम्मनहल्ली में मेरा जन्म हुआ था और बचपन से हमें रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। पिताजी को देखकर ही मेरे मन में थियेटर के प्रति झुकाव होता गया और जब एक दिन मैंने घर में कहा कि मैं भी थियेटर जाना चाहती हूं और काम करना चाहती हूं, तो परिवार में कोई इसके लिए राजी नहीं था। मैंने घर में कहा कि इसमें गलत क्या है?

शिखरिणी छंद


शिखरिणी छंद---रक्षाबंधन पर

डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
देहरादून, उत्तराखंड
1--
रेशम सूत्र
बनता नेह डोर
संबंध गूढ़।

रेप के घाव






@@@रचयिता----रंगनाथ दुबे। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर।

थाने पे-------- एक गरीब की बिटिया, अपनी सलवार उतारे--------- जगह-जगह हुये रेप के घाव दिखा रही है। दरोगा----------

सोमवार, 7 अगस्त 2017

निर्णय लो दीदी ? ( ओमकार भैया को याद करते हुए )



                              happy  raksha bandhn , कार्ड्स मिठाइयाँ और चॉकलेट के डिब्बों से सजे बाजारों के  बीच कुछ दबी हुई सिसकियाँ भी हैं | ये उन बहनों  की  हैं जिनकी आँखें राखी से  सजी दुकानों को देखते ही डबडबा जाती  हैं   और आनायास  ही मुँह  फेर  लेती हैं | ये वो अभागी  बहनें  हैं जिन्होंने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर अपने भाई को खो दिया    है | भाई - बहन का यह अटूट बंधन ईश्वर की इच्छा के आगे अचानक से टूट कर बिखर गया | अफ़सोस उन बहनों में इस बार से मैं भी शामिल हूँ | भाई , जो भाई तो होता ही है पुत्र , मित्र और पिता की भूमिका भी समय समय पर निभाता है | इतने सारे रिश्तों को एक साथ खोकर खोकर मन का आकाश बिलकुल रिक्त हो जाता है | यह पीड़ा न कहते बनती है न सहते |


रक्षा बंधन : भाई - बहन पर अनमोल विचार



आपकी ऊधमबाजी  और शरारतें व्यर्थ हैं अगर उसमें आपकी बहन शामिल नहीं है -अनाम 

आप सारी  दुनिया कोअपनी बातों से  बहला सकते हो , अपनी बहन को नहीं -चेरलोट ग्रे 

रविवार, 6 अगस्त 2017

आया राखी का त्यौहार - भाई बहन पर कवितायें



बहन की राखी 

ईमेल एसएमएस की दुनिया में
डाकिये ने पकड़ाया लिफाफा
22 रुपए के स्टेम्प से सुसज्जित
भेजा गया था रजिस्टर्ड पोस्ट
पते के जगह, जैसे ही दिखी
वही पुरानी घिसी पिटी लिखावट
जग गए, एक दम से एहसास
सामने आ गए, सहेजे हुए दृश्य
वो झगड़ा, बकबक, मारपीट
सब साथ ही दिखा,

यकीन


संजीत शुक्ला 
एक बार एक आदमी रेगिस्तान में जा रहा था |  तभी रेत भरी आँधी चली और वो रास्ता भटक गया | उसके पास खाने-पीने की जो थोड़ी-बहुत चीजें थीं वो भी  जल्द ही ख़त्म हो गयीं और  हालत ये हो गयी की वो बूँद – बूँद पानी को तरसने लगा | पिछले दो दिन से उसने पानी पीना तो दूर , पानी पिया भी नहीं था | वह मन ही मन जान चुका था कि अगले कुछ घंटों में अगर उसे कहीं से पानी नहीं मिला तो उसकी मौत पक्की है।

मित्रता एक खूबसूरत बंधन



special article on friendship day
किरण सिंह 
मित्रता वह भावना है जो दो व्यक्तियों के  हृदयों को आपस में जोड़ती है! जिसका सानिध्य हमें सुखद लगता है तथा हम मित्र के साथ  स्वयं को सहज महसूस करते हैं, इसलिए अपने मित्र से अपना दुख सुख बांटने में ज़रा भी झिझक नहीं होती ! बल्कि अपने मित्र से अपना दुख बांटकर हल्का महसूस करते हैं और सुख बांटकर सुख में और भी अधिक सुख की अनुभूति करते हैं! 

एक राजकुमारी की कहानी



मित्रों , मैं बचपन में कहानी में सुना करती थी | एक राजकुमारी की  , जैसा की राजकुमारियों की कहानी में होता है | वो बहुत सुन्दर थी | बिलकुल परी  की तरह और जब हंसती तो उसके सुन्दर मुख की शोभा सौ गुनी बढ़ जाती | हां वो  बहुत संवेदनशील भी बहुत थी  | किसी की जरा सी बात से उसका मन द्रवित हो जाता |घंटों रोती उसका दुःख दूर करने का प्रयास करती | 

शनिवार, 5 अगस्त 2017

अनावृत


कंचन लता जायसवाल 
 चित्रकार की तस्वीर पूरी हो चुकी थी.
अब उसकी प्रसिद्धि पूरे विश्व में थी.
उसके चित्रों की चहुँ ओर धूम मची थी.

गलती किसकी



डाॅ सन्ध्या तिवारी
       सद्यः विधवा चचेरी बहन ममता से  काबेरी ने बहुत आत्मीय मगर शिकायती लहज़े में पूछा ; "दीदी आप मेरी ननद की शादी में क्यों नही आई ?"
ममता ने रुष्ट होते हुये कुछ तेज स्वर में कावेरी को झिडकते हुये कहा ;" बुलाऽयाऽ तुमने ?कार्ड तो छोडो तुमने एक फोन तक नही किया। तुमने सोचा होगा विधवा को अच्छे काम में क्या बुलाना ।बेकार की बातें बना रही हो।"

खीर में कंकड़


motivational story on bhagya  and  karma in hindi 

संजीत शुक्ला 

दोस्तों अक्सर हमारे मन में ये प्रश्न रहता है की भाग्य बड़ा है या कर्म | आज इसी विषय पर एक motivational story आपसे  share कर रहा हूँ | कहानी है दो दोस्तों की | जिनके नाम थे गौरव और सौरभ 


                                                                        अब सौरभ था भाग्यवादी और गौरव कर्म को मानने वाला |यूँ तो दोनों गहरे मित्र थे पर  अक्सर इस विषय पर दोनों की बहस हो जाती | दोनों अपने point of view को सही बताते | 

शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

ख़राब रिजल्ट आने पर बच्चों को कैसे रखे पॉजिटिव


अपने बच्चों पर BEST  RESULT का दवाब न डालें 
पंकज“प्रखर”
कोटा(राजस्थान)

माता-पिता अपने बच्चों को नकारात्मक विचारों से बचाएं और अपने स्नेह एवं मार्गदर्शन से उनमे आत्मविश्वास का दीपक प्रज्वलित करें और उन्हें आश्वस्त करें की अगर वे अपनी इच्छानुसार सफलता नही भी प्राप्त कर पाए या पूरी तरह असफल हो गये तब भी उनके पास अपनी योग्यता सिद्ध करने के कई अवसर आने वाले समय में उपलब्ध होंगे उन्हें विश्वास दिलाएं की एक असफलता हमारा जीवम समाप्त नही करती बल्कि जीवन जीने के और भी नये व अच्छे रास्ते खोल देती है |

सक्सेस के लिए जरूरी है हौसलों की उड़ान



विपरीत परिस्तिथियों में भी पा सकते हैं सफलता 

कु. इंदु सिंह ‘इन्दुश्री’
व्याख्याता (कंप्यूटर.साइंस)
शा.स्नातकोत्तर महाविद्यालय,नरसिंहपुर (म.प्र.)
कुछ भी नहीं
इस दुनिया में
'असंभव'
...
बस,
एक अवरोध का
'अ' ही तो हटाना हैं
... 
लो जी बन गया  
'संभव' ।।