बुधवार, 5 जुलाई 2017

डॉ मधु त्रिवेदी की पांच कवितायें



मैं व्यापारी हूँ 
झूठ फरेब झोले में रखता
सच सच बातें बोलता
सत्य हिंसा को मैं रोदता
साँच में आँच लगाता
मैं व्यापारी हूँ

संस्कृति हरण का पापी
गर्त की ओर ले जाता
मिथ्या भाषण करता हूँ
चार छ:रोज सटकाता
मैं व्यापारी हूँ
अशुद्ध परिहास करता हूँ
नकली बेकार कहता हूँ
सच्चाई का गला घोटता हूँ
साफ साफ हिसाब देता हूँ
बेजोड हेर फेर करता हूँ
सदा असत्य कहता हूँ
मैं व्यापारी हूँ
हाँ जी
यहाँ मैं बेचता हूँ
आप भी खरीद लो
फ्री में बिकती है झूठ मक्कारी
वादों की नहीँ कीमत है यहाँ
रोज हजार दम तोड़ते यहाँ
वादा मेरा मैं साथ दूँगा
निर्लज्जता सीखा दूँगा
मैं व्यापारी हूँ
हर जगह जगह मेरा
बोलबाला है
जनमन कैसा बेचारा है
टेडेमेडे लोग सबल है
अन्न जल से निर्बल है
लाज शर्म रोती है
बेशर्मी पनपती है
मैं व्यापारी हूँ
बेशर्मी का नंग नाच करता
दुर्जनों पर रोज हाथ साफ करता
हत्या , रेप , लूटपाट , डकैती
यहीं सब मेरे आचार है
मैं व्यापारी हूँ



1..........
हे माँ सीते !दीवाली पर आ जाना
हे माँ सीते ! विनती है मेरी
घर दीवाली पर आ जाना
राम लखन बजरंगी सहित
जन – जन के उर बस जाना
हे माँ सीते ! मेरा हर धाम
चरणों में तेरे रोज बसता है
दीवाली की यह जगमगाहट
तेरे ही तेज से मिलती है
माँ सीते ! आकर उर मेरे
प्यार फुलझड़ी जला जाना
हर जन को रोशन करके
अँधेरा दिल का मिटा जाना
हे मा सीते! आशीष अपना
दुष्ट जनों पर बरसा जाना
बन कर दीप चाहतों का तुम
नवयौवन का अंकुर फूटा जाना
हे माँ सीते ! दिलो में आकर
लोगों को सब्र का पाठ पढ़ाना
जैसे तुम बसी हो उर राम के
वैसे प्रिय प्रेम का दीप जला जाना
हे माँ ! लक्ष्मण प्रिय भक्त तेरे
भाव हर भाई में यह जगाना
न हो बँटवारा भाई -भाई में
दीप वह जला माँ तुम जाना
हे माँ सीते! खील खिलोने की
हर गरीब जनों पर बारिशें हो
हृदय में मधु मिठास को घोल
शब्द शब्द को मधु बना जाना
दीप जलते अनगिनत दीवाली पर
राकेट जैसे जाता है दूर गगन तक
जाति-पाति धर्म की खाई को पाट
सबके हृदय विशाल बना जाना

2.....................
लाज अपने देश की सबको बचाना है

लाज अपने देश की सबको बचाना है
दुश्मनों के आज मिल छक्के छुड़ाना है
बार हर मिल कर मनाते प्रव गणतंत्र का
इसलिये अब प्रतिज्ञा हमको कराना है
याद वीरों की दिला कर के यहीं गाथा
मान भारत भूमि का अब बढ़ाना है
कोन जाने यह कि आहुति कितनी दी हमने
याद वो सारी हमें ही तो दिलाना है
माँग उजड़ी पत्नियों की ही यहाँ पर क्यों
बात बच्चों को यही समझा बताना है
खो दिये है लाल अपने तब यहाँ पर जो
फिर पुरानी आपसे दुहरा जताना है
आबरू माँ की बचाने के लिए हम अब
गर पडे़ मौका शीश अपना भी कटाना है

3............
जाया भारतभूमि ने दो लालों को
वो गाँधी और लाल बहादुर कहलाये
बन अलौकिक अनुपम विभूति
भारत और विश्व की शान कहलाये
दो अक्टूबर का यह शुभ दिन आया
विश्व इतिहास में पावन दिवस कहलाया
राष्टपिता बन गाँधी ने खूब नाम कमाया
लाल ने विश्व में भारत को जनवाया
सत्य अहिंसा के गाँधी थे पुजारी
जनमन के थे गांधी शांति दाता
दीन हीनों के थे गाँधी भाग्य विधाता
बिना तीर के थे गाँधी अस्त्रशस्त्र
चल के गाँधी ने साँची राह पर
देश के निज गौरव का मान बढाया
दो हजार सात वर्ष को अन्तर्राष्टीय
अहिंसा दिवस के रूप में मनवाया
शांति चुप रहना ही उनका हथियार था
भटकी जनता को राह दिखाना संस्कार था
बन बच्चों के बापू उनके प्यारे थे
तो मेरे जैसों की आँखों के तारे थे
लालबहादुर गांधी डग से डग
मिलाकर चला करते थे
एक नहीं हजारों को साथ ले चलते थे
राह दिखाते हुए फिरंगियों को दूर करते
फिरंगी भी भास गये इस बात को
अन्याय अनीति नही अब चलने वाला
अब तो छोड़ जाना होगा ही कर
हवाले देश गाँधी जी को ही
गाँधी जी नहीं है आज हमारे बीच
फिर हम रोज कुचल देते है उनकी
आत्मा और कहलाते है नीच
आत्मा है केवल किताबों में बन्द
अपना कर गाँधी बहादुर का आदर्श
हम देश को बचा सकते है
घात लगाये गिद्ध कौऔं से लुटने
से हमेशा बचा सकते है
4........
शहर के मुख्य चौराहे पर
ठीक फुटपाथ पर
ले ढकेल वह रोज
खड़ा होता था
लोगो को अपनी बारी
का इन्तजार रहता
जब कभी गुजरना होता
घर से बाहर
मैं भी नहीं भूलती
खाना पानी पूरी
बस पानी पूरी
खाते खाते
आत्मीयता सी हो
गई थी मुझे
जब कभी मेरा
जाना होता
तो वह भी कहने से
ना चूकता था
आज बहुत दिन बाद—–
वक्त बीतता गया
जीवन का क्रम चलता रहा
अनायास एक दिन वह
फेक्चर का शिकार
हो गया
तदन्तर अस्पताल में
सुविधाएं भी पैसे वालों के
लिए होती है ———
पर वो बेचारा
जैसे तैसे ठीक हुआ
बीमारी ने आ घेरा
एक दिन बस शून्य में
देखते ही देखते
काल कवलित
हो गया
फिर बस केवल
संवेदनाएं ही संवेदना
बस स़बेदना
बची सबकी
जीवन का करूणांत
तदन्तर
आत्मनिर्भर परिवारिक जनों की
दो रोज की रोटी ने
एक गहरी चिंतन रेखा
खींच दी
पर मैं और मेरी
आत्मीयता बाकी है
आज भी
क्योंकि व्यक्ति जाता है
जहां से
उसकी नेकी लगाव
आसक्ति रह जाती है
बाकी
पर वक्त छीन देता है
उसे भी
और घावों को भर देता है

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