रविवार, 9 जुलाई 2017

वो क्यों बना एकलव्य ?






दीपक मिश्रा केमिस्ट्री के प्रोफ़ेसर थे |शुरू से ही पढ़ाई में अच्छे थे | बनना तो वो वैज्ञानिक   चाहते थे ,जो कुछ नयी खोज कर कर सके |  पर रोजी रोटी के जुगाड़ ने उन्हें G D विश्व -विद्यालय पहुंचा दिया |  आपकी जानकारी के लिए बता दूं की GD का फुल फॉर्म है गुरु द्रोणाचार्य विश्व विद्यालय | विश्व विद्यालय के मुख्य द्वार पर गुरु द्रोणाचार्य व् अंगूठा काट कर देते हुए एकलव्य की बड़ी सी प्रतिमा बनी हुई है | हालांकि ये प्रतिमा पूरे साल धूप गर्मी बरसात सहती हुई पत्थर बन कर खड़ी  रहती है | किसी का उस पर ध्यान ही नहीं जाता | जाए भी क्यों न तो अब गुरु द्रोणाचार्य जैसे गुरु रहे हैं न अर्जुन , एकलव्य जैसे शिष्य |अलबत्ता  गुरु पूर्णिमा के दिन उसके दिन बहुरते , जब विश्व - विद्यालय की ओर से उस पर माल्यार्पण किया जाता है | रोली - अक्षत लगाया जाता |  और कुछ बच्चे जो उस समय वहां उपस्तिथ होते उन्हें प्रसाद भी  बांटा जाता |




                                       खैर हम बात कर रहे थे दीपक मिश्रा जी की | विश्व विद्यालय में नौकरी करने के बाद भी उनकी वैज्ञानिक बनने  की तीव्र इच्छा मरी नहीं थी |बच्चों को पढ़ाते समय भी शायद उनका मन अपने प्रयोग में ही रहता | इसलिए वो ठीक से पढ़ा भी नहीं पाते |  उनके सपनों में भी periodic table आती | साथ में दिखाई देते वो छूटे  हुए स्थान जिनमे हो सकने वाले तत्व अभी तक खोजे नहीं गए थे | दीपक मिश्रा  का एक ही सपना था की वो उनमें से कोई तत्व खोजें | इसीलिए वो बच्चों को पढ़ाने के बाद घंटो केमिस्ट्री लैब में प्रयोग करते रहते | पर तत्व उनके हाथ में नहीं आता | इसके लिए वो लैब में सुविधाओं की कमी का रोना रोते रहते थे  | उन्हें हमेशा यही लगता की अगर उनके पास सुविधायें होती तो वो उस तत्व को जरूर खोज लेते | 

समय आगे बढ़ता गया  | जरा ठहरते हैं वहाँ , जहाँ  दीपक मिश्रा जी  ५४ साल के हो गए थे |घर - गृहस्थी की जिम्मेदारियों के साथ समय ने कब उनकी तत्व खोजने की इच्छा में जंग लगा दिया उन्हें पता ही न चला | पर अपने इच्छानुरूप जीवन न पा सकने का फ्रस्टेशन उनकी बातों में जरूर झलकता |  अब तो बस नौकरी और घर | हाँ   उनके आधीन कई बच्चे पी एच डी करते थे  | उसमें उनको पैसा मिलता था  | पी एच  डी करने वाले छात्रों पर वो विशेष ध्यान देते हैं | क्या पता उनमें से कोई होनहार निकल जाए और उस काम को कर सके जो वो नहीं कर पाए |


ऐसे समय में ही एक छात्र नीलेश शुक्ला ने उनके अंडर पी एच डी करने के लिए रजिसट्रेशन करवाया |नीलेश बहुत  होनहार छात्र था पर बहुत  गरीब भी  | उसका परिवार गाँव में रहता था  | पिताजी बचपन में गुज़र गए थे | घर में माँ व् पांच बहने थीं  | उनकी शादी की जिम्मेदारी उस पर थी | खेत - खलिहान  बेंच कर तीन बहनों की शादी तो हो गयी पर अभी दो बची थी | जैसे - तैसे उसने खुद की शिक्षा पूरी  करी | यू जी सी क्लीयर किया | और पी एच डी करने लगा | उसमें से मिलने वाले पैसों से उसकी गृहस्थी चलती और बहनों की शादी के लिए भी जोड़ता | पर इतना पैसा कैसे जुटेगा इसकी चिंता बनी रहती |

दीपक मिश्रा और नीलेश शुक्ला में एक अच्छा रिश्ता कायम हो गया | बातों - बातों में ही नीलेश को दीपक सर के अरमानों के बारे में पता चला | उसने दीपक सर से कहा की सर मैं भी पूरी कोशिश करूँगा उस तत्व को ढूँढने की | दीपक मिश्रा  खुश हो गए | उन्हें लगा वो न सही पर उनका शिष्य तो उस तत्व को ढूढ़ लेगा | उन्होंने उसे पूरी मदद देने को कहा | नीलेश अपने टॉपिक पर काम करने के बाद उस तत्व को खोजने में जुट जाता | दिन में १८ घंटे उसके लैब में बीतते | पर वो धुनी उफ़ तक न करता |

इसे संयोग कहिये या नीलेश की मेहनत का परिणाम | नीलेश ने उस तत्व को ढूंढ निकाला | वो दौड़ा - दौड़ा  दीपक सर के पास गया | दीपक मिश्रा बहुत खुश हुए | उन्होंने नीलेश को गले से लगा लिया | जो काम वो न कर सके वो उनके शिष्य ने कर दिखाया | उनकी आँखों में ख़ुशी के आँसू थे व् सर गर्व से ऊँचा | उन्होंने उसी समय मिठाई मंगा कर  नीलेश को खिलाई व् खुद भी खायी | नीलेश चला गया | दीपक सर ख़ुशी - ख़ुशी सोने चले गए | पर आज उनकी आँखों में नींद कहाँ ? बिस्तर पर जाते ही वो कल्पना करने लगे , जब नीलेश का काम सामने आएगा तो उसका कितना नाम होगा | हो सकता है इस अभूतपूर्व खोज के लिए उसे  कोई पुरूस्कार भी मिल जाए ... पद्मश्री , पद्मभूषण , या ... या नोबल पुरूस्कार | नोबल पुरूस्कार सोंचते ही दीपक जी के मुँह का स्वाद कडुआ हो गया | जैसे किसी ने एसिड पी लिया हो | तत्व खोज कर नाम कमाने की उनकी दिली इच्छा पर लगी लंग अचानक ही एसिड पड़ते ही घुल गयी | ओह तो अब उनकी जगह नीलेश का नाम होगा | उसे पुरूस्कार मिलेगा | नहीं नहीं वो ये कैसे होने देंगे | दीपक मिश्रा सारी  रात करवटें बदलते रहे | अंत में उन्होंने  निर्णय ले लिया |

सुबह जब नीलेश उनके पास आया तब तक वो गुरु से व्यापारी बन चुके थे | उन्होंने नीलेश के सामने प्रस्ताव रख दिया की वो अपना काम उन्हें दे दे | बदले में उन्होंने नीलेश को एक मोटी रकम ऑफर की | नीलेश के दिल को गहरा धक्का लगा | वो तुरंत ही वापस लौट गया | आज की रात नीलेश पर बहुत भारी थी | उसके मन से गुरु के लिए सारी  इज्ज़त जा चुकी थी | वो घंटों रोता रहा | उस आदर्श मूर्ति के टूटने के कारण जो उसने अपने ह्रदय में भगवान के रूप में स्थापित की थी | जसे बादल  बरसने के बाद सूर्य चमक उठता है | वैसे ही नीलेश विचार करने लगा | जिसे आज की भाषा में "प्रैक्टिकल  थिंकिंग"  कहते हैं | नीलेश को याद आया माँ कह  रही थी की बड़ी बहन २९ की हो गयी है साल भर में शादी न हुई तो कुवारा लड़का नहीं मिलेगा | दुहाजू को ब्याहनी पड़ेगी | घर भी पूरा चूता है , बरसात से पहले ही मरम्मत करानी है | और छोटी बहन जो पढने में होशियार है उसका कॉलेज में एडमिशन कराना है | ये सब वो इसी साल में कैसे कर सकता है | इसके लिए पैसे चाहिए ... बहुत सारे पैसे , वो element नहीं जो periodic table में अपना स्थान बनाएगा | फिर क्या भरोसा की वो प्रयोग  विश्व वैज्ञानिक संगठन द्वारा स्वीकार कर लिया जाए | या उस पर कोई पुरूस्कार मिले | फिर उस को विश्व वैज्ञानिक संगठन तक अपनी बात पहुँचाने के लिए भी तो पैसा चाहिए | वो पैसा उसके पास कहाँ है | वो पैसा दीपक सर के पास है | इस तरह उसका नाम नहीं पर उसका काम तो सराहा जायेगा | एक खोज दुनिया के सामने आ सकेगी | नीलेश ने फैसला ले लिया | दूसरे दिन उसने दीपक सर को अपने सारे रिसर्च पेपर पकड़ा दिए | दीपक सर ने उसके बदले में एक मोटी रकम नीलेश को दे दी | उसके बाद नीलेश कॉलेज में नहीं दिखा | उसने पी एच डी छोड़ दी | शायद वो अपने टूटे सपनो के कब्रगाह को दोबारा देखने की हिम्मत नहीं कर सका |


                                      समय बीतता गया | आज २० साल बाद गुरु पूर्णिमा के दिन GD  विश्व विद्यालय में शाम ६ से आठ एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन था |कार्यक्रम का नाम था " गुरु शिष्य मैत्री समारोह "| जिसमें मुख्य अतिथि थे | नीलेश शुक्ला , जो आज बहुत सारी केमिकल फैक्ट्री के मालिक थे | समारोह में ७८ वर्षीय दीपक मिश्रा भी आये थे | वो आगे की सीट पर बैठे थे | दोनों ने आँखें मिलते ही नज़रे फेर लीं | कार्यक्रम २ घंटे चला | अंत में नीलेश ने माइक संभल कर बोलना शुरू किया | 

                                दोस्तों,  आज गुरु पूर्णिमा के दिन हम सब यहाँ गुरु शिष्य समागम समारोह में उपस्तिथ हुए हैं | गुरु की महिमा के अपार वर्णन हैं | कहीं गुरु गोविद से ऊपर बताये गए हैं तो कहीं कुम्हार की तरह बाहर चोट कर भीतर से संभालने वाले  , तो कहीं सूर्य के सामान | पर इन तमाम गुरुओं को याद करते हुए एक गुरु को और याद किया जाता है वो हैं गुरु द्रोणाचार्य | उनकी तमाम खूबियों के साथ उनके जीवन पर एक दाग भी था | वो था एकलव्य | जहाँ एकलव्य  की गुरु भक्ति सराहनीय है वहीं  गुरु का उसका अंगूठा मांगना निंदनीय | अफ़सोस ये द्रोणाचार्य और एकलव्य आज भी हमारे बीच हैं | पर उनके किस्से सामने नहीं आते हैं | ऐसा ही एक एकलव्य बरसों पहले इसी कॉलेज में  मैं बना | नीलेश ने अपना किस्सा सुनना शुरू कर दिया | किस्से का अंत होते - होते  लोगों की नज़रें वृद्ध दीपक मिश्रा की और घूम गयीं | उनकी आँखें उठाने की हिम्मत नहीं थी | वो पसीने - पसीने हुए जा रहे थे |

इससे पहले की लोग उठ कर दीपक मिश्रा को घेर लेते | नीलेश ने कहना शुरू किया ," सुनिए क्या आप जानते हैं उस तत्व का नाम क्या है ? लोगों ने दीपक सर से हटा कर नीलेश पर नज़रें गड़ा दीं |  लोगों की उत्सुकता देख कर नीलेश बोला ," उस तत्व का नाम है " हेरिलियम " |  ये नाम उसके खोज कर्ता हेरिस लुइ के नाम पर रखा गया है | आप सब को पता होगा की इसी रिसर्च पर उन्हें सन २००२ का नोबेल परुस्कार मिला था | उनका बहुत नाम हुआ था | क्या , क्यूँ , कैसे के प्रश्न के साथ लोगों के मुँह खुले के खुले रह  गए | नीलेश आगे बोला ," मैं जानता हूँ की आप सब के दिमाग में बहुत सारे सवाल होंगे | मैं एक - एक कर के पूरी  घटना बताता हूँ | लोग ध्यान से सुनने लगे | नीलेश बोला ," दरसल मुझ से रिसर्च वर्क लेने के बाद  उस को विश्व वैज्ञानिक संगठन तक पहुँचाने के लिए सरकारी सहायता प्राप्त करने के लिए दीपक सर ने दिल्ली  के अनेकों चक्कर लगाए | फाइलें  इस विभाग से उस विभाग की ओर घूमती रहीं | दीपक सर ने मीडिया के मार्फ़त भी अपनी बात कहने की कोशिश की |पर किसी अखबार ने उनको जगह नहीं दी | अंत में एक लोकल अखबार ने उसे अपने  बीच के पन्ने पर एक विज्ञापन के रूप में छापा | वो विज्ञापन GG कॉलेज की तरफ से दिया गया था | की हमारे छात्र व् शिक्षक रिसर्च वर्क में आगे बढ़ रहे हैं | जाहिर है विज्ञापन कोई प्रूफ नहीं होते | दीपक सर ने हार नहीं मानी | वो अपनी बची हुई जमा पूंजी लगा कर स्वीडन रवाना हो गए |अकी रिसर्च खुद वहाँ  तक पहुंचा सकें |


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                                        पर अफ़सोस , वहां उनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ सिद्ध हुई | दीपक सर टूट गए अब उनके पास कुछ भी पैसा नहीं बचा था | वापस लौटने का भी नहीं | किसी प्रकार से सरकारी सहायता मिलने की आशा भी नहीं थी | तभी उन्हें हेरिस मिला | जो केमिस्ट्री में रिसर्च कर रहा था | अबकी बार हेरिस ने उनकी मजबूरी को खरीद लिया | मेरी ही तरह खुद को समझाते हुए की  मेरा नाम न सही काम  तो दुनिया के सामने आ जाएगा , दीपक सर घर लौट आये |और गुमनामियों के अँधेरे में खो गए |

दोस्तों वो एकलव्य जिसने अपने अंगूठे के रूपमें गुरु दक्षिणा दी थी |  पहला भले ही हो , आखिरी नहीं था | एकलव्य सदा से बनते  आये हैं और बनते  रहेंगे | मैं  भी एकलव्य बना | पर एकलव्य बनना मेरे ख़ुशी नहीं विवशता थी | यह विवशता थी ... पैसों की कमी | कुछ हद तक  कह सकते हैं की दीपक सर भी एकलव्य बनने को विवश हुए जिन्होंने अपनी जन्म भूमि भारत के नाम एक खोज दर्ज होने के बाजाये उसे एक विदेशी गुरु को दक्षिणा में दे दिया | आप सोंच रहे होंगे ," हेरिस कैसे गुरु बना | हेरिस भी गुरु बना | जिसने "प्रैक्टिकल  थिंकिंग "सिखाई | वही जो मुझे दीपक सर ने सिखाई थी | जब हमारा आज असुरक्षित है तो तो हम कल के बारे में नहीं सोंच सकते | गरीबी और लाल फीतासाही के चलते कितनी प्रतिभाएं विदेश चली जाती हैं | अमेरिका निवासी भारत के मूल नागरिक ने ये खोजा , वो खोजा , ये प्रतिभा दिखाई वो प्रतिभा दिखाई | ये सब वो एकलव्य है जो हमारा देश विदेशी " प्रैक्टिल  थिंकिंग " वाले द्रोणाचार्यों को सौपता रहता है |

क्या आपको महसूस नहीं होता की  हमारा भारत भी एकलव्य है | जिसे हम प्रतिभा पलायन कहते हैं वो प्रतिभा पलायन नहीं एकलव्य के अंगूठे हैं जो गरीबी , अशिक्षा और सरकारी  उपेक्षा के कारण   कट - कट कर के "प्रैक्टिकल थिंकिंग"  वाले विदेशी गुरुओं पर चढ़ते रहते हैं | फिर क्यों न वही तैयार हो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर | जो भीड़ अभी तक दीपक सर को मारने पर उतारू थी | उसकी आँखें नम हो रही थी , दिल में करुणा थी और साथ - साथ क्षोभ भी | 

नीलेश ने अपने रुमाल से आँखे पोंछ कर  आगे कहना शुरू किया ," दोस्तों , यहाँ से जाने के बाद जब मैंने अपनी बहनों की शादी कर ली तो मेरे पास थोड़े पैसे बचे | मैंने थोड़े और पैसों के लिए लोन  एपलाइ किया | इसे विडंबना ही कहेंगे की हमारी सरकार जो वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए लोन देने में जूते घिसवा  देती है उसी ने मुझे  फैक्ट्री खोलने के लिए तुरंत लोन सेंक्शन कर दिया | मैंने केमिकल फैक्ट्री खोली | फैक्ट्री ने लाभ कमाया | मैंने चैन ऑफ़  फैक्ट्रीज खोली |अपनी रिसर्च नहीं उस पैसे के प्रभाव से आज मैं यहाँ चीफ गेस्ट बन कर आया हूँ | ये मेरे लिए गर्व के साथ बहुत दुःख का विषय भी हैं | आज मैं एक कॉलेज को गुरु दक्षिणा के रूप में  ये कागज़ात दे रहा हूँ | जिसके अनुसार इस कॉलेज में होनहार छात्रों को रिसर्च करने में पैसों की कमी न पड़े | और शायद अगला कोई एलिमेंट   नीलेनियम या दीपकेनियम बनने  के बजाय हेरिलियम न बने | ये एक पहल है | अगर ऐसा ही हर कॉलेज के धनी  छात्र करें तो शायद किसी एकलव्य को भविष्य में अपना अंगूठा चढाने की जरूरत नहीं पड़ेगी |
                                                                                                                 

                                                          पूरा  विश्व विद्यालय तालियों की आवाज़ से गूँज उठा | गुरु पूणिमा का चाँद अपनी सोलह कलाओं के साथ आकाश में विराजमान था | उसकी किरने यूँ तो सब पर पड़ रही थीं | पर द्रोणाचार्य और एकलव्य की प्रतिमा कुछ ज्यादा ही चमक रही थी | लागों ने ध्यान से देखा तो  उन्हें एकलव्य की प्रतिमा मुस्कुराती हुई लगी  |

वंदना बाजपेयी

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6 टिप्‍पणियां:

  1. Hi! nice article thanks for share
    http://www.nicedayindia.com/2017/06/blog-post_27.html

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  2. अंत तक बाँधकर रखा कहानी ने,प्रवाह के साथ रोचकता से संपन्न सुंदर कहानी साझा करने हेतु धन्यवाद।

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