बुधवार, 5 जुलाई 2017

दो पत्ते





एक बार ओशो कहीं प्रवचन  दे रहे थे | एक व्यक्ति उनके सामने आया और बोला मैं ऐसी जिंदगी बिलकुल नहीं जी सकता | मैं तब तक लड़ता रहूँगा जब तक मैं जीत न जाऊं , या परिस्तिथियों को बदल न लूँ | अब ओशो ठहरे गुरु वो समझ गए की ये व्यक्ति जिन परिस्तिथियों को बदलने की बात कर रहा है वो बदली नहीं जा सकती हैं केवल उनको स्वीकार किया जा सकता है | वो कहते है न की ...
कई बार हमारी समस्या  जब किसी तरह से हल नहीं हो पा रही होती है , तब वहाँ कोई समस्या ही नहीं होती बल्कि एक सच होता है जिस हमें स्वीकार करना होता है | 
                                  ओशो शिष्य को  सच बता सकते थे पर सच स्वीकारना इतना आसान नहीं होता | इसलिए ओशो ने उसे एक कहानी सुनाई | ओशो बोले ," एक बार की बात है एक नदी के किनारे एक पेड़ लगा था |  पेड़  के पत्ते उसमें टूट - टूट कर गिरते रहते थे | उसी पेड़ में दो पत्ते आपस में बहुत मित्र थे | खूब बातें होती थी | एक दिन हवा का एक झोका आया और दोनों टूट कर नदी में गिर पड़े | हवा चलते समय जब दोनों पत्तों को लगा की अंत निकट है | तो एक पत्ता आड़ा गिरा और दूसरा सीधा |

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अब जो पत्ता आड़ा  गिरा वो अड़ गया की मैं नदी के साथ नहीं बहूँगा | मैं तो इसे रोक कर रहूँगा | और उसने अपना पूरा बल धारा के विपरीत लगा दिया | और एक भयानक संघर्ष शुरू हो गया | दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था | वो धारा के साथ - साथ बहने लगा | और मन ही मन सोंचने लगा | वाह ! मैं कितना ताकतवर हूँ | मैं तो नदी को ही बहाए लिए जा रहा हूँ | जिधर - जिधर मैं जाता हूँ , उधर ही उधर नदी जाती है | 

                                            फिर थोडा रुक कर ओशो ने शिष्य से पूंछा ," बताओ दोनों का अंत क्या हुआ ? शिष्य ने सकुचाते हुए कहा ," गुरु वर अंत तो दोनों का एक ही हुआ | ओशो बोले ," यही इस कथा का मूल सार है | आड़े पत्ते का सारा जीवन संघर्ष में बिता | वो बहुत पीड़ा में रहा | वहीं सीधा पत्ता सारे जीवन खुश रहा |गलतफहमी की सही पर वो नदी को बहाए लिए जा रहा है ये सोंच उसकी यात्रा आनद से कटी |

जीवन की कुछ समस्याएं जिनका कोई समाधान नहीं है | उन्हें या तो आप सीकर कर लें और ख़ुशी - खशी जीवन जिए या बेमतलब का युद्ध करें और सारा जीवन संघर्ष व् अवसाद में बीत जाए |

सरिता जैन



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