रविवार, 23 जुलाई 2017

अगर सावन न आइ (भोजपुरी )


रंगनाथ द्विवेदी
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान------- अगर सावन न आई। रहि-रहि के हुक उठे छतियाँ मे दुनौव, लागत हऊ निकल जाई बिरहा में प्रान------- अगर सावन न आई।
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान------ अगर सावन न आई।

ऊ निरमोही का जाने कि कईसे रहत थौ, बिस्तर क पीड़ा ई कईसे सहत थौ, टड़पत थौ सगरौ उमर क मछरियाँ, बाहर के घेरे न बरसे सखी! जबले पिया से हमरे मिलन के न घेरे बदरियाँ, तब ले न हरियर होये सखी! ई उमरियाँ क धान, अगर सावन न आई।

हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान----- अगर सावन न आई।
हे!सखी का होई रुपिया अऊ दौलात, का होई गहना, ई है सब रही कमायल-धयामल, बस बीत जाई हमन के उमरियाँ------- बाहर कई देईहै दुनऊ परानी के ले लेईही बेटवा, मरी-मरी बनावल ई सारा मकान, फिर बाहर खूब बरसे--------- लेकिन न भीगे तब तोहरे चहले ई शरिरियाँ बुढ़ान,
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान------- अगर सावन न आई।

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