बुधवार, 12 जुलाई 2017

जिनपिंग! हम ढ़ाई मोर्चे पे तैयार है



रंगनाथ द्विवेदी
अब पता नहीं 1962 के भारत और चीन के क्या हालात थे?,परिस्थितियाँ क्या थी?।उस समय के हमारे प्रधानमंत्री नेहरु जी से भूल हुई या फिर चीन ने हमारे इस देश और हमारी मित्रता के साथ विश्वासघात किया? एैसे मे तमाम तर्क है कुछ लोग उस समय के तत्कालीक प्रधानमंत्री नेहरु जी पे भी अपने-अपने तरीके से दोषारोपण करते है। ये तो निश्चित है कि उस समय के कुछ तथ्य भी तोड़े-मरोड़े गये उस लड़ाई मे चीन ने हमसे ढ़ेर सारी हमारी जमीने भी हथिया ली, सारी सच्चाईयो का बाद की सरकारो के द्वारा गला भी घोटा गया उसका एक प्रमुख कारण भी रहा काग्रेंस का काफी लम्बे समय तक किया गया शासन! वैसे भी अब आज की तारीख़ में"उस कैंसर ग्रस्त पन्ने को पढ़ने से कुछ भी हासिल होने वाला नही एैसे में उसपे बेजा लेखनी लिखने से अच्छा है कि हम उदीयमान होते हुये सुदृढ़ और मजबूत भारत की उस छप्पन इंच की छाती पे लिखे जो आज की तारीख़ मे मदांध चीन से पीछे न खिसक बल्कि अपनी डिप्लोमेसी से चीन और पाकिस्तान को हर मोरचे पे थोड़ा-थोड़ा कर पीछे ढ़केल रहा है।
आज हम पलायित होने की बजाय चीन की आँख के उस सुअर की बाल का जवाब कुटनीतिक तरिके से दे रहे है अर्थात आज उसी के से अंदाज मे हमारी भी आँख बखूबी पुरी चाईनीज़ शैली मे पेच लडाये हुये है। यही चीज चीन की तिलमिलाहट का कारण भी बन रहा है जिसकी एक बानगी हमने उसके द्वारा अभी हाल ही मे डोकलाॅम मे देखी है
उसे हर मोर्चे पे भारत से मिल रहे करारे जवाब का ही ये प्रतिफल है जो वे ये कह रहा कि सिक्किम का डोकलाॅम उसके भू-भाग मे है एैसा उसने अपने एक नक्शे मे भी दर्शाया है,लेकिन हमारी भारतीय फौज लगातार वहाँ अपना सफल दबाव बनाये हुये है,इसी के तहत वहाँ के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया के माध्यम से ये कहाँ जाना कि---"भारत को 1962 के युद्ध से सबक लेना चाहिये और उसे अपनी सेना पंचशील संधि के तहत हटा लेनी चाहिये क्योंकि वे चीन का अपना भू-भाग है ये निरा बकवास और चीन का बिस्तारवादी नीति का बेहुदापन है नही तो सच ये है कि वे भू-भाग भुटान और भारत का अपना भू-भाग है ये भू-भाग सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है"। चीन को शायद अब ये आभास कराने का समय भी आ गया है कि "अब भारत 1962 के नेहरु का भारत नही बल्कि आज का काफी सुदृढ़ और मजबूत भारत है जो उस युग से काफी आगे निकल आया है,इसलिये अब हमे चीन 1962 की तरह डिल न करे"।अब हम उसकी विस्तारवादी नीति को सहे ये संम्भव नही, अभी हमारे सेनाध्यक्ष का भी एक करारा बयान आया था कि "हम और हमारी सेना ढ़ाई मोरचे पे लड़ने को तैयार है"। और शायद हमारे सेनाध्यक्ष के कथन कि झुंझलाहट ही थी की चाईना के डोकलाॅम के आस-पास आये चीनी सैनिको को हमारी भारतीय सेना ने ढ़केल बाहर किया वे चोट चीन के लिये असह्य और काफी पीड़ादायक हो गई,ये हम भारतियो के लिये गर्व का पल था।हमारे रक्षामंत्री अरुण जेटली ने भी चीन के 1962 वाले युद्ध के गीदड़ भभकी के जवाब मे कहाँ कि "अब चीन को भी थोड़ा सा ये समझ जाना चाहिये कि अब हम भी वे 1962 के भारत नही रहे"। सिक्किम के डोकलाॅम मे लगातार हमारी सेना का डटा रहना चीन को नागवार लग रहा,जब वहाँ उसे मुँह की खानी पड़ी तो उसने एक और चाल चली,उसने कुछ लड़ाकू बेड़े,पनडुब्बी जहाज़ आदि को भारतीय समुद्री सीमा के आस-पास भेज भारत को भयाक्रांत या डराने की कोशिश की और उसके इस ताजा-तरीन कोशिश का नीम की तरह का कड़वा फल उसे कल ही खाने या चखने को मिल गया,अर्थात विश्व की दो महान शक्तियो अमेरिका,जापान और भारत ने एक साथ दस दिनो का सामरिक युद्धाभ्यास किया जो कि अब तलक का सबसे तगड़ा तीन देशो का युद्धाभ्यास है,हालाँकि आज की तारीख़ में चीन की विस्तारवादी नीतियो के चलते विश्व के अधिसंख्य देश उससे मन ही मन चिढ़े हुये है। इस युद्धाभ्यास के नाते चीन एक टुच्चे और टभैये देश की तरह ये कह रहा है कि---भुटान का साथ जीस तरह भारत दे रहा है ठीक वैसे ही हम भारत मे कश्मीर घाटी के अलगाववादीयो,आतंकियो की मदत करने के लिये अपनी सेना को भेज सकते है।
आजादी के इतने साल बाद चीन को भी ये कल्पना न थी कि भारत एकदिन उस स्थिति तलक अपनी सफल डिप्लोमेसी के द्वारा पहुँच जायेगा कि उसके समकक्ष अपनी आँख दिखा उसकी गीदड़ भभकियो का शेर की गर्जना के साथ या शैली मे जवाब भी दे लेगा।
इस सारे बदलाव की जड़ का एकमात्र नायक आज हमारे देश के इतने बड़े लोकतन्त्र के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को जाता है,जो अरबो की जनसंख्या के इस देश को जब भी किसी देश मे प्रस्तुत करते है तो लगता है कि पहली बार हमारे इतने बड़े मुल्क कि वे छप्पन इंच की छाती बोल रही है जिसपे आज की तारीख़ मे हम सभी भारतवासियो को गर्व है।नरेन्द्र मोदी की सफल कूटनीतियो ने हमे मात्र तीन साल मे ही वहाँ पहुँचा दिया है जहाँ से पुरी दुनिया भारत को गौर से सुन और तक रही है। तीन साल मे ही मोदी जी ने वे करिश्मा कर दिखाया,जो इतने वर्षो या सालो की राजनीति में भारत के बड़े-बडे नेता या प्रधानमंत्री नही कर पाये,उनके उसी अदा और शैली की आज दुनिया दिवानी है"अमेरिका जैसी विश्व शक्ति वाले देश के राष्ट्रपति को भी अपने यहाँ के चुनाव मे मोदी-मोदी कहना पड़ा और उस नाम कि महिमा का सिक्का भी वहाँ चला और ट्रम्प वहाँ के राष्ट्रपति चुनकर आये"।
हमने तमाम किस्से और कहानिया बचपन मे सुनी व पढ़ी कि महाराजा विक्रमादित्य के दरबार मे नौ-रत्न थे या फिर अकबर की हुकूमत मे भी नौ-रत्न थे उसके बाद मै तिसरी बार एैज ऐ गवाह अपने समय की एक जिंदा कहानी को जीवित देखने का सुअवसर पा रहा हूं अर्थात मोदी जी की भी सत्ता मे हर विधा के एक से बढ़कर एक रत्न दिख रहे है।उनकी सबसे बड़ी और बेशकिमती अदा है किसी भी हद तलक जा देश हित मे लिये गये सरल और कठीन से कठीन निर्णय है।
ये उस लिये गये निर्णय की ही अदम्य शक्ति है जिससे चाईना का वर्तमान राष्ट्रपति सी जिनपिंग को दो-चार होना पड़ रहा है।उसके विस्तारवादी नीति का भारत के द्वारा गिरेबान पकड़ा जा रहा है,वे युद्ध की धमकी तलक देने से नही चुक रहा है,लेकिन भारतीय सेना के शौर्य,हौसले का अचानक से बढ़ जाना उसमे इज़ाफ़ा हो जाना खटक रहा है। सी जिनपिंग को उम्मीद न थी कि चीन के दुसरे सबसे सफल और महान राष्ट्रपति होने के गौरव से भारत वंचित कर देगा,और वंचित किया भी,वंचित करने के साथ हमारे सेनाध्यक्ष ने ये कह उसके सीने पे एक और असह्म कील ठोक दी कि" जिनपिंग हम और हमारी भारतीय सेना ढ़ाई मोर्चे पे लड़ने को तैयार है"।
रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।
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