सोमवार, 31 जुलाई 2017

एक बालक की मिट्टी के फूस के कच्चे घर से शिक्षा जगत की ऊचाइयों पर पहुँचने की छोटी सी कहानी





प्रदीप कुमार सिंह
स्वतंत्र पत्रकार


            बालक जगदीश का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के ग्राम बरसौली में एक गरीब खेतिहर किसान परिवार में 10 नवम्बर 1936 को हुआ। उनकी माता स्व. श्रीमती बासमती देवी एक धर्म परायण महिला थीं। उनके पिता स्व0 श्री फूलचन्द्र अग्रवाल जी गाँव के लेखपाल थे। बच्चे के सिर से माँ का साया बहुत कम उम्र में उठ गया। इस बालक को सर्वप्रथम समाज सेवा की शिक्षा अपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चाचा श्री प्रभुदयाल जी से मिली। चाचाजी महात्मा गांधी के परम अनुयायी थे। स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होंने अनेक बार जेल यात्रायें की। उन दिनों जगदीश अन्य बच्चों को लेकर आजादी के नारे लगाते हुए और आजादी के गीत गाते हुए अपने गाँव में प्रभात फेरियाँ निकाला करते थे।  

आगे जहाँ और भी होता है




साधना सिंह
      गोरखपुर 

बडे़ दिनो के बाद वो छत पर नजर आया था,  दिल जोर से धड़का पर मैने मुंह घुमा लिया । तभी मम्मी ने आवाज दी- अंजलि !
आई माँ..  ! चोरी चोरी एक बार और उधर देखा तो वो जा चुका था । मै भी नीचे उतर आयी । मन बार बार अतीत की तरफ भाग रहा था । जल्दी -जल्दी काम निपटा अपने कमरे मे गयी,  दरवाजा बंद करके एक गहरी सांस ले खिडकी की तरफ  देखा ।

आशा


मंगलवार, 25 जुलाई 2017

नारी मन - ये खाना - खाना क्या लगा रखा है ?




जब भी आँखें बंद करके माँ को याद करती हूँ तो कभी कमर पर पल्लू कस कर पूरी तलते हुए , तो कभी सिल बटने पर चटनी या मसाला पीसते हुए तो कभी हमारे पीछे लंच बॉक्स ले कर दौड़ते हुए , यही दृश्य याद आते हैं | इससे इतर माँ का कोई रूप ध्यान ही नहीं आता | शायद माँ भी जब अपनी माँ को याद करती होंगी या नानी अपनी माँ को या मेरी बेटी मुझे उसे माँ का यही रूप दिखाई देता होगा | भले ही रसोई और पहनावा अलग –अलग हो पर माँ और भोजन या  पोषण शब्द एक दूसरे में घुल –मिल गए हैं | पर आज मुझे कोई दूसरी माँ ही याद आ रही हैं | एक टी वी धारावाहिक की माँ |  

दिशा




डॉ संगीता गांधी 
" सर ,आतंकी हमले में 20 सैनिक मारे गए हैं ।अब कुछ कड़े कदम उठाने पड़ेंगे ।जनता बहुत  आक्रोशित है ।"
ग्रह मंत्रालय  के एक अधिकारी ने आकर सूचना दी ।
क्या करें ? "यदि कुछ एक्शन लेते हैं  तो मानवाधिकार वाले  शोर मचा देते हैं । विपक्षी  तुरन्त सरकार पर  एकपक्षीय होने का आरोप लगा देते हैं ।न्यायलय हाथ बांध देता है !" 
सरकार  बहुमत होते हुए भी लाचार सी है --मंत्री जी बोले ।

बच्चों की बालसुलभ भावनायें - माता-पिता धैर्य के साथ आनंद लें




- शान्ति पाल, लखनऊ
            कुछ बच्चे अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण कुछ न कुछ पूछते हीं रहते हैं- यह क्या है, ऐसा क्यों होता है, आदि-आदि। अगर इन प्रश्नों का सही उत्तर उन्हें मिल जाये तो उन्हें अधिक सोचने का मौका मिलता है। माता-पिता को ऐसे बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके विपरीत माता-पिता झिड़की देकर अथवा डांट-डपट कर बच्चों के मनोभावों का दमन करते हैं और बाल चिकित्सकों के अनुसार बच्चे के मन को कुंठित करने का एक तरीका यह भी है कि उसकी स्वाभाविक जिज्ञासा को दबाने के लिए उसे झिड़किया दी जाएं और उसे डराया धमकाया जाए।

वेदना का पक्ष




संजय वर्मा"दृष्टी"
स्त्री की उत्पीड़न की 
आवाज टकराती पहाड़ो पर
और आवाज लौट  आती
साँझ की तरह 

सोमवार, 24 जुलाई 2017

सुनो सखी , विश्राम कहाँ है ?

सुनो सखी !विश्राम कहाँ है ?

महबूब के मेंहदी की रस्म है

रोऊँगा नही मै------------------- आज मेरी महबूब के मेंहदी की रस्म है। भीच लुंगा होंठ को दाँतो से कुचलकर, एै खुदा चढ़े-

एंटन चेखव की अनूदित रूसी कहानी कहानी निंदक - अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

 
                                                      



               सुलेख के शिक्षक सर्गेई कैपितोनिच अख़िनेयेव की बेटी नताल्या की शादी इतिहास और भूगोल के शिक्षक इवान पेत्रोविच लोशादिनिख़ के साथ हो रही थी । शादी की दावत बेहद कामयाब थी । सारे मेहमान बैठक में नाच-गा रहे थे । इस अवसर के लिए क्लब से किराए पर बैरों की व्यवस्था की गई थी । वे काले कोट और मैली सफ़ेद टाई पहने पागलों की तरह इधर-उधर आ-जा रहे थे । हवा में मिली-जुली आवाज़ों का शोर था । बाहर खड़े लोग खिड़कियों में से भीतर झाँक रहे थे । दरअसल वे समाज के निम्न-वर्ग के लोग थे जिन्हें विवाह-समारोह में शामिल होने की इजाज़त नहीं थी ।

गरीबों को मुफ्त में दवा बांटना मेरा मिशन है - ओमकार नाथ शर्मा





संकलन - प्रदीप कुमार सिंह 

            मैं उदयपुर, राजस्थान का रहने वाला हूं। मैंने नोएडा के कैलाश अस्पताल में बारह-तेरह साल नौकरी की है। मैं गरीबों को मुफ्त में दवाएं बांटने के मिशन से कैसे जुडा, इसकी एक कहानी है। वर्ष 2008 में दिल्ली के लक्ष्मीनगर में जब मेट्रो का काम चल रहा था, तब वहां एक दुर्घटना हुई, जिसमें कुछ लोग मरे, तो कुछ घायल हुए। ये सभी गरीब लोग थे। मैं तब संयोग से लक्ष्मीनगर से गुजर रहा था और बस में बैठा था। दुर्घटनास्थल पर मैं उतर गया। चूंकि अस्पताल में काम करने का मेरा अनुभव था, इसलिए मैं भी घायलों के साथ तेगबहादुर मेडिकल काॅलेज अस्पताल में चला गया। वहां मीडिया की भारी भीड़ थी, इसलिए मरीजों के प्रति डाॅक्टरों का रवैया रक्षात्मक था। लेकिन मैंने देखा कि गंभीर रूप से घायल मरीजों को भी डाॅक्टर दवा न होने की बात कहकर लौटा रहे हंै। मैं यह देखकर स्तब्ध रह गया। मेरे मन में सवाल उठने लगे कि दवा के अभाव में होने वाली मौतों को कैसे रोका जाए। छह-सात दिन मंथन करने के बाद मैंने फैसला कर लिया कि जहां तक संभव होगा, मैं गरीबों को दवाएं बाटूंगा और दवाओं के अभाव में उन्हें मरने नहीं दूंगा।

रविवार, 23 जुलाई 2017

#NaturalSelfi ~ सुंदरता की दुकान या अवसाद का सामान


                                                  

#NaturalSelfi,ये मात्र एक शब्द नहीं एक अभियान हैं | पिछले कुछ दिनों से इस हैशटैग से महिलाएं  फेसबुक पर अपनी तसवीर पोस्ट कर रहीं  हैं| यह मुहीम बाजारवाद के खिलाफ है |  इस मुहिम की शुरुआत की है  गीता यथार्थ यादव ने |   बाजार जिस तरह सौंदर्यबोध को प्रचारित कर रहा है और मेकअप प्रोडक्ट बेचे जा रहे हैं, उसके खिलाफ यह महिलाओं को ऐलान है कि वे बिना मेकअप के भी सुंदर हैं | 
                           सुन्दरता के इस चक्रव्यू में महिलाओं को फंसाने का काम सदियों से चला आ रहा है |आज भी ये शोध का विषय है की क्लियोपेट्रा  किससे  नहाती थी | आज भी सांवली लड़की पैदा हिते ही माता - पिता के चेहरे उतर जाते हैं की उसका ब्याह कैसे करेंगे | योग्य वर कैसे मिलेगा ? बचपन से ही उसका आत्मसम्मान बुरी तरह कुचल दिया जाता है | और शुरू होता है लड़की को स्त्री बनाने की साजिश | उसमें मुख्य भूमिका अदा करता है उसका सौन्दर्य |  यह माना जाता रहा है की सुन्दरता स्त्री के अन्य गुणों के ऊपर है या कम से कम साथ तो है ही | दुर्भाग्य है की स्त्री शिक्षा व् जागरूकता के साथ - साथ  एक नया कांसेप्ट आया ब्यूटी विद ब्रेन का | बाजारवाद  ने इसको हवा दे दी | मतलब स्त्री ब्रेनी है तो भी  उसके ऊपर ख़ूबसूरती बनाये रखने का दवाब भी है | ये दवाब है खुद को नकारने का , बाज़ार के मानकों में फिट होने का , ऐसी स्किन , ऐसे हेयर और ऐसी फिगर .... इन सब  के बीच अपना करियर , अपनी प्रतिभा अपना हुनर बचाए रखने की जद्दोजहद | 
                                         एक तरफ हम सुखी जीवन जीने के लिए self love को प्रचारित करते हैं | वहीँ मेकअप कम्पनियां स्त्री को खुद को कमतर समझने और हीन भावना भरने की जुगत में लगी  रहती हैं |  ये आई ब्रो के बाल तोड़ने से पहले आत्मविश्वास तोड़ने का काम करती हैं | ये ख़ुशी की बात हैं की आज महिलाएं खुद आगे आई हैं | उन्होंने न सिर्फ इस जाल को समझा है बल्कि उसे नकारना भी शुरू किया है | 

                                                                    बहुत पहले  इसी विषय पर कविता लिखी थी ... " सुन्दरता की दु कान या अवसाद का सामान " | आज ये #NaturalSelfi अभियान उसी दर्द का मुंहतोड़ जवाब है | 


सुधरने का एक मौका तो मिलना ही चाहिए - मार्लन पीटरसन, सामाजिक कार्यकर्ता


        संकलन: प्रदीप कुमार सिंह  

    कैरेबियाई सागर का एक छोटा सा देश है त्रिनिदाद और टोबैगो। द्वीपों पर बसे इस मुल्क को 1962 में आजादी मिली। मार्लन के माता-पिता इसी मुल्क के मूल निवासी थे। उन दिनों देश की माली हालत अच्छी नहीं थी। परिवार गरीब था। लिहाजा काम की तलाश में वे अमेरिका चले गए।

            मार्लन का जन्म बर्कले में हुआ। तीन भाई-बहनों में वह सबसे छोटे थे। अश्वेत होने की वजह से परिवार को अमेरिकी समाज में ढलने में काफी मुश्किलें झेलनी पड़ीं। सांस्कृतिक और सामाजिक दुश्वारियों के बीच जिंदगी की जद्दोजहद जारी रही। शुरूआत में मार्लन का पढ़ाई में खूब मन लगता था, पर बाद में मन उचटने लगा। उनकी दोस्ती कुछ शरारती लड़कों से हो गई। माता-पिता को भनक भी नहीं लग पाई कि कब बेटा गलत रास्ते चल पड़ा?

समाज के हित की भावना ही हो लेखन का उद्देश्य






 किरण सिंह 
जिन भावों में हित की भावना समाहित हो वही साहित्य है तथा उन भावों को शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत करने वाला ही साहित्यकार कहलाता है  |

ऐसे में साहित्यकारों पर सामाजिक हितों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी पड़ जाती है जिसका निर्वहन उन्हें पूरी निष्ठा व इमानदारी से करना होगा ! साथ ही सरकार को भी नवोदित साहित्यकारों के उत्थान के लिए भी कदम उठाना होगा! पत्र पत्रिकाओं अखबारों आदि ने तो साहित्यकारों की कृतियों को समाज के सम्मुख रखते ही आये हैं साथ ही सोशल मीडिया ने भी इस क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसके परिणाम स्वरूप आज हिन्दी साहित्य जगत में रचनाकारों की बाढ़ सी आ गई है  ( खास तौर से महिलाओं की ) जो निश्चित ही साहित्यक क्रांति है! 

अगर सावन न आइ (भोजपुरी )


रंगनाथ द्विवेदी
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान------- अगर सावन न आई। रहि-रहि के हुक उठे छतियाँ मे दुनौव, लागत हऊ निकल जाई बिरहा में प्रान------- अगर सावन न आई।
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान------ अगर सावन न आई।

शनिवार, 22 जुलाई 2017

नाबालिग रेप - पीडिता को मिले गर्भपात कराने का अधिकार



दीपेन्द्र कपूर 
आजकल मीडिया, न्यूज़ पेपर ,टी वी चैनल्स पर एक न्यूज आग की तेजी से फैली हुई है 10 वर्ष की बच्ची के गर्भवती होने और कोर्ट के गर्भपात करने की इजाज़त नही दिए जाने की ...! ये किसी नाबालिग के बलात्कार का पहला मामला नही है...ऐसे जाने कितने मामले न्यायालय में लंबित और विचाराधीन है...जो न्यायालय तक पहुचे हैं। और कितने ही ऐसे मामले हैं जो न्यायालय तक पहुंच ही नही पाते । खैर आइए जानते है ये पूरा मामला आखिर है क्या? ...

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

आशा


जब कालिदास नन्ही बच्ची से शास्त्रार्थ में पराजित हुए



 नीलम गुप्ता
महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था. शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था. अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया.उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा. उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं. एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए.
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दूसरा विवाह





मीना पाण्डेय 

"
सॉरी ,आने में जरा देर हो गयी , आपने कुछ लिया , चाय -कॉफ़ी !! " 
"
वो सब बाद में , पहले काम !! "
"
ठीक है , देखिये ये हम दोनों का दूसरा विवाह है , इसलिए कुछ बातें स्पष्ट हो जायें तो बेहतर होगा I "
"
जी "

मकान नंबर 13



 प्रतिभा  पांडे 

उस  पॉश  कॉलोनी   के ब्लाक 2  मकान नंबर 13  में आज सुबह से ही मीडिया वालों और पुलिस का आना जाना लगा था I  ब्लाक 2 के बाकी  सारे मकानों में आज सन्नाटा था  , चिड़िया भी बाहर नहीं दिख  रही थी I पार्क  में भी सन्नाटा  था I
और दिनों इसका उल्टा होता था I इस ब्लाक में सुबह से रौनक हो जाती थी I  कारें  धुलती थीं ,पार्क में योग, ध्यान, जॉगिंग और मंदिर में भजन चलते रहते थे,  और मकान न  13 में सन्नाटा  रहता था I

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

झगडा


इको जिंदगी की


सरिता जैन 
एक बच्चे ने अपने पिता से पूंछा ," पिताजी ये जिन्दगी क्या है | और ये हम सब के प्रति अलग - अलग व्यवहार क्यों करती है |नन्हें बेटे के मुँह से ये प्रश्न सुन कर पिताजी सोंच में पड़ गए | आखिरकार उन्होंने बच्चे को जीवन की पाठशाला से सिखाने का मन बनाया | और वो बेटे के साथ एक ऐसी जगह पर गए जो चरों तरफ से पहाड़ियों से घिरी थी | पिता की अँगुली थामे आगे बढ़ते हुए बेटा बहुत खुश था | अचानक से वो पिता का हाथ छुड़ा  कर तेजी से आगे बढ़ा | 

बरसने की जरुरत न पड़े




रंगनाथ द्विवेदी
या खुदा-------------- उसके रोने से धुल जाये मेरी लाश इतनी, कि बदलियो को घिर-घिर के बरसने की जरुरत न पड़े। वे तड़पे इतना जितना ना तड़पी थी मेरे जीते, ताकि मेरी लाश पे किसी गैर के तड़पने की जरुरत न पड़े।

सफल व्यक्ति ~आखिर क्या है इनमें ख़ास


पंकज प्रखर 
मानव ईश्वर की अनमोल कृति है लेकिन मानव का सम्पूर्ण जीवन पुरुषार्थ के इर्दगिर्द ही रचा बसा हैगीता जैसे महान ग्रन्थ में भी श्री कृष्ण ने मानव के कर्म और पुरुषार्थ पर बल दिया है रामायण में भी आता है “कर्म प्रधान विश्व रची राखा “ अर्थात बिना पुरुषार्थ के मानव जीवन की कल्पना तक नही की जा सकती इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पढ़े है जो पुरुषार्थ के महत्व को प्रमाणित करते है हम इतिहास टटोलकर देखें तो ईसा मसीह,सुकरात, अब्राहम लिंकन,कालमार्क्स ,नूरजहाँ,सिकंदर आदि ऐसे कई उदाहरण इतिहास में विद्यमान है जिन्होंने अपने निजी जीवन में बहुत से दुःख और तकलीफें झेली इनके जीवन में जितने दुःख और परेशानियां आई इन्होने उतनी ही मजबूती के साथ उनका मुकाबला करते हुए न केवल एक या दो बार बल्कि जीवन में अनेको बार उनका डटकर मुकाबले किया और अपने प्रबल पुरुषार्थ से उन समस्याओं और दुखों को परास्त करते हुए इतिहास में अपना एक सम्माननीय स्थान बना लिया |


मां ने कभी हारने नहीं दिया - पैरालंपिक गोल्ड मेडलिस्ट मरियप्पन थंगावेलु के जीवन का साहस भरा जज्बा तथा जुनून



संकलन-प्रदीप कुमार सिंह

मरियप्पन का जन्म तमिलनाडु के सेलम जिले से 50 किलोमीटर दूर पेरियावादागामपट्टी गांव में हुआबचपन में ही पिता परिवार छोड़कर चले गए। परिवार मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। चार बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी अकेले मां पर आ गई। गुजर-बसर करने के लिए कुछ दिनों तक उन्होंने ईंट भट्टे पर मजदूरी की। बाद में सब्जी बेचने लगीं। दुश्वारियों भरे दिन थे वे। सब्जी बेचकर इतनी कमाई नहीं हो पाती थी कि चारों बच्चों को भरपेट खाना खिलाया जा सके। इसके बावजूद मां चाहती थीं कि किसी तरह बच्चों की पढ़ाई जारी रहे, ताकि आगे चलकर उन्हें अच्छी जिंदगी नसीब हो। खुद अनपढ़ होने के बावजूद उन्होंने चारों बच्चों को स्कूल भेजा।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

जीरो


लड़का हो या लड़की मकसद होता है हराना जीना इसी का नाम है - जमुना बोडो: महिला बाॅक्सर

संकलन - प्रदीप कुमार सिंह
            असम के शोणितपुर जिले में छोटा सा गांव है बेलसिरि। यह ब्रह्नमपुत्र नदी के किनारे बसा आदिवासी इलाका है। घने जंगलों व प्राकृतिक नजारों से भरपूर इस इलाके में रोजगार के नाम पर लोगों को मेहनत-मजदूरी का काम ही मिल पाता है। कुछ लोग फल-सब्जी बेचकर जीवन गुजारते हैं। आर्थिक बदहाली के बावजूद पिछले कुछ साल में यहां के युवाओं में खेल के प्रति रूझान बढ़ा है। जमुना दस साल की थीं, जब पापा गुजर गए। बड़ी बेटी की शादी करनी थी। छोटी को पढ़ाना था। बेटे को नौकरी दिलवानी थी। सब कुछ बीच में ही छूट गया। बच्चे सदमे में थे। मां बेहाल थीं। अब बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी उन पर थी। जमुना बताती हैं, मां पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर उनमें गजब का हौसला था। समझ में नहीं आ रहा था कि घर कैसे चलेगा? फिर मां ने घर चलाने के लिए सब्जी बेचने का फैसला किया।

क्या आप वास्तव में खुश रहना चाहते हैं? :) :)






सीताराम गुप्ता
कौन है जो प्रसन्न रहना नहीं चाहता? हम सभी प्रसन्न रहना चाहते हैं। प्रसन्न रहने के लिए क्या कुछ नहीं करते लेकिन फिर भी कई बार सफलता नहीं मिलती। जितना प्रसन्नता की तरफ़ दौड़ते हैं प्रसन्नता और हममें अंतर बढ़ता जाता है। यदि जीवन में सचमुच प्रसन्न रहना चाहते हैं और हमेशा प्रसन्न रहना चाहते हैं तो निम्नलिखित बातों पर ध्यान देने का प्रयास करेंः

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

लली


मिताली ने डाइनिंग टेबल पर अपनी सारी फाइलें  फैला ली और हिसाब किताब करने लगी | आखिर गलती कहाँ हो रही है जो उसे घाटा हो रहा है | कुछ समझ में नहीं आ रहा है | एक तो काम में घाटा ऊपर से कामवाली का टेंशन | महारानी खुद तो गाँव चली गयीं और अपनी जगह किसी को लगा कर नहीं गयीं | पड़ोस की निधि से कहा तो है की अपनी कामवाली से कह कर किसी को भिजवाये | पर चार दिन हो गए अभी तो दूर – दूर तक कोई निशान दिखाई नहीं दे रहे हैं | आखिर वो क्या – क्या संभाले ? अपने ख्यालों को परे झटक कर मिताली फिर हिसाब में लग गयी | तभी दिव्य कमरे में आये | उसे देख कर बोले ,” रहने दो मिताली तुमसे नहीं होगा | ये बात मिताली को तीर की तरह चुभ गयी | दिव्य को देख कर गुस्से में चीखती हुई बोली ,” क्या कहा ? मुझसे नहीं होगा ... मुझसे , मैं MBA हूँ | वो तो तुम्हारी घर गृहस्थी के चक्कर में इतने साल खराब हो गए , वर्ना मैं कहाँ से कहाँ होती | वो ठीक हैं मैडम पर आपके इस प्रोजेक्ट के चक्कर में मेरा बैंक बैलेंस कहाँ से कहाँ जा रहा है | दिव्य ने हवा में ऊपर से नीचे की और इशारा करते हुए कहा | मिताली कुछ कहने ही वाली थी की तभी बाहर से आवाज़ आई ,” लली “

उन्हें पानी पिलाता हूूँ जिन्हें लोग दुत्कारते हैं - ओकारनाथ कथारिया



संकलन - प्रदीप कुमार सिंह  
            मैं 2012 से दिल्ली की सड़कों पर आॅटो चला रहा हूं। शुरू से गर्मी के दिनों में, खासकर जब तेज लू चल रही होती है, तब सड़कों पर आॅटो चलाना मेरे लिए काफी कठिन होता था। मैंने देखा, इस मौसम में कई आॅटो वाले पेड़ों की घनी छाया में आॅटो खड़े कर सो जाते थे। मैं चूंकि किसी मजबूरी में ही इस पेशे में आया, लिहाजा मेरे लिए ऐसा करना संभव नहीं था। लेकिन जब मैंने चिलचिलाती धूप में रेड लाइट पर सामान बेचने वाले लोगों और खासकर बच्चों की परेशानियां देखीं, तब मेरा दिमाग घूम गया।

दर्द


सोमवार, 17 जुलाई 2017

जमीन में गड़े हैं / jameen mein gade hain



                                                               एक बच्चा था | वह किसी गाँव में अपने माता - पिता व् दादी के साथ रहता था | उनका परिवार  सामान्य था | परन्तु तभी एक दुर्घटना घटी और उस बच्चे के माता -  पिता की मृत्यु हो गयी |माता -  पिता की मृत्यु होते ही उस परिवार की आर्थिक स्तिथि बिगड़ने लगी | दादी को मजबूरी में दुसरे घरों में काम पर जाना पड़ता | पर वो पैसे इतने ज्यादा नहीं थे की उनका घर अच्छे से चल पाता | ऐसी ही तंगहाली में वो बच्चा बड़ा होने लगा | अब वो स्कूल जाने लगा था | उसके दोस्त बन गए थे | बच्चा अक्सर देखता की उसके दोस्तों के घर उसके रिश्तेदार आते | उसके मन में प्रश्न उठता की आखिर उसके घर में रिश्तेदार क्यों नहीं आते हैं |आखिर वो हैं कहाँ ?  उसने रात में यही प्रश्न अपनी दादी से किया | दादी ने प्यार से उसका सर सहलाते हुए जवाब दिया की उसके  तो बहुत से रिश्तेदार हैं | पर क्या करे वो जमीन में गड़े हैं |

सुने अपने अंत : प्रेरणा की आवाज़



अपनी अंत : प्रेरणा से निर्णय लें | तब आप की गलतियाँ आपकी अपनी होंगीं , न की किसी और की - बिली विल्डर
_________________________
जीवन अनिश्चिताओं से भरा पड़ा है | ऐसे में हर कदम - कदम हमें निर्णय लेने पड़ते हैं | कुछ निर्णय इतने मामूली होते हैं की उन का हमारी आने वाली जिंदगी पर कोई असर नहीं पड़ता | पर कुछ निर्णय बड़े होते हैं | जो हमारे आने वाले समय को प्रभावित करते हैं | ऐसे समय में हमारे पास दो ही विकल्प होते हैं | या तो हम अपनी अंत : प्रेरणा की सुने | या दूसरों की राय का अनुसरण करें | जब हम दूसरों की राय का अनुकरण करते हैं तब हम कहीं न कहीं यह मान कर चलते हैं की दूसरा हमसे ज्यादा जानता है | इसी कारण अपनी " गट फीलिंग " को नज़र अंदाज़ कर देते हैं | 

अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं ( हास्य - व्यंग कविता )


रंगनाथ द्विवेदी
अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं। आ गये अच्छे दिन--------- मै इलू-इलू गा रहा हूं, अनार से महंगा टमाटर खा रहा हूं।
मार्केट से सभी सब्ज़ियाँ तो ले ली, पर टमाटर को लेने मे लग गये घंटो, क्योंकि सभी एक से भाव मे बेच रहे थे, यहाँ तलक कि टमाटर को बिना मतलब छुने से रोक रहे थे, थक-हार एक ठेले वाले को पटा रहा हूं------ बड़ी मुश्किल से घर टमाटर ला रहा हूं,

रविवार, 16 जुलाई 2017

मेरी पहचान , मेरी प्रतिभा


छुट्टी का दिन


नीलम गुप्ता
आज छुट्टी का दिन है .........

आज
 बच्चे देर से उठेंगे
तय नहीं है
कब नहायेंगे
नहायेंगे भी या नहीं
घर भर में फ़ैल जायेंगी
किताबें , अखबार के पन्ने ,
मोज़े , कपडे , यहाँ वहां इधर - उधर
सारा दिन चलेगा
 टीवी , मोबाइल और कम्प्यूटर

अर्नेस्ट हेमिंग्वे की अनूदित अमेरिकी कहानी : पुल पर बैठा बूढ़ा

  

                       
                                                        --- मूल कथा : अर्नेस्ट हेमिंग्वे
                                                        --- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय


               स्टील के फ़्रेम वाला चश्मा पहने एक बूढ़ा आदमी सड़क के किनारे बैठा था । उसके कपड़े धूल-धूसरित थे । नदी पर पीपों का पुल बना हुआ था और घोड़ा-गाड़ियाँ , ट्रक , मर्द , औरतें और बच्चे उस पुल को पार कर रहे थे । घोड़ा-गाड़ियाँ नदी की खड़ी चढ़ाई वाले किनारे से लड़खड़ा कर पुल पर चढ़ रही थीं । सैनिक पीछे से इन गाड़ियों को धक्का दे रहे थे । ट्रक अपनी भारी घुरघुराहट के साथ यह कठिन चढ़ाई तय कर रहे थे और किसान टखने तक की धूल में पैदल चलते चले जा रहे थे । लेकिन वह बूढ़ा आदमी बिना हिले-डुले वहीं बैठा हुआ था । वह बेहद थक गया था इसलिए आगे कहीं नहीं जा सकता था ।

क्षितिज संस्था की पावस काव्य गोष्ठी



वर्षा ऋतु के स्वागत में क्षितिज संस्था द्वारा देवी अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय इंदौर के अध्ययन कक्ष में  'पावस कविता गोष्ठी' का आयोजन किया गया।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि,आलोचक डॉ ओम ठाकुर थे। अध्यक्षता व्यंग्यकार एवं वरिष्ठ उपन्यासकार श्री अश्विनी कुमार दुबे ने की।

राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " जी की कवितायें





******स्थिति और परिस्थिति******


स्थिति और परिस्थिति
सभी को अपने ढ़ंग से नचाता है....
कोई याद रखता है ,
कोई भूल जाता है !
जो काम स्थिति वश 
बहुत अच्छा होता है.....
वही काम परिस्थिति वश
बहुत बुरा बन जाता है....

शनिवार, 15 जुलाई 2017

जिंदगी की हकीकत


गुमनाम गांव से संसद तक तक सफर - फावजिया कूफी, मानव अधिकार कार्यकर्ता



संकलन: प्रदीप कुमार सिंह
            फावजिया का जन्म अफगानिस्तान के एक सियासी परिवार में हुआ। उनके पिता की सात पत्नियां थी। परिवार में पहले से 18 बच्चे थे। मगर पिता संतुष्ट नहीं थे। वह चाहते थे कि घर में एक और बेटा पैदा हो। इस बीच फावजिया का जन्म हुआ। वह 19वीं संतान थीं। मां को जब पता चला कि उन्होंने बेटी को जन्म दिया है, तो वह डर गई। उन्हें लगा कि उनके शौहर को यह पसंद नहीं आएगा। इसलिए नवजात बच्ची को घर के बाहर चिलचिलाती धूप में मरने के लिए छोड़ दिया। मगर अल्लाह को कुछ और मंजूर था। कुछ घंटों के बाद देखा गया, तो बच्ची जिंदा थी। मां का दिल पिघल गया। उसे गले लगाते हुए तय किया कि चाहे जो हो जाए, वह बच्ची को पालेंगीं।

शराब नही लेकिन




-रंगनाथ द्विवेदी। तेरी सरिया मे शराब नहीं लेकिन----------- हम पीने वालो के लिये खराब नही लेकिन। हम बाँट लेते है अक्सर नशे मे जूठन भी----- यहाँ के पंडित और मियाँ का जवाब नही लेकिन, तेरी सरिया मे शराब नही लेकिन।

शैतान का सौदा



एक बार  एक पादरी रास्ते पर टहल रहा था। उसने एक आदमी को देखा, जिसे अभी-अभी किसी नुकीले हथियार से मारा गया था। वह आदमी अपने चेहरे के बल रास्ते पर गिरा हुआ था, सांस के लिए संघर्ष कर रहा था और दर्द से कराह रहा था। पादरियों को हमेशा यह सिखाया जाता है कि करुणा सबसे बड़ी चीज होती है, प्रेम का मार्ग ही ईश्वर का मार्ग है। स्वभावतः वह उस आदमी की तरफ दौड़ा। उसने उसे सीधा किया और देखा तो वह खुद शैतान ही था। वह अचंभित रह गया, डर कर तुरंत पीछे की तरफ हट गया।

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

मौन


बाल कहानी : अच्छी मम्मी , गन्दी मम्मी / achhi mummy , gandi mummy


अगर किसी बच्चे से पूंछा जाए ," बेटा मम्मी कैसी होती हैं ? तो वो क्या जवाब देगा : सबसे अच्छी |पर आज हम बात कर रहे हैं उस बच्चे की ,जिसको अपनी मम्मी गन्दी  नज़र आयीं | जाहिर है माँ का दिल तो टूट ही जाएगा | जिस बच्चे के लिए इतनी मेहनत करो , चिंता करो फिर भी वो हमको गन्दा कहता है | पर देखना यह है की , फिर कैसे उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और अपनी मम्मी उसे अच्छी नज़र आने लगीं |  तो चलते हैं नीता भाभी के घर , जहाँ उनके ननद स्वेता आई हुई है | 

                                    अरे ये क्या ! आज फिर नीता भाभी की आँखों में आंसू थे | क्यों भाभी अब आज क्या हुआ ननद स्वेता ने पूँछ ही लिया | हालांकि उसे पता था बात जरूर चिंटू की होंगी | उसी ने दिल दुखाया होगा नीता भाभी का

गरीबों का जीवन स्तर उठाना मेरा मकसद- एनी फेरर


          
संकलन - प्रदीप कुमार सिंह 

  मेरा जन्म इंग्लैंड में हुआ था। वर्ष 1963 में अपने भाई के साथ मैं भारत आई और फिर यहीं की होकर रह गई। मुंबई में पढ़ाई की और फिर पत्रकार के तौर पर एक पत्रिका में काम करने लगी। उस वक्त मेरी उम्र करीब 18 वर्ष रही होगी। वर्ष 1968 में एक इंटरव्यू के सिलसिले में मेरी मुलाकात स्पेन से आए मिशनरी विन्सेंट फेरर से हुई। उन दिनों वह महाराष्ट्र के मनमाड़ में रहकर गरीबों की मदद करने में जुटे थे। उनके विचारों और गरीबों के प्रति उनकी सेवा-भावना ने मुझे काफी प्रभावित किया। मैंने नौकरी छोड़ दी और में भी उनके साथ गरीबों की सेवा में जुट गई।

तुम्हीं से है........


सुमित्रा गुप्ता 

तुम्हीं से है........ 
कभी शिकवा शिकायत है
कभी मनुहार इबादत है
मेरे प्यारे, मेरे भगवन, मेरे बंधु,
तुम्हीं से है, तुम्हीं से है 
पायी तेरी इनायत है 
करी तेरी इबादत है 
तू सामने हो या ना भी हो 
मुझे तेरी जरूरत है 

रक्त दान की प्रार्थना






आत्मीय बन्धुआंे से रक्त-दान की प्रार्थना - मेरी प्यारी बहिन श्रीमती शांति पाल ‘प्रीति’ का ब्लड कैंसर का इलाज पिछले चार महिनों से पीजीआई, लखनऊ से चल रहा है। डाक्टर साहब ने आगे के इलाज के लिए बी-निगेटिव या ओ-निगेटिव ग्रुप या कोई भी ग्रुप के रक्त का 15 यूनिट रक्त का प्रबन्ध करने के लिए कहा है। इच्छुक व्यक्ति नीचे लिखे मोबाइल पर सम्पर्क कर सकते है। इस सहयोग के लिए हमारा परिवार आपका ऋणी रहेगा। आपकी परमपिता परमात्मा से उसके सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए की गयी एक प्रार्थना मेरी बहिन तथा हम परिवारजनों पर सबसे बड़ा उपकार है। आपका परिजन- विश्व पाल ‘विक्की’, लखनऊ मोबाइल/व्हाट्सअप - 9335554711

पंडित दीनदयाल उपाध्याय -एक प्रखर विचारक, उत्कृष्ट संगठनकर्ता तथा सत्यनिष्ठ नेता



- डाॅ. जगदीश गाँधी, संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

पंडित दीं दयाल उपाध्याय ( जन्म २५ सितम्बर १९१६–११ फ़रवरी १९६८) महान चिन्तक और संगठनकर्ता थे। वे भारतीय जनसंघ  के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने भारत  की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को " एकात्म मानववाद " जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी।दीनदयाल जी की मान्यता थी कि हिन्दू कोई धर्म या संप्रदाय नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय संस्कृति हैं वे भारतीय जनता पार्टी के लिए वैचारिक मार्गदर्शन और नैतिक प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी मजहब और संप्रदाय के आधार पर भारतीय संस्कृति का विभाजन करने वालों को देश के विभाजन का जिम्मेदार मानते थे। वह हिन्दू राष्ट्रवादी तो थे ही, इसके साथ ही साथ वे भारतीय राजनीति के पुरोधा भी थे। उनकी कार्यक्षमत और परिपूर्णता के गुणों से प्रभावित होकर डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी उनके लिए गर्व से सम्मानपूर्वक कहते थे कि- ‘यदि मेरे पास दो दीनदयाल हों, तो मैं भारत का राजनीतिक चेहरा बदल सकता हूं’।पाध्यायजी नितान्त सरल और सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य  में भी उनकी गहरी अभिरुचि थी। उनके हिंदी और अंग्रेजी के लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे। केवल एक बैठक में ही उन्होंने चन्द्रगुप्त नाटक लिख डाला था।इस वर्ष उनके कार्यों को सम्मान देने के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के जन्म शताब्दी को मनाया जा रहा है |  पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के सपनों के सच होने का समय अब आ गया है!अब वह दिन दूर नहीं जब भारत विश्व मंच पर पूरी दुनिया को राह दिखाने वाला होगा!आइये उनके बारे में और जाने ...

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

जरा झुको तो सही ?/ jara jhuko to sahi




एक घड़ा पानी से भरा हुआ रखा रहता था। उसके ऊपर एक कटोरी ढकी रहती थी। घड़ा अपने स्वभाव से ही बड़ा दयालु था । बर्तन उस घड़े के पास आते, उससे जल पाने को अपना मुख नवाते। घड़ा प्रसन्नता से झुक जाता और उन्हें शीतल जल से भर देता। प्रसन्न होकर बर्तन शीतल जल लेकर चले जाते। अब जो कटोरी उसके ऊपर ढकी थी वो बहुत दिन से यह सब देख रही थी। एक दिन उससे रहा न गया, तो उसने शिकायत करते हुए कहा , घड़े भाई 'बुरा न मानो तो एक बात पूछूं?' 'पूछो।' घड़े ने शांत स्वर में उत्तर दिया।