रविवार, 25 जून 2017

आग




लेखिका – स्मिता दात्ये
आग
“दीदी!”
हूँ ”
“तुमने आग देखी है?”
“क्या बात है छोटी अब तक सोई नहीीं? कैसी बातें कर रही है? सो जा”
“दीदी, आग बहुत जलाती है न? कैसा लगता होगा जलते समय?”
“छोटी, तेरी शादी हुए 28 साल होने को आए, पर है त अभी छोटी ही। इतने सालों में मैंने कितनी बार तुझे अपने घर बुलाया, रहने के लिए , पर तू कभी आई नहीीं। हमेशा महेशजी का बहाना करके बात टाल गई। इस बार तू ने खुद कहा की तुझे मुझसे मिलना है , मेरे घर रहने आना चाहती है। पता है मुझे कितनी खुशी हुई थी। तू ने कहा था की तू पूरा महीना भर रहना चाहती है। तुझे आए 7-8 दिन हुए हैं, पर त इतनी गुमसुम रहती है की क्या कह ूँ। कुछ बताती भी नहीीं। सच बता, क्या बात है?”
“कुछ नहीीं दीदी, मैं तो बस आग के बारे में सोच रही थी। क्या तुम्हें इस आग से भी भयंकर किसी ऐसी आग की जानकारी है, जो दिखाई नहीीं देती, पर तन-मन को जलाती है .. जलाती रहती है…?
“दीदी, तुम उठकर क्यों बैठ गई? दिन भर इतना काम करती रहती हो, थक जाती हो, रात को तो अच्छी नीींद मिलनी चाहिए । पर मेरे कारण तुम ठीक से सो भी नहीीं पा रही हो। ठीक है, अब मैं कुछ नहीीं कह ूँगी। तुम सो जाओ।“

“नहीीं छोटी, अब तो तुझे बताना ही पडेगा क्या बात है। मेरा मन कह रहा है कोई बहुत भयंकर बात है ज़रूर।“
“सच में दीदी, कुछ भी नहीीं। मैं तो बहुत खुश ह ूँ। महेशजी भी एकदम सीधे -सादे इंसान हैं।“
“हाूँ, वह तो हम जानते ही हैं। जब भी तुम्हारी बात चलती है, सब तुम्हारे भाग्य पर नाज करते हैं की छोटी को कितना सज्जन पति मिला है। उन्हें देखकर, उनसे मिलकर दुनिया में भलाई के जीवत होने पर भरोसा हो जाता है। तेरे जीवन में कभी कोई परेशानी आई ही नहीीं। सास-ससुर भी भले इन्सान थे, देवर और ननद अपने-अपने घर में सुखी। वक्त-जरूरत पर साथ देते हैं। महेशजी को अपनी रिसर्च से फुरसत नहीीं। जो परोसोगी, खा लेंगे। तुम अपने अड़ोसियों -पड़ोसियों को लेकर खुश। बस, कमी है तो एक बच्चे की।“
“अब वह बात क्यों दीदी। मैंने कहा न, अब तुम्हें तंग नहीीं करती। सो जाओ। मैं भी सो जाती ह ूँ।“
“अच्छा छोटी, सच बता, कभी तेरा मन नहीीं हुआ की कोई बच्चा ही गोद ले ले? हमें पता है की तेरी किस कमज़ोरी की वजह से त माूँ नहीीं बन सकी। पर गोद लेना तो संभव था न? तेरा कभी जी नहीीं किया ? महेशजी ने भी नहीीं पूंछा कभी?
“दीदी, अब बस भी करो न। मेरा कभी मन नहीीं हुआ की बच्चा गोद ले ल ूँ। अब अपना बच्चा अपना होता है। महेशजी ने भी कभी जोर नहीी दिया । बस, हो गई तसल्ली? अब सो जाऊूँ मैं? तुम सोचती बैठो।“
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“दीदी”,
“हाूँ छोटी।“
“सो गई क्या?”
“नहीीं, बस अब नीींद आने ही वाली है। पर तू तो कब की लेटी है, तुझे अब तक नीींद नहीीं लगी?”
“नहीीं, बस य ूँ ही कुछ खयाल मन में आ रहे थे।“
“अब क्या फिर कोई सवाल उठा है मन में?”
“दीदी, अस्पर्शा का क्या मतलब होता है?”
“लो. यह भी कोई बात हुई? तुम भाषा और साहित्य की जानकार, मैं ठहरी गंवार । मुझसे शब्दों का अर्थ पूछोगी, तो शायद अनर्थ हो जाएगा।“
“नहीीं, बताओ न!”
“तुम जानती हो। कफर भी, मेरा इम्तहान लेना चाहती हो तो सुन लो – अस्पर्शा का अर्थ होता है जिसे कभी किसी ने छुआ नहीीं. किसी ने स्पर्श नहीं किया । अब टीचरजी, बताओ मैंने सही उत्तर सही है या गलत?”
“ह ूँ।“
“इतनी आह क्यों भर रही हो? मैंने सही उत्तर दिया , इसललए परेशान हो गई क्या?”
“नहीीं दीदी। ऐसा कुछ भी नहीीं। तुमने ठीक कहा। चलो अब सो जाएूँ। बहुत नीींद आ रही है।“
“छोटी, कुछ बात तो है। जब तुझे अपनी दीदी पर भरोसा हो, तब बता देना। आ मेरे पास। जैसे बचपन में सोते थे, वैसे ही सोएूँगे आज।“
“आह, दीदी। कितना अच्छा लग रहा है। क्या किसी स्पर्श में इतना सुख होता है? मुझे कभी पता ही नहीीं चला। मेरी शादी हुई, विदा के समय माूँ से, तुमसे ललपटकर रोई थी, बस, किसी इन्सान का वह आखरी स्पर्श था।
“क्या कह रही है छोटी!”
“मैं अट्ठाईस सालों से किसी के स्पर्श के लिए तरसती रही ह ूँ, आज तुमसे वह सुख पाकर मेरी सारी इच्छाएूँ पू री हो गईं। अब कोई चाह बाकी नहीीं। अब यदि मौत भी आए, तो खुशी से गले लगा ल ूँगी।“
“कैसी बात कर रही है छोटी। मरे तेरे दुश्मन। मेरी तरफ देख, सच बता …अरे, सो गई क्या? इतनी जल्दी नीींद लग गई? लगता है सालों से चैन की नीींद नहीीं सोई। सो जा छोटी, अपनी दीदी के पास निश्चिन्त होकर सो जा।
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“दीदी”
“दीदी, सो गई क्या?”
“लगता है सो ही गई। आज सारा दिन किसी न किसी कारण से लोगों का आना-जाना लगा रहा। बेचारी पूरे दिन लगी रही। थक गई होगी। लेटते ही नीींद लग गई।“
“दीदी, कल तुमने कहा की क्या मैं अस्पर्शा का अर्थ नहीीं जानती। भला मुझसे बेहतर कौन जान सकता है इस शब्द का अर्थ ?
“छोटी, उठकर क्यों बैठ गई, नीींद नहीीं आ रही?”
“अरे दीदी, तुम जाग रही हो, मुझे लगा सो गई हो।“
“सो ही गई थी। पर तुम बार बार करवट बदलकर मुझे तंग कर रही हो।“
“सॉरी दीदी।“
“पगली, सॉरी कैसी बात की? मैं तो मजाक कर रही थी। पर ये तो बता,तू उठकर क्यों बैठ गई? नीींद नहीीं आ रही है क्या? अच्छा, मुझे नहीीं बताओगी अपने भीतर तुम क्या तूफ़ान छिपाए बैठी हो?”
“दीदी, सुहागरात के समय पति अपनी शारीररक कमज़ोरी को छिपाने के लिए पत्नी को एक पत्र दिखलाता है, जो पत्नी के किसी तथाकथित प्रेमी ने लिखा था। पत्नी को धमकाता है की यदि तुमने कभी मेरे बारे में किसी से कुछ भी कहा, तो याद रखना, तुम्हें बदनाम करने में मैं कोई कसर नहीीं छो दूंगा “
“तू किसकी बात कर रही है छोटी?”
“फिर पति अपने काम में दीवानों की तरह जुट जाता है। लोगों के सामने वह एक आदर्श पति है। आदर्श इन्सान। जो पत्नी को यह मानने और घोषित करने के ललए मजबूर करता है की माँ न बन पाना उसकी अपनी कमजोरी है, पति की नहीीं। दुनिया की नज़रों में वह ऐसा इन्सान है, जो पत्नी की माँ न बन पाने की कमजोरी को जानकर भी उसे कोई दुुःख नहीीं पहुूँचाता। लोगों के तानों से उसकी रक्षा करता है।“
“छोटी, किसके बारे में बता रही है? मुझे डर लग रहा है छोटी, सच बता, क्या बात है?”
“अपनी सारी कमजोरी का गुस्सा वह पत्नी पर उतारता है, इस बात का पता किसी को नहीीं चलता। पत्नी को पीडा पहुूँचाने के लिए वह एक अलग ही तरीका चुनता है, उसे छूता तक नहीीं। सुख, खुशी, के आवरण के नीचे कैसा दुुःख है, आदर्श इन्सान कैसा अत्याचारी है, कोई नहीीं जान पाता।“
“छोटी! छोटी! क्या हो गया है तुझे? यह … यह… कहीीं … कहीीं … तुम कहीीं महेशजी की बात तो नहीीं कर रही? सॉरी छोटी, मुझे ऐसा नहीीं कहना चाहिए था।“
“दीदी, दीदी, जरा बताओ तो, जिसे स्त्री का पति उसे छुए तक नहीीं, क्या वह कभी माँ बन सकती है?”
“छोटी ……..छोटी क्या कह रही है तू ! तू होश में तो है?”
“दीदी, तुमने कहा था न की ‘’ शब्द का अर्थ मुझे मालूम होना चाहिए । हाूँ दीदी, मुझे मालूम है, खूब मालूम है। मुझसे बेहतर कोई नहीीं जानता इसका अथच। शादी हुए 28 साल हो गए। पति संतान नहीीं दे सकता तो क्या हुआ, प्रेम तो दे सकता है न? क्या मेरा इतना भी भाग्य नहीीं था?”
“छोटी, कितना भयंकर बात कह रही है तू ? इतनी बडी भयानक सच्चाई तू ने हमसे क्यों छिपाई? समय पर पता चलता तो क्या तुझे महेशजी से छुटकारा नहीीं दिला सकते थे हम?”
“मैं बहुत कमजोर थी दीदी, उन्होंने मुझे बदनामी का भय दिखाया और मैं डर गई। समाज में, अपने घर में मेरी जो इज्ज़त बनी थी, उसे बिगडते देखने का साहस नहीीं था मुझमें। मैं जानती थी की वह पत्र झूठा है, पर क्या कोई मुझ पर विश्वास करता?”
“छोटी, कोशिश तो करनी थी। सारी उम्र इस तरह बिताई तूने! और हम सोचते रहे की छोटी कितनी भाग्यवान है, कितनी सुखी, तेरे इसी सुख की दुआयें मांगा करते थे हम की छोटी का यह सुख बना रहे। नहीीं जानते थे की यह सुख नहीीं था… आज के युग में तुझ जैसी कोई स्त्री होगी, इस बात पर कोई विश्वास नहीीं करेगा।“
“यह आग थी दीदी, आग। तन-मन को जलानेवाली आग। बताओ दीदी, क्या इस आग से भयंकर कोई और आग होगी? दिन -रात, चौबीसों घंटे मैं इस आग में जलती रही ह ूँ। एक दो नहीीं पूरे अट्ठाईस साल। इस आग को ठंडक में बदलने का हौसला तो मुझमें था ही नहीीं। न वह साहस था, न संस्कार थे और न कामना। अब और सहा नहीीं जाता दीदी। अब मुझे इस आग से छुटकारा चाहिए ।“
“छोटी, मैं कल्पना भी नहीीं कर सकती की तूने कैसे तरह अपनी उम्र बिताई होगी?”
“दीदी, कल की तरह मुझे अपने पास सुला लो। मैं इस सुख को भीतर तक महसूस कर तृप्त होना चाहती ह ूँ।“
“आ छोटी, आज तू मेरी छोटी सी बेटी है। मेरे पास आ, अपने मन को थोडा तो चैन पा लेने दे।“
“आह दीदी, बस इसी हालत में साूँस रुक जाए, तो मुझसे ज्यादा भाग्यवान कोई नहीीं। सो जाती ह ूँ।“
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“अरे, सुबह होने को आई। रात भर हम दोनों बातें ही करती रहीीं। मुझे तो अब अपने काम पर लगना होगा। पर छोटी को जगाना ठीक नहीीं। उसे सो लेने द ूँ। बाहर से दरवाजा बंद कर लेती हूँ ताकि उसकी नीींद में खलल न पडे।“
“काफी देर हो गई। छोटी को जगाना होगा।“
“अरे, दरवाजे की दरारों से यह धुआूँ कैसा? छोटी, उठ । अरे यह क्या?”
“छोटी …..छोटी….. यह तूने क्या किया छोटी?”
“मुझे माफ करना दीदी। मैं बस ये देख रही हूँ की ये आग कितना जला सकती है? क्या उस आग को यह आग ठंडा कर पाएगी? तुमसे सब कह दिया , मन हल्का हो गया। अब चैन से जा सकूंगी ।“
“नहीीं छोटी, नहीीं, तुम्हें कुछ नहीीं होगा। मैं हूँ न तुम्हारे पास। छोटी… आूँखें खोलो छोटी…”
“अब मुझे मत पुकारो दीदी। इस आग की शीतलता ने मेरे तन-मन में ठंडक भर दी है। उम्र भर की ठंडक । अब मुझे इस ठंडक को सीने से लगाककर उस पार जाने दो। विदा दो मुझे, दीदी, अंतिम विदा

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