रविवार, 25 जून 2017

ईद मुबारक ~हामिद का तोहफा

                   




  पतिदेव को टूर पर जाना था | मैं सामान पैक  करने में जुटी थी और ये जनाब टी वी देखने में | मुझे लगता है दुनिया भर के  पुरुष इस मामले में एक से ही हैं  | कहीं जाना हो तो कुछ सामन भले ही छूट जाए पर खबर एक भी न छूटे | खाना - पीना,  ओढना -बिछाना जैसे सब कुछ खबरे  ही हैं | पर आज तो हद हो गयी समय भागता ही जा रहा रह और ये हैं की टीवी पर ही नज़रे गडाए बैठे हैं | सारी  दुनिया की ख़बरों का जिम्मा आप ने ही लिया है क्या ,"बडबडाते हुए मैं टी वी बंद करने आई | पर श्रीमान जी मेरे इरादों को भांप कर मुझे रोकते हुए बोले अरे , रुको , रुको , इतनी महत्वपूर्ण बहस चल रही है | मैं टी वी की तरफ देखा | कुछ बड़े नामी गिरामी पत्रकार धर्म के मुद्दे पर बहस कर रहे थे | यूँ तो उन सब के कुछ नाम थे पर मुझे दिख  रहे थे कुछ ... जो सिर्फ मुसलमान थे , कुछ ... जो सिर्फ हिन्दू थे | पूरा मुकम्मल इंसान तो कोई था ही नहीं | 
                                  खैर इधर पतिदेव टूर के लिए निकले उधर मेरे खास रिश्तेदारों का फोन आ गया | वो मेरे घर आना चाहते हैं | यूँ तो कभी कोई आये जाए अच्छा ही लगता है | पर ये रिश्तेदार बड़े ही हाई - फाई व् दिखावा पसंद थे | अपनेघर की नाक न कटे इसका  ध्यान मुझे ही रखना था |मैं शॉपिंग लिस्ट मन ही मन तैयार करने लगी |  तभी  ही मेरा दिमाग बेड रूम की तरफ गया | दरसल  बेडरूम की की अलमारी  बिलकुल सड़ गयी थी | कुछ समय पहले ही पता चला था की दीमक उसे अंदर ही अंदर खा चुकी है |ये दीमक भी बड़ी खतरनाक होती है , इसका पता तब चलता है जब सब कुछ खतम हो जाता है |  तुरंत पेस्ट कंट्रोल  वालों को बुलाया | दीमक मारक दवाइयों ने दीमक तो खत्म कर दी पर अलमारी का एक बड़ा हिस्सा जर्जर हो चूका था | सोंचा था बाद में बनवा लेंगे | परन्तु अब उसको जल्दी से जल्दी बनवाना मेरी मजबूरी थी क्योंकि अलमारी का सारा सामन घर के दूसरे कमरों में बेतरतीब पड़ा था | इस उथल - पुथल के दौरान मेहमानों के आने की सूचना , मैं तो एकदम परेशांन  हो गयी |  मैंने अपनी समस्या  पास में रहने वाली मिसेज जुनेजा को बतायी | उन्होंने कारपेंटर का नंबर दिया | मैंने फोन करके जल्दी से जल्दी उन्हें आने को कहा | पर उन्होंने भी काम ज्यादा और कारीगर कम होने की बात कह कर आने में असमर्थता जताई | फिर शायद मुझ पर तरस खा कर उन्होंने  मुझे एक दूसरा नंबर दिया और कहा आप उनसे बात कर लें | उसने भी कहा ," मैडम इस समय तो कारीगर मिलना मुश्किल है , फिर भी एक लड़का है पूंछता हूँ | अगले दिन कोई २५ - २६ साल का लड़का मेरे घर आया और कहा की अमुक सर ने आपकी अलमारी बनाने के लिए कहा है | 
मैंने उसे जल्दी से जल्दी अलमारी बनाने की ताकीद देते हुए पूंछा ," नाम क्या है तुम्हारा ?
उसने उत्तर दिया - हामिद , उसके बाद वो अपने काम में जुट गया |
मैं उसके लिए चाय नाश्ता ले कर गयी तो उसने मुस्कुरा कर कहा ," नहीं दीदी मेरे रोजे चल रहे हैं |
अच्छा - अच्छा कहते हुए मैंने चाय - नाते की ट्रे हटा ली |
हामिद , उत्तर प्रदेश के कासगंज का रहने वाला था |यू . पी वाला होने के नाते एक भाईचारे का रिश्ता तो जुड़ ही गया था उससे | बड़ी विचित्र बात है जब आप किसी दूसरे प्रदेश में रहते हैं तो उस प्रदेश का हर व्यक्ति आपको अपना  सा लगता है | इसे वही जान सकता है जो रोजी - रोटी के लिए दूसरे प्रदेश में रह रहा हो |  यही अपनापन मुझे हामिद में नज़र आया |मुझे वो बिलकुल अपने छोटे भाई सा लगा | यू पी वालों की आदत के अनुसार ही हामिद भी काम करते समय बोलता रहता था | उसी ने बताया की  उसका परिवार वहीं कासगंज में  रहता है | बीबी का नाम शबाना है , दो बच्चे है  आदि - आदि | रोजे  रखने के बावजूद हामिद  मेरा बड़े मन से काम कर रहा था , हां !थोड़ी देर के लिए  दोपहर में नमाज के लिए जरूर जाता | 
मैं आश्वस्त थी तभी मेरे  रिश्तेदारों का फोन आया | उनका प्रोग्राम कुछ बदल गया | अब वो वो २८ की जगह २६ को यानी ठीक ईद वाले दिन आ रहे हैं | मैंने हामिद से जल्दी काम खत्म करने को कहा और बाकी तैयारियों में जुट गयी | 
बाज़ार से लौटते समय मिसेज जुनेजा टकरा गयी | 
मैंने उन्हें फोन नंबर देने के लिए शुक्रिया कहते हुए कहा  " हामिद अच्छे से  काम कर रहा है | 
मिसेज जुनेजा चौंकते हुए बोलीं ," क्या हामिद !!! तब तो हो चुका तुम्हारा काम , ईद आने वाली है | देखना अपने गाँव जाएगा ईद मानाने , आखिरी जुम्मे से छुट्टी ले लेगा | तुम्हारी अलमारी तो फंस गयी | अब इतनी जल्दी कोई दूसरा इंतजाम भी नहीं हो सकता | अब सामानों को कैसे व्यव्स्तिथ  करोगी इसके बारे में सोंचों | 
मैं निरुत्तर सी हो गयी | मुझे लगा , " हो सकता है मिसेज जुनेजा की बात सही हो | हामिद भी तो घर जाने की बात कर रहा था | ओह ! तो क्या , मेरा काम यूँ ही अटका रहेगा | फिर खुद से ही अपनी बात को काटा ," अरे नहीं , हामिद कह तो रहा था की वो समय पर काम कर के दे देगा | कितनी लगन  से लगा भी है | 
दूसरे दिन हामिद ने आते ही कहा ," दीदी आज दोपहर में ही चला जाऊँगा | रमजान का आखिरी जुम्मा है  ना | फिर शाम को आऊंगा थोड़ी देर के लिए | पर मेरी अलमारी , कहना चाहते हुए भी शब्द मेरे गले में अटक गए | उसके भोलेपन और आस्था के आगे मैं कुछ कह न सकी | 
             शाम को हामिद नहीं आया | हो गयी होगी देर , शायद कल सुबह जल्दी आ जाए , " मैंने खुद को दिलासा दी | पर दूसरे दिन भी हामिद नहीं आया | फोन भी नहीं उठा रहा था | तभी मिसेज जुनेजा आ गयी | घर का नज़ारा देख कर बोलीं ," लो हो गयी छुट्टी "|मैंने पहले ही  था की जुम्मे से आना बंद कर देगा | नाम पूंछने के बाद तुम्हे काम शुरू ही नहीं करना चाहिए था | तुम्हे नहीं पता रमजान का महीना चल रहा है | पूरे घर में लकड़ी का बुरादा फैला है | अब मेहमानों को कहा बिठाओगी , कहाँ सुलाओगी ? 
मिसेज जुनेजा तो कह कर चली  गयीं पर मेरा दिल कह रहा था ," हामिद ऐसा नहीं है | हो न हो हो , कोई ऐसी बात जरूर है जो ठीक नहीं है | हामिद की फ़िक्र में रात बड़ी बेचैनी से कटी अगले दिन मेरे विश्वास को बहाल करते हुए हामिद आ गया | उसके पाँव में पट्टी बंधी थी | उसने बताया की जुम्मे की नमाज पढ़ कर लौट रहा था की ऑटो  की चपेट में आ गया | मोबाइल वही गिर गया | जब होश आया तब तक शायद किसी ने उठा लिया होगा | आप को खबर भी न कर सका | मन में बस एक ही चिंता थी की आप की अलमारी पूरी हो जाए | आपके विशेष मेहमान जो आ रहे हैं | इसलिए हिम्मत करके चला आया | मेरा मन करुणा से भर उठा | पर कल तो ईद है हामिद ,' मैंने उससे पूंछा | जी दीदी , पर आज इतना तो कर ही दूं की आप का कमरा साफ़ हो जाए व् आप बेड डाल  सके | मेरे मन में उमड़ती ममता से अनभिग्य  वो काम में जुट गया | रोजे के कारण उसे कुछ खाना तो था नहीं |ऊपर से चोट की कमजोरी |  इस कारण मुझे चिंता सी हो रही थी | मैं बार - बार उसे देख आती , ठीक तो है | पर वो किसी अजेय योद्धा की तरह अपने काम में जुटा दिखता | 
                               दोपहर के तीन बज गए | मैंने उसे आवाज दी ," अरे , हामिद तुम आज नमाज अदा करने नहीं गए | नहीं दीदी आज यही नमाज़ अदा कर ली |काम ज्यादा है न , और फिर  मेरा अल्लाह हर पल मेरे साथ है | उसके कहने के दार्शनिक अंदाज पर मैं मुस्कुरा दी | 
शाम ७ बजे मैंने फिर पूंछा ," हामिद घर नहीं जाना है क्या ? 
अभी नहीं दीदी जितना काम कर कर सकता हूँ कर लूं | 
                                               रात १० बजे तक हामिद काम में जुटा रहा | मैं बार - बार उसे जाने को कहती रही पर वो मुस्कुरा कर काम करता रहा | आखिर कार उसकी लगन पर समय ने भी हार मान ली | उसने अलमारी खड़ी  कर दी | बेड लगा दिया | फिर मेरे पास आ कर बोला ," दीदी देखिये काम हो गया | वाह हामिद , "तुमने तो कमाल कर दिया | चार दिन का काम एक दिन में कर दिया ", मैंने आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी में कहा |तभी मुझे ध्यान आया की मैंने काम पूरा न हो सकने का सोंच कर ए टी एम से पैसे तो निकाले ही नहीं थे |  मैंने धीमे से कहा ," पर हामिद , तुम्हारे पैसे तो ...|कोई बात नहीं दीदी , पैसे कहा भागे जा रहे हैं | आज रात घर निकल जाऊँगा | ईद के हफ्ते भर बाद लौटूंगा | तब ले लूँगा | मैं तो ये सोंच कर काम जल्दी खत्म करना चाहता था की  की दीदी के मेहमान आ रहे हैं उनको दिक्कत होगी |
                                        मेरा मन कृतज्ञता से भर उठा | मैंने उसे मिठाई का डिब्बा पकडाते हुए कहा ," ईद मुबारक हामिद , ये बच्चों के लिए लेते जाओं |  उसने शुक्रिया कहते हुए डिब्बा ले लिया | फिर अपने थैले से निकालकर एक सेवईयों  का पैकेट देते हुए कहा ," दीदी ये आपके लिए लाया हूँ | अगर आप लें तो ? अरे क्यों नहीं , इन सेवईयों की मिठास तो बहुत ख़ास होगी , मैंने लपक कर सेवईयों का पैकेट लेते हुए कहा | हामिद चला गया | मैं सेवईयों  का पैकेट पकडे  - पकडे अलमारी को देखने लगी |ईद पर दोनों ही  हामिद का तोहफा थे | मुझे मुंशी प्रेम चन्द्र की कहानी " ईदगाह " याद आ गयी | उस हामिद ने दादी को तोहफा दिया था और इसने दीदी को | और उस दादी की तरह आज इस दीदी की आँखे भी नम  थी | 
                                            ईद के दिन मेहमान भी आ गए | मैंने सेवईयों के पैकेट से निकालकर मीठी सेवइयां बनायीं | वास्तव में उनमें अनोखी मिठास थी | हम उसके जायके का लुत्फ़ ले ही रहे थे की किसी ने टीवी चला दिया | बहस अभी भी जारी थी | उनमें से कुछ सिर्फ हिन्दू थे , कुछ मुसलमान ... मुकम्मल इंसान कोई नहीं था | पता नहीं क्यों पर अचानक मुझे सब सब दीमक लगने लगे | नन्हीं नन्ही  छोटी - छोटी , एक चावल के दाने के बराबर | पर जो अंदर ही अंदर सिर्फ देश को ही नहीं पूरी इंसानियत को खोखला कर देती है | अफ़सोस इसका पता तब चलता है जब सब कुछ नष्ट हो जाता है | उफ़ ! मैं पीड़ा से भर उठी | तभी मेरी नज़र  सेवईयों पर गयी | मैं मन ने मन को ही तसल्ली दी  ," नहीं सब कुछ खत्म नहीं होगा | सब कुछ खत्म होंने से पहले कोई हामिद होगा जो उस नुक्सान को रोक देगा | कोई दीदी होगी जिसका मन ममता से छलकेगा | और उन दोनों के बीच होगी सेवईयों की मिठास ... इतनी मिठास जिसके आगे कडवापन ठहर ही नहीं पायेगा | 
                                                            

  शुक्रिया हामिद हमें और तुम्हें ही तो कायम रखनी है इन सेवईयों की मिठास | 

वंदना बाजपेयी 


10 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी बहुत ही मर्मस्पर्शी और प्रेरणा का स्त्रोत है. मानव सभी धर्मो से ऊपर होता है, वही धर्मो का निर्माता है; स्नेह-सरिता से बढ़कर कोई अमृत नहीं और यह सन्देश देकर आपने इंसान को मालामाल कर दिए.

    उत्तर देंहटाएं
  2. वास्तव में हिंदू मुस्लिम सभी मिलजुलकर रहना चाहते हैं। ये तो सत्ता हैं जो इंसान को आपस में लड़ाती हैं। बहुत सुंदर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं