बुधवार, 21 जून 2017

साडे नाल रहोगे ते योगा करोगे




अशोक परूथी
अपने दुनीचंद जी लोक-संपर्क विभाग में काम करतें हैं। ‘पब्लिसिटी’ में विश्वास रखते हैं। वे सरकारी मशीनरी का एक पुर्जा जो हैं। जब तक उनका एक आध फोटू या लेख कुछेक समाचार पत्रों में ना लग जाये तब तक उनके “आत्माराम” को संतुष्टि नहीं होती। कोई सरकारी मौका या दिवस हो या न हो, कम से कम ‘फोटू’ के साथ अख़बारों में उनके नाम से कुछ जरूर लिखा होना चाहिये। अपने दुनीचंद जी उस बहू की तरह हैं जो रोटी तो कम बेलती है लेकिन अपनी चूड़ियाँ खूब खनकाती है ताकि पतिदेव और सासू मां को पता लगता रहे कि बहू किचन में है तो घर का काम-काज ही कर रही होगी।
दुनीचंद जी इतने सनकी हैं कि अगर इनको अपने बारे में जनता को कुछ बताने का मौका न मिले तो इनको बदहजमी और पेट में गैस की शिकायत हो जाती है। इस समस्या से निवारण के लिये वे जंगलों की तरफ निकल पड़ते हैं फिर वहां चाहे बकरियां मिले या भेड़ें, उनके साथ अपना ‘फोटू’ खिचवाते हैं। है क्या, गडरिये का डंडा खुद पकड़ लेते हैं और उसे अपना कैमरा पकडवा देते हैं।

जूनून की भी हद होती है, उस दिन अपने मित्र के साथ एक सरकारी दौरे पर कहीं जा रहे थे. रास्ते में सड़क के किनारे जनाब को कंटीली, लाल फूलों वाली झाड़ियाँ दिखी। ड्राईवर को आदेश देकर जनाब दुनीचंद जी ने गाड़ी रुकवा दी, इनका तर्क था -“मैंने आज तक इतने सुंदर फूल काँटों वाली झाड़ियों पर लगे पहले कभी नहीं देखे, यह मौका हाथ से निकल गया तो फिर यह मौका अगले साल अगले मौसम में ही मिलेगा। जनाब ने दो फोटू लिये- एक अपना और एक अपने ड्राईवर का। अपने ड्राईवर का ‘फोटू’ क्यूं लिया, भला? बदला लेने के लिये क्योंकि ड्राईवर ने दुनीचंद जी का पहले फोटू ‘खेंचा’ था चाहे इसका आग्रह खुद दुनीचंद जी ने किया था।
अख़बार में इनकी तस्वीर या लेख लगे न लगे, इससे क्या फर्क पड़ता है? खुद ही अपने ‘फेसबुक’ पेज पर लगा लेते हैं. बस, फोटू होनी चाहिये, फिर चाह दस्ताने डालकर झाड़ू ही क्यों न मारना पड़े। घर में बेगम झाड़ू पकड़ाने का निवेदन करती है तो जनाब को कुछ सुनाई नहीं देता, मेरा मतलब ऊँचा सुनाई देता है– ‘ओ मैं कहेया, मैनू नहीं सुनया, भागवाने!” भनाती हुयी बेगम को इनका स्पष्टीकरण होता है.
बेगम भी थोडा-बहुत रौला–रप्पा कर के खुद ही झाड़ू उठा लेती है! जिले में कहीं भी डिप्टी कमिश्नर या चीफ मिनिस्टर आ जा रहे हों तो बिना-किसी के ‘दस्से-बताये’ सबसे पहले वहाँ पहुँच जाते हैं! भला क्यूं? एक तो इनकी नौकरी का सवाल और दूसरा, वहाँ फोटू खिचने होते हैं। दुनीचंद जी का मानना है कि अखबार में एक आध लेख फोटो के साथ छपवा देने से लोगो को विश्वास हो जाता है और उन्हें सबूत मिल जाता है कि देश में विकास हो रहा है, प्रगति हो रही है। मेरे विचार से यह प्रगति के नाम पर धोखा हो रहा है, दिखावेबाज़ी हो रही है. ड्रामेबाजी है, एन्वें ई शोशे-बाज़ी।
यह वैसी ही तरक्की है जैसे उस दिन नेता जी ने मुझे मेरे पूछने पर बताई – जनाब आपके मंत्री बनने के बाद क्या हुयी है प्रगति?
जोश में आकर बड़े गर्व से बोले -“मेरे मंत्री बनने के बाद काफी प्रगति हुयी है:
आम के पौधे पेड़ हो गये हैं,
गल्ली के पिल्लै शेर हो गये हैं!”

यह सब करना पड़ता है जी। अपने दुनीचंद जी का योगा दिवस मिलकर मनाने का न्योता था। मैं कैसे मना करता। फोन पर दूनीचंद जी कहने लगे –“कल अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस है, समय पर आ जाना, ‘रल्ल मिल’ कर योगा-दिवस मनायेंगे..” मैंने मिलने की जगह पूछी तो कहने लगे – “वही, अपने गुरूद्वारे के पिछवाड़े वाले मैदान में, सुबह के नों बजे।”
मैंने भी दुनीचंद जी का निमंत्रण स्वीकार कर लिया. फिर इतना कौन सा फासला था। दुनीचंद जी का बताया हुआ गुरुद्वारा मेरे घर से दो-तीन मोहल्ले छोड़ कर ही तो था। कोई सात समंदर की दूरी थोडा ही थी हमारे बीच में।
दिलों में बस मुहब्बतें बरकरार होनी चाहिये और मन में कुछ करने का इरादा। फिर चाहे फासला विलायत तक का हो या अमेरिका तक का।
इन्शाह अल्लाह…बाकी सब खैर सल्लाह! अच्छा खायें, अच्छा पीयें, मस्त रहें, व्यस्त रहें, खुश रहें, आबाद रहें लेकिन योगा जरूर करें. मरना ही है तो स्वस्थ रहते हुए मरे, बीमारी से मरना बड़ा तकलीफदेह है, फिर इलाज कौनसा सस्ता है, यह तो हम भारतवासी खुश किस्मत हैं कि सरकारी अस्पताल में हमारा फ्री उपचार होता है, दवाइयां भी मुफ्त मिलती हैं। सुना है कि अमेरिका में तो जनाब अस्पताल में एक बार का दाखला आपको दिवालिया कर देता है। वहां इतनी महंगी दवाइयां होती हैं कि उनके दाम अदा करने के बाद वे गले से नीचे नहीं उतरती।
खैर अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की प्रभात, मैं समय पर उठा, नहा-धोकर धूप-बत्ती की और फिर गुरूद्वारे के पीछे वाले मैदान तक पहुँचाने वाले रास्ते पर हो लिया।
गुरूद्वारे के पास पहुँच कर मुझे कुछ दाल में काला लगा। सोच रहा था कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है, मैदान के बाहर और अन्दर भीड़ –भड़क्का होगा, कुछ तांगे, कुछ गाड़ियां, कुछ रिक्शे वाले शहर की सवारियां ढो रहे होंगे, कुछ चहल-पहल होगी लेकिन जनाब वहाँ तो खामोशी का वातावरण था, न कोई बंदा दिखा और न ही कोई परिंदा, मेरा मतलब वहां न कोई बंदा था और न बन्दे की जात।
मैदान के मुख्य द्वार से अन्दर घुसकर मैं यह क्या देखता हूँ, इतने बड़े मैदान में बस दो ही बन्दे थे, मुझे मिलाकर तीन। एक अपने दुनीचंद जी और दूसरा वहां कैमरे वाला मौजूद था जो ध्यान में लीन होने और योग मुद्रा का ड्रामा कर रहे दुनीचंद जी की तस्वीरे अपने कैमरे से भिन्न भिन्न ‘एंगेल’ से कैद कर रहा था ओर तीसरे हम अपुन थे!
अपने दोस्त दुनीचंद जी को योग में ध्यान मग्न देखा तो मुझसे भी रहा न गया और मैं भी कैमरे वाले को इशारा करके दुबकता हुआ दुनीचंद जी की बगल में जा बैठा। था क्या, थोड़ी देर की ही तो सारी बात थी। दुनीचंद जी को कोई योग थोड़ा ही करना था? भोगी और योगी, दोनों का आपस में क्या मेल और क्या योग? मुझे भी कोई योगा-वोगा थोड़ा ही करना था? विज्ञापन का जमाना है, बस, एक फोटू के लिये दो पल की ‘प्लस्ती या चौकड़ी मार कर बैठने में क्या हर्ज था? मुझे व्यायाम करना होता तो मैं तो अपने पांच मंजिला अस्पताल में सीढ़ियाँ ऊपर-नीचे चढ़-उतर लेता क्योंकि मैं वहां काम करता हूँ. लेकिन मैं ऐसा नहीं करता क्योंकि ऐसा करने से अगर मुझे खुद को ही साँस चढ़ गया तो रोगियों का इलाज तुम्हारा “डैडी” करेगा? अरे, कुछ सुझाव देने से पहले थोडा-सा सोचा करो! ओए, रब्ब दा वास्ता जे, थोड़ी जई ते अपनी अक्कल फड़ेया करो…ओये तुहानू मौला ले।
लेकिन, यही बात अगर मैं अपने राष्ट्र के प्रधान सेवक जी से करूं तो वे मुझे अपने भाषण से अपने साथ सहमत कर लेंगे – “भाई, अशोक जी, यह बताओ कि विज्ञापन देने की क्या ज़रुरत है, माल अच्छा है तो खुद ही बिकेगा, बिकेगा कि नहीं?” अब आप ही बतायें कि मैं उनके साथ सहमत हूँगा के नहीं या फिर दीवार में अपना सर फोड़कर देखूँगा कि मेरे सिर से खून निकलता है कि नहीं? यह तथ्य गुजरातियों के व्यापार में सफल होने का राज़ भी है. तुक्का लगाओ कि अमेरिका में अधिकांशत होटल और मोटल किसके हैं? पटेलज़, आपका अनुमान शत-प्रतिशत ठीक है!
इन गुजरातियों को भगवान् की एक और देन भी है, और इनके इस गुण के कारण इन्हें पत्रकार होना चाहिये। मैं कसम तो खाकर नहीं लेकिन दावे के साथ यह कह सकता हूँ कि पत्रकारिता के क्षेत्र में भी यह लोग सबको मात दे देंगे, क्योंकि जब भी एक दूसरे से मिलते हैं, बस तीन शब्दों में ही अपना सवाल करके सारे शहर की खबर जान लेते है – गुजराती में वह तीन शब्द हैं – ‘शू चले छे?’ (क्या हो रहा है?) न हींग लगे न फिटकरी ते रंग वी चौखा होय!
आप यदि किसी कारणवश योगा नहीं कर सकते तो कम से कम 20-25 लम्बे श्वास लें और उन्हें दो-या तीन सेकंड (क्षमतानुसार) रोक कर रखें इससे आप को शर्तिया फायदा तो होगा ही, बाबा रामदेव और अपने प्रधानमंत्री जी के कलेजे में भी ठण्ड भी जरूर पड़ेगी।
लोगों के हलक से चाहे महंगी दाल और तरकारी नीचे उतरे या न उतरे, लेकिन सरकार को चाहिये कि इन योग-केम्पों के आयोजन से पहले आम जनता को सस्ते दामों पर अच्छी खुराक का इंतजाम करे. इस सरकार का ‘बेड़ा तरे’, इसने मासूम और निर्दोष लोगों को मारना ही है तो कम-से-कम साफ़ सुथरा पीने का पानी पिला-पिलाकर ही मारे। भूखे तो भजन भी न होये बिटूआ और तुम योगा की बात करत हो।
खैर, फोटोग्राफर ने दो-चार फोटू खींच लिये थे लेकिन, दुनीचंद जी अभी भी ध्यान मग्न होकर बैठे थे । मैंने उन्हें कोहनी मार कर उठाया –“जनाब, उठो फोटू हो गया है।”
उनको कनफर्म करना था सो एक बार फिर पूछ लिया-“फोटू हो गया है, क्या?”
“जी दुनीचंद जी! मैंने हाँ करते हुए जवाब दिया। दुनीचंद जी फिर अपने आसन से उठते हुए मुस्कराकर कहने लगे, “ अशोक जी, आप के साथ योग क्रिया, करके हमें ‘परमानन्द’ मिला।”
“मैं भी व्यंग करने से रह ना सका. मैंने भी बनते हुए पूछा – “आपका परमानन्द क्या अपने गाँव गया हुआ था?” मेरा सवाल सुनकर दुनीचंद जी हंसने लगे, लेकिन मेरी बात का जवाब न दे सके। मैदान से बाहर निकल कर मैंने दुनीचंद से हाथ मिलाया और अपने घर की दिशा में बढ़ने से पहले मैंने पूछा – “दुनीचंद जी अब क्या करना है?”
“करना क्या है, दो-चार “अपुन के तुम्हारे साथ ‘फोटू’ हो गये हैं । कल अखबार में छप जायेंगे, इसी के साथ इस वर्ष का अंतर्राष्ट्रीय योग-दिवस सफलता पूर्वक संपन्न हुआ. इसके बारे में अब अगले वर्ष ही सोचेंगे..इस वर्ष का योगा दिवस तो संपन्न हो गया, बस!
“मुझसे पूछे बिना रहा न गया…मैंने पूछा – “यह अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस कैसे हुआ, हम दो ‘जने’ ही तो थे, हमारे साथ न कोई ‘गौरा था और न कोई कल्लू?”
समझा करो, अशोक जी…वे अपने देशों में कर रहे होंगे, उनको योगा करने के लिये हमारे देश में थोडा ही आना था…उनको स्वास्थ्य लाभ लेना है तो योगा करेंगे नहीं तो हमारी बलां से…लेकिन, तुस्सी चिंता न करो क्योंकि “साडे नाल रहोगे ते अगले साल फिर योगा करोगे..!”
नोट: इस लेख में सारे के सारे विचार मेरे हैं! सभी सहमत हैं तो ठीक है, कोई ‘असहमती’ है तो वह जाकर अपनी गाय – भैंस चराये, गाय भेंस नहीं तो किसी छायादार पेड़ के नीचे बैठकर ‘पानी पम्प दा, और सिगरेट लेम्प दा’ पिये…जेकर कोई बंदा एह वी नहीं कर सकदा तां रब्ब उसदा भला करे नहीं तां घट-तों -घट किसी मानसिक विशेषज्ञ कोलूँ खुद नू चैक करावे – नहीं ते मामला गंभीर हो सकदा है..



1 टिप्पणी:

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    अशोक परूथी
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