शुक्रवार, 9 जून 2017

शिवराज सिंह चौहान यानी मंदसौर का जनरल डायर

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रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)। जी हाँ! किसानो का पेट और सीना चाक करती वे पुलिसिया गोली,गुलाम हिन्दुस्तान की उस ब्रिटिश गोली से ज्यादा जघन्य और पाशविक लगी,जब जनरल डायर जैसे शैतान ने अपनी नर्क जैसी जुबान से फायर कहा था। हूबहू वही दृश्य मंदसौर मे दृश्यावलोकित हो रहे थे और साफ दिख रहा था कि हमारे-आजाद हिन्दुस्तान की पुलिस जबरिया एक उस आंदोलन और किसान की माँग को कुचल रही थी जिसका"आधे से अधिक जीवन तो अपने खेत की मेड़ो और उसकी उन दाड़ो पे ही बीत जाता है जिसके मध्य उसकी फसले जवान होती है"। सारे मौसम के दर्द की किताब के यही जीवित पात्र है,जो कारो और ऐसी मे सफर करते आज के नेता अपनी लफ्फाज़ी मात्र से कुछ क्षणो मे, इनकी भावना का ठीक उसी तरह कत्ल या हत्या करते है जैसे कभी----"मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'पुस की रात' के हल्कू की तैयार फसल को सारी रात मे चट कर जाते एक छुट्टा पशु ने की" "आज की युग के शिवराज सिंह चौहान भी वही शाहुकार है,जिनकी संवेदना अपने मंदसौर के किसी हल्कू जैसे किसान के साथ नही" देशकाल,समय सब कुछ बदलता गया लेकिन बेचारे किसान का अधमरापन वैसे ही बदस्तूर जारी है।
किसान कर्जमाफी वाली वे मोदी जी की जनसभा-अच्छे दिन आयेंगे,ये छप्पन इंच की छाती,भाईयो एवं बहनो का तीन साल मे ये अच्छा दिन मंदसौर के उन गोली खाये किसानो के परिवार पे कैसा बीता है,कैसे यहा के किसानो तक आये है,अच्छे दिन स्पष्ट है। "मंदसौर का हर दृश्य जलियावालाबाग की तरह लग रहा था,किसान भाग रहे थे,एक दुसरे पे गिर-पड़ रहे थे,ज़मीन रक्तसिंचित हो रही थी,इस ज़मीन सिचने वाली कौम का बेरहमी से सरकारी नरसंहार किया जा रहा था,चारो-तरफ हाहाकार के दृश्य थे"। जिसे मै मंदसौर भर लिख मै इस घटना को बौना नही कर सकता,जब तलक किसान को उसकी जायज मांग को न्याय नही मिल जाता तब तलक मै मध्य-प्रदेश जैसे वृहद राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उस अंग्रेज जनरल डायर से ज्यादा क्रुर और गुनहगार लिखुँगा जिसने हमारे देश के हजारो देशभक्तो के सीने पे गोली चलवाई थी। जिस प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया यानी देश के चौथे सशक्त स्तंभ को इस देश के आखिरी शख्स की आवाज़ कहा और लिखा जाता है उनकी लेखनी गणेश शंकर विद्यार्थी के भावो के हृदय धूल की कण मात्र भी नही अगर होते तो मंदसौर के किसान कि वे छ लाश इस हुकूमते हिंद को पेशोपेश मे ला देती। हमारे इस पुरे देश को अन्न,फल,सब्ज़ी आदि उगाकर हमारे इस पेट की क्षुधा को मिटाने और शांत करने वाले किसान को गोली भी मारी गई तो उसकी पेट पे,इससे बड़ी किसी भी कालखंड या शासन समय की पाशविकता क्या होगी ?। गौर करिये तो किसान पुरे देश मे यत्र,तत्र,सर्वत्र आपको मरता दिखाई देगा "पुरे चार,छ महिने वे अपनी फसल को बेटे या बेटी की तरह पालने के बाद जब वे अपने इसी तैयार फसल को मंडी ले जाता है तो उसके उस तैयार फसल की किमत----अभी कुछ दिनो पहले बिके उस प्याज़ और टमाटर सी हो जाती है अर्थात एक से देढ़ रुपये किलो इससे बेहुदा मज़ाक आखिर उस किसान के साथ क्या होगा जो कि न श्रम की किमत पा रहा और न ही अपने उस फसल की लागत निकाल पा रहा बल्कि उसकी फसलो के बाजारु दलाल उसी को आठ से दस रुपये मे बेच कुछ ही घंटो मे हजारो कमा रहे,आखिर उस किसान का घर,परिवार उनके बेटे,बेटियो की शिक्षा दिक्षा और शहर के वे पढ़े लिखे महंगे कातिल डाक्टर जिसकी सीढ़ियाँ चढ़ते किसान काँपता है,जीवन का ये भयावहपन ऊपर से कर्ज़ न भर पाने का दर्द इस तरह के हालात का मारा किसान आत्महत्या करने जैसा निर्णय लेता है तो उसकी इस आत्महत्या को मै आत्महत्या नही बल्कि वहाँ की सरकार का कत्ल लिखता हूँ"। कहते थे या सुना है कि ब्रिटानिया हुकूमत का सूर्य कभी अस्त नही होता था और उसका सारा संचालन लंदन से होता था,आज मंदसौर भी उसी ब्रिटानिया शासन की तरह लग रहा है और शिवराज़ सिंह चौहान का निर्णय एक पथराये संवेदनहीन अंग्रेज शासक की तरह का लग रहा,जिसका सारा संचालन लंदन तो नही लेकिन हा हमारे देश के लंदन की हैसियत रखते दिल्ली से हो रहा। किसानो की इस हत्या और आंदोलन के आग की चिंगारी अगर समय रहते न थमी तो ये और उग्र व विकराल होगा!शायद सल्तनते दिल्ली कि वे तख्ते ताउस और मयूर सिंहासन ही उलट जाये जिसपे सगर्व हमारी मतदान की उम्मिदो के प्रधानमंत्री मोदी जी बैठे है। बहुत उम्मीद है इस मुल्क के आवाम का और उससे कही ज्यादा यहाँ की जम्मूरियत को दुनिया तक रही है।मै एक रचनाकार और लेखक होने के नाते सच लिखने और उसे बया करने से डरता नही"क्योंकि कलम की आग और रोशनाई आज भी उतनी ही पाक और पवित्र है जितनी की पहले थी इसके सच लिखने के अक्षरो से अब भी गणेश शंकर विद्यार्थी की साँस आती है" "कलम अगर चाटुकार हो जाये तो वे लेखक व उसके सारे लेख उस दो टके की धंधा करने वाली वेश्या से ज्यादा गलिज और गंदे हो जायेंगे" अकबर इलहाबादी साहब की ये दो लाइन आज भी प्रासंगिक है----- कि जहाँ तोप न तलवार मुकाबिल हो, वहाँ एक छोटा ही सही तुम अखबार निकालो"। आज केवल ये हालात मंदसौर के ही नही अपितु कमोबेश इस देश के हर राज्य के किसानो के साथ है। ये किसान किसी पुलिसिया गोली के हकदार नही क्योंकि---"ये देश अथवा राज्य के इनामिया अपराधी,माफिया,उग्रवादी या नक्सली नही जिनका इतने नग्न और जघन्य तरिके से उन्मूलन किया जाये"। बेशक शिवराज सिंह चौहान को मंदसौर का जनरल डायर जैसा कड़ा शब्द लिख मै किसान की आंतरिक पीड़ा और उसके उस आंदोलन का समर्थन करता हूं,जो सदियो से किसान हर आते-जाते सरकार से माँग रही है।मैने इस सरकार की अच्छाईयो का खुलेकंठ तारीफ और प्रशंसा भी की है। ये लिखते भी मै झिझका नही कि एक लंबे अंतराल और कालखंड के बाद इस अरबो की जनसंख्या के इस देश ने एक सशक्त और दृढ़निश्चई प्रधानमंत्री का चयन या चुनाव किया है!लेकिन इसके इतर मेरी कलम हर उस सरकार को जनरल डायर कहती है जिसके कालखंड या समय मे मेरे देश के किसान के पेट मे गोली मारी जायेंगी। इसलिये मै किसान को उसकी जायज़ मांग को न माने जाने तलक मै बिना किसी भय के मध्य-प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को वहाँ का जनरल डायर कहुँगा और लिखुँगा भी। जय जवान-जय किसान



डिस्क्लेमर - यह लेखक के निजी विचार हैं , अटूट बंधन ग्रुप का इससे कोइलेना देना नहीं है

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