शुक्रवार, 23 जून 2017

सूखी रोटियाँ




चैनल के लिए कहानियों की खोज में कोशी के कछार भटकते भटकते एक बुढिया को देखा जो रोटियां सुखा सुखाकर घर के आंगन में बने एक बडे से मचान पर रख रही थी । उसने बुढिया से इसका कारण पूछा तो मुस्कुरा खर वापस अपने काम में लग गई । स्टोरी न बन पाने के अफसोस के साथ कुछ फोटोज खींचे और मन में सोचा कम से कम ब्लॉग पर जरूर लिखूंगा इस पगली बुढिया के बारे में ।
फिर वो शाम होते ही लौट आया जिला मुख्यालय के अपने होटल पर । अभी खाना खाकर सोने की कोशिश कर ही रहा था कि एडिटर का फोन आया ” नेपाल ने बराज के चौबीसो गेट खोल दिये हैं ,भयंकर तबाही मचाएगी कोशी , काम पर लग जाओ । ”

सुबह जब वो गांव में पहुंचा तो उसे उस पगली बुढिया की फिकर हुई उसने लोगों से पूछा कि वो रोटी सुखाने वाली बुढिया कहां है तो लोगों ने स्कूल की तरफ भेज दिया । वहाँ जाकर देखा तो बुढिया की सूखी रोटियां एक बडे तिरपाल से ढंकी रखी थी और दो नौजवान लोगों को गिन गिन कर रोटियां दे रहे थे ।
बुढिया उसे देखकर फिर से मुस्कुराई वो भी बगल में बैठता हुआ बोला ” मैंने तो तुझे पगली बुढिया समझा था तू तो सयानी निकली । ”
” तू तो चला गया था फिर क्यों आ गया यहाँ मरने । ”
” बस यूं समझ लो अपने लिए सूखी रोटी के जुगाड़ में आया हूं अगर तुम कुछ अपने बारे में बताओ तो मेरे बाल बच्चों के लिए भी रोटी पानी का बंदोबस्त हो जाए । ”
अबकी बुढिया मुस्कुराई नहीं , उसकी आंखों ने बराज का पच्चीसवां गेट खोल दिया ” बस पिछले साल ही तो हर साल की तरह बाढ आई और मचान पर अपने भरे पूरे परिवार को एक एक कर मरते देखा क्योंकि सबकोई तो था नहीं थी तो रोटियां । ”
तभी एक लडका पत्रकार के हाथ में दो सूखी रोटियां पकडा गया उसने कसकर पकड लिया उन रोटियों को मानो सावित्री ने प्राण हरते यमराज के पैर पकडे हों ।

कुमार गौरव 

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