बुधवार, 21 जून 2017

योग--न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है




रंगनाथ द्विवेदी योग---------- न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है। रुग्ण मन,रुग्ण काया किस काम का बोलो, शरीर,शरीर पहले है ये कहां-------- किसी हिन्दू या मुसलमान का है। योग----------
न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है। आओ इसके आसन मे प्रेम है अपना ले, स्वस्थ रहेगे ये मन सभी बना ले, आखिर घर-घर है दवाखाना नही------ किसी वैद्य या हकिम का है। योग---------- न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है। इसे घूँघट या पर्दानश़ी औरत मे हरगिज़ न बाँटिये, क्योंकि योग--------- हर शख्स़ और तंजीम का है। योग------- न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है। पुरी दुनिया हो उठी है कायल, इसका फक्र है हमें, क्योंकि हमारा योग एै"रंग"------- न किसी रसिया न किसी चीन का है। योग-------- न हमारे राम और न तुम्हारें रहीम का है। @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें