गुरुवार, 15 जून 2017

ममत्व की प्यास





अशोक परूथी
शांति का मन आज बहुत अशांत था. रो-रोकर उसने अपनी आंखें सुजा ली थी! वह अपनी किस्मत को भी रो-धो बैंठी थी. अपने मन का बोझ हल्का करने के लिये गुस्से में उसने अपनी बगल वाली पड़ोसिन लक्ष्मी के लिये बुरा-भला कहा और चाहा भी! आखिर, बरामदे की फर्श से उठकर उसने अपना हाथ मुंह ठन्डे पानी से धोया, तोलिये से पौंछा, फिर अपने घर के सामने वाली पड़ोसिन कृष्णा के घर जाने के लिये अपनी चप्पलें ढूँढने लगी.उसने अपने घर के जंगले की कुंडी लगाई और अपनी गली की सड़क पार करके कृष्णा के मुख्य द्वार पर दस्तक दी! कृष्णा ने शांति का हाल देखकर उसकी परेशानी का कारण जानने की जिज्ञासा प्रकट की. शांति कुछ जवाब न दे सकी, भरी पडी थी, बस सुबक पड़ी. उसकी आँखों से अश्रुओं की एक धारा फूट पड़ी! भावुक होकर, दुखी मन से पूछने लगी, “बहिन जी, अभी तक मेरी गोद खाली है तो इसका क्या यह मतलब है मैं एक पापिन हूँ, दूसरों के बच्चों को तकलीफ पहुँचाना चाहती…हूँ?” क्या मैंने ऐसा कुछ किया है?…क्या मेरी नियत इतनी खराब हो सकती है? नहीं…मेरा इश्वर जानता है कि मैंने ऐसा कुछ नहीं किया.” फफक-फफक कर रोते हुए शांति, कृष्णा के कंधे लग गयी!“हुआ क्या है, शांति बहिन? आज किसने तेरा दिल दुखाया है? ऐसे ही दिल छोटा नहीं करते…भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं!” बरामदे में अंदर लेजाकर एक चारपाई पर शांति को बिठाते हुये कृष्णा पुनः बोली, “यहाँ बैठो, इधर, मैं पहले आपको एक ग्लास पानी दूं, फिर बैठकर सुनती हूँ, आपकी …!” कृष्णा ने अपनी बिटिया मिनी को आवाज़ लगाते हुये उसने कहा, “बेटा, शांता आंटी के लिये एक कप चाय तो बना दे!”

“सच कहती हूँ… मेरा दिल दुखाने के लिये भगवान चुड़ैल लक्ष्मी बाई को सजा जरूर देगा, कसम उठा कर कहती हूँ कि आज के बाद चाहे लक्ष्मी जितनी जरूरतमंद या फसी में क्यूं न हो, उसके बच्चे को नहीं रखूँगी…आप भली-भांति जानती हैं कि मेरे मन में कभी कोइ द्वेष या खोट नहीं आया…आज मेरी देखभाल में उसकी पिंकी को थोड़ी सी क्य (उल्टी) क्या आ गयी कि बिना सोचे समझे उसने मुझ पर इलज़ाम लगा दिया. कहने लगी, “खुद तो बाँझ हो, इसलिए तुमसे दूसरों की खुशी बर्दास्त नहीं होती! जानबूझकर तुमने पिंकी को कुछ अंत-शंट खिला दिया है!”
माँ की लाश घर पहुंची तो उसकी बच्ची महक ने, अपने नन्हे हाथों से अपनी मां के होंठो का स्पर्श किया…उसकी छाती पर अपना सर रख पहली बार ‘मां – मां’ पुकारा! माँ वहाँ होती तो अपनी बच्ची की आवाज़ को सुनती और उसका जवाब देती!कितनी विडंबना है एक मां अपने जिगर के टुकड़े से ‘मां’ शब्द सुनने के लिये बरसों तड़फती और तरसती रही और फिर एक दिन जब उसके जिगर का टुकड़ा उसे ‘मां’ पुकारने के काबिल हुआ तो ‘मां’ शब्द सुनने वाली वह ‘मां’ न रही!
शांति फिर सिसक पडी, “इतना बड़ा इलज़ाम किसी पर, बता नहीं सकती मेरे दिल को कितनी गहरी ठेस पहुँची है लेकिन, मैं किसे दोष दूं? इंसान कुछ तो, थोड़ा सा तो अपना मुंह खोलने से पहले सोचता है… बस, सारा दोष तो मेरी किस्मत का है, मेरी शादी हुये अब पूरे दस साल होने को आये हैं लेकिन मेरी कोख आज तक खाली है…”
“तूं फ़िक्र न कर, शांति! लक्ष्मी की बात का भी बुरा मत मना! ईश्वर की कृपा से तुम्हारी गोद बहुत जल्द ही ‘हरी’ होगी! प्रभु बहुत ही जल्द तुम्हारे मन की मुराद पूरी करेंगे. बोल हरी!”
कृष्णा से वार्तालाप के बाद शांति के मन का काफी बोझ हल्का हो गया था! कृष्णा का शुक्रिया कर वह फिर अपने घर लौट चली थी. कृष्णा उसकी एक विश्वश्नीय सलाहकार और पड़ोसिन ही नहीं थी बल्कि उसकी एक सुलझी हुई अच्छी मित्र भी थी. बिना किसी झिझक, आये – गए शांति अपना सुख दुःख साँझा कर लेती थी!
शाम को पति घर आये तो शांति ने उनसे भी अपनी राम-कहानी सांझी की. शांति के पति का नाम रोशनलाल था जो बिजली के महकमें में काम करते थे. शांती के मन की व्यथा को वह अच्छी तरह से जानते थे! उन्होंने उससे हमदर्दी के कुछ शब्द कहे ओर बातचीत का विषय बदल दिया, “आज के दिन का काम और उसके ऊपर जलती दोपहरी…उफ़ …! एक कप चाय बना लो तो बैठ कर इकठे पीते हैं!”
फिर संयोगों से हुआ यूं कि पडौस की मुनिया के घर आठवीं संतान का जन्म हुआ और यह खबर पड़ोस में फ़ैली. दुर्भाग्य से पुत्री को जन्म देने के बाद मुनिया चल बसी थी. मुनिया का पति मुश्किल से ही घर का खर्चा चलाता था. वह फलों की रेहडी लगाता था. उसकी आठों की आठों संताने लडकियां थी. अपने परिवार का नाम आगे चलाने और एक लड़के की ख्वाईश का ही यह नतीजा था. मुनिया का पति यह अच्छी तरह जानता था कि वह अपनी नयी संतान की परवरिश तो छोडो उसे मां के बिना जीवित भी न रख पायेगा. शांति भी इस खबर से अनभिज्ञ न थी, लेकिन कई प्रश्नों से वह भयभीत थी जिसके उतर उसके पास नहीं थे! उसने सुन रखा था कि गोद लिये बच्चे बड़े होने पर अपने असली माता-पिता के पास जाना चाहते हैं! लेकिन, कृष्णा ने शांति और उसके पति रोशन लाल जी से बातचीत करके उन्हें मुनिया की बिटिया को कानूनी कारवाही करने के बाद गोद लेने के लिये राजी कर लिया था.
अंधे को जैसे दो आँखें मिल गयी हों. दो दिन बाद ही कचहरी जाकर शांति और रोशनलाल जी ने नवजात शिशु को गोद ले लिया था. इस शुभ घड़ी के स्वागत में उन्होंने एक ‘हवन’ कराया और उसके बाद एक छोटी सी पार्टी का आयोजन भी किया!
क्या संयोग बना था – एक नवजात शिशु था जिसे जिन्दा रहने, अपनी परवरिश के लिये एक मां की ज़रुरत थी और उधर एक मां थी जिसे एक बच्चे की जरूरत थी, उसमें ‘ममत्व की प्यास’ थी, जिसे बुझाने के लिये कई वर्षों से वह प्रयत्न-रत थी. अपनी गोद भरने को तरस रही थी और इस इच्छापूर्ति के लिये उसने क्या-क्या नहीं किया था. अपने मन की व्यथा और जीवन का खालीपन बस शांति ही जानती थी और उसकी इस रिक्ति को दुनिया की कोई अन्य वस्तु पूरा नहीं सकती थी. कितनी उमंगें थी उसकी, कितनी चाहते थी उसकी… कि एक दिन…शादी के बाद उसका भी अपना एक जिगर का टुकड़ा होगा जो उसे मां कहकर पुकारेगा…बस इसी एक आवाज को सुनने के लिये वह तरस गयी थी. गर्भवती बनने और बच्चा होने से पूर्व ही उसने उसके लिये उस की टोपियाँ, स्वेटर, अन्य कपडे-लत्ते जुटाने शुरू कर दिया थे! ईश्वर ने आखिर उसकी प्रार्थना सुन ली थी और एक बच्चा उसकी गोद में डाल दिया था.
उन्होंने अपनी बच्ची का नाम महक रखा था. शांति और रोशन लाल जी की छोटी सी दुनिया, महक के आगमन से महकने लगी थी! अपनी छातियों में दूध न बनने और बच्चे की जरूरत के कारण शांति ने अपने पिछवाड़े में एक बकरी भी बाँध ली थी. रोशन लाल जी ने भी बच्चे के लालन-पालन के लिये अपने काम से अढाई महीने की छुटी ले ली थी. रोशन लाल जी की खुशी का भी कोई ठिकाना न था. बच्चे की परवरिश को लेकर वे अपनी पत्नी शांति की घबराहट से परिचित थे, लेकिन उनके खुद के लिये भी तो यह तजुर्बा बिलकुल नया था. फिर भी वह शांति को होंसला देते, “शांति तू सब्र रख, बस कुछ ही समय में हमारा बच्चा इस काबिल हो जायेगा कि उसे मैं अपनी साईकल पर बिठाकर बाज़ार ले जाया करूंगा !” मैं अपनी महक के लिये यह करूंगा…मैं अपनी महक के लिये वह करूंगा और वे अपने सपनो का ताना-बाना बुनते न थकते थे!
महक बड़ी हो रही थी, समय के साथ साथ उसने फर्श पर घसीटना, अपने दांत निकालना ता.ता ..दा..दा…कहना/ करना शुरू कर दिया था लेकिन शांति तो बस एक ही शब्द सुनने को बेकरार थी. उसे उस दिन का इंतजार था जब उसे कोई ‘मां’ कहकर पुकारेगा. भगवान् ही गवाह है उसने महक के साथ ‘मा..माँ..माँ शब्द की प्रैक्टिस कितनी बार की थी लेकिन, महक ‘मा…मा..’ शब्द निकालने में अभी असमर्थ थी.
लेकिन वह दिन दूर नहीं था…
कल क्या होगा किसने जाना? हम अपनी जिंदगियों में क्या क्या पाने के सपने नहीं लेते, लेकिन, कई बार खुदा की मर्ज़ी शायद कुछ और ही होती है.
सब कुछ ठीक चल रहा था. फिर एक दिन जैसे उनकी जिंदगियों में भूचाल-सा आ गया जिसने सब-कुछ उल्ट-पुलट कर दिया. शांति के लिये जो दुःख एक मात्र पेट-दर्द से शुरू हुआ वही दुःख कुछ दिनों बाद बढ़कर उसके लिये जानलेवा सिद्ध हुआ. शांति अस्पताल से जिन्दा घर न लौट सकी. माँ की लाश घर पहुंची तो उसकी बच्ची महक ने, अपने नन्हे हाथों से अपनी मां के होंठो का स्पर्श किया…उसकी छाती पर अपना सर रख पहली बार ‘मां – मां’ पुकारा! माँ वहाँ होती तो अपनी बच्ची की आवाज़ को सुनती और उसका जवाब देती!
कितनी विडंबना है एक मां अपने जिगर के टुकड़े से ‘मां’ शब्द सुनने के लिये बरसों तड़फती और तरसती रही और फिर एक दिन जब उसके जिगर का टुकड़ा उसे ‘मां’ पुकारने के काबिल हुआ तो ‘मां’ शब्द सुनने वाली वह ‘मां’ न रही!

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