शुक्रवार, 23 जून 2017

आलोक कुमार सातपुते की लघुकथाएं





1हिजड़ा 
वह दैहिक सम्बन्धों से अनभिज्ञ एक युवक था । उसके मित्रजन उसे इन सम्बन्धों से मिलने वाली स्वार्गिक आनन्द की अनुभूति का अतिशयोक्तिपूर्ण बखान करते। उसका पुरुषसुलभ अहम् जहाँ उसे धिक्कारता, वहीं उसके संस्कार उसे इस ग़लत काम को करने से रोकते थे । इस पर हमेशा उसके अहम् और संस्कारों में युद्ध होता था । एक बार अपने अहम् से प्रेरित हो वह एक कोठे पर जा पहुँचा। वहाँ पर वह अपनी मर्दांनगी सिद्ध करने ही वाला था कि, उसके संस्कारों ने उसे रोक लिया। चँूकि वह संस्कारी था, सो वह वापस आने के लिये उद्यत हो गया, इस पर उस कोठेवाली ने बुरा सा मँुह बनाया, और लगभग थूकने के भाव से बोली-साला हिजड़ा।
बाहर निकलने पर उसके मित्रों ने उससे उसका अनुभव पूछा, इस पर उसने सब कुछ सच-सच बता दिया। इस पर उसके मित्रों का भी वही कथन था-साला हिजड़ा।
...इतना होने पर भी वह आज संतुष्ट है, और सोचता है कि, वह हिजड़ा ही सही, है तो संस्कारी।


2वर्गभेद 
किसी गांव मेें तीन व्यक्ति ‘अ’, ‘ब’, और ‘स’ रहा करते थे, जो क्रमशः उच्च वर्ग, मध्यमवर्ग, और निम्नवर्ग से थे । तीनों ने ही अलग-अलग शासकीय कर्ज ले रखा था । क़िस्तें न पटने पर  एक बार उस गांव में वसूली अधिकारियों का दौरा हुआ । सबसे पहले वे ‘अ’ के घर पहुंचे। वहां वे मुर्ग़े की टाँगें खींचते और महुए की श़्ाराब पीते हुए कहने लगे-‘दाऊजी, आपसे तो हम पैसे कभी भी ले लंेगे,...पैसे भागे थोडे़ ही जा रहे हंै। वहां से वे ‘स’ के घर पहुंचे, उसकी दयनीय स्थिति देखकर उनकी आंखें डबडर्बा आइं, और वे उससे बिना कुछ कहे ‘ब’ के घर की ओर चल दिये और वहां पहुंचकर उन्होंने उसे हड़काना शुरू कर दिया-क्यों बे ! पैसे देखकर तेरी नीयत ख़राब हो गई...। लाओ साले की ज़मीन, जो कर्ज़ लेते समय बंधक रखी थी, को नीलाम करते हंै ।
...और नीलामी कि प्रक्रिया शुरू हो गयी । 


3तीन ठग
सैकड़ों वर्षांे की ग़्ाुलामी-तप से प्रसन्न हो कर प्रभु ने वरदान-स्वरुप भारत को एक लोकतंात्रिक कुर्सी प्रदान कर दी । चँूकि भारत की काया जीर्ण हो चली थी, इसलिये वह उसे कंधो पर बंाधे धीरे-धीरे चलने लगा, तभी सामने से आते हुए तीन ठगों की नज़रें उस कुरसी पर पड़ी । कुरसी देखकर उनके मँुह में पानी भर आया, और वे उसे हड़पने की युक्ति सोचने लगे । आख़िरकार उनके श़्ाातिर दिमाग़ में एक युक्ति आ ही गई । योजनानुसार तीनों उसी मार्ग पर अलग-अलग छिप गये । उनकी उपस्थिति से बेख़बर भारत अपनी मंद चाल से चलता रहा, तभी पहला ठग सामने आकर उससे कहने लगा-क्यूं भाई ! आप ये सम्प्रदायवाद की बेंच को कहाँ लिये फिर रहे हो ? क्रोधित हो भारत ने कहा अंधे हो क्या ? तुम्हंे ये लोकतांत्रिक कुरसी नज़र नहीं आती । ठग हँसता हुआ चला गया । कुछ आगे जाने पर दूसरा ठग सामने आकर कहने लगा-ये जातिवाद की टेबल को कहाँ लादे फिर रहे हो ? भारत ने बैाखलाकर कहा-अरे भई, ये टेबल नही, कुर्सी है । इस पर दूसरा ठग भी हँसते हुए चला गया । कुछ और आगे बढ़ने पर भारत का सामना तीसरे ठग से हो गया । तीसरा ठग ठहाका लगाकर कहने लगा-अरे यार ये क्षेत्रीयता के डबलबेड के पलंग को कहाँ ढोये जा रहे हो ? 
अब भारत का आत्मविश्वास भी डगमगा गया । उसने यह सोचकर कि संप्रदायवाद, जातिवाद, और क्षेत्रीयतावाद से तो उसका अहित ही होगा, उसने कुर्सी को फेंकना चाहा । अब कुर्सी सड़क पर थी, पर भारत के कंधों का बंधन पूरी तरह खुला नहीं था, सो वह कुर्सी भारत के साथ घिसटती जा रही थी । अब बारी-बारी से तीनों ठग कूद-कूद कर उस कुरसी पर बैठने लगे।
तब से लेकर आज तक यह सिलसिला ज़ारी है । 


4अविश्वास
एक घर में तीन व्यक्ति बैठे हुये हंै। पहला उस घर का मालिक, दूसरा उसका एक नज़दीकी मित्र, और तीसरा वो, जो उसके साइड वाले कमरे को किराये से पाने की उम्मीद से उसके नज़दीकी मित्र के साथ आया है। चँूकि उम्मीदवार कंुआरा है, इसलिये मकान-मालिक उसे किरायेदार नहीं बनाना चाह रहा है, पर साथ में नज़दीकी मित्र होने के कारण वह धर्मसंकट में है। 
उनके बीच बातचीत का सिलसिला प्रारंभ होता है । 
मकान-मालिक -फ़िलहाल तो मकान किराये पर उठाने का हमारा कोई इरादा नहीं है। 



उम्मीदवार -क्यों ? 
मकान-मालिक -क्यांेकि उस कमरे की खिड़कियों में पल्ले नहीं लगे हैं, और बिजली का कनेक्शन भी पीछे पोल से है, उसे सामने पोल से लेना है । 
उम्मीदवार -मुझे कोई हर्ज़ नहीं है। मैं चाबी आपके पास ही छोड़ जाया करूँगा, फिर आप चाहे जैसे रिपेयरिंग करवाते रहिये । 
(मकान मालिक सोचने लगता है ये साला ऐसे टलने वाला नहीं,...मुझे कोई दमदार बहाना सोचना चाहिए, तभी उसे कुछ सूझता है।)
मकान-मालिक -हमारे यहाँ हमारे भतीजे भी साथ में रहतेे हैं। उनकी पढ़ाई में ख़लल न पड़े, सोचकर भी हम फ़िलहाल मकान किराये से देने के पक्ष में नहीं हेैं।(इस बीच मकान-मालकिन चाय लेकर आती है)
उम्मीदवार (चाय पीते-पीते)- भाईसाहब, पढ़ाई के मुआमले में तो मैं और भी संज़ीदा हूँ। मंै खुद सिविल सर्विसेज़ की तैयारी कर रहा हँू। ये तो आपके लिये प्लस-प्वांईट होना चाहिये । 
(मकान मालिक फिर सोचने लगता है, साला है तो दिमाग़ का तेज़ पर जब मिसेज़ चाय लेकर आई थी, तो ऐसे घूर रहा था, मानों कच्चा ही चबा जायेगा...इससे स्पष्ट कहना ही ठीक रहेगा।)
मकान-मालिक -यार हम लोग फ़ैेमिली वालों को ही मकान किराये से देने के पक्ष में हैं। 
अब उम्मीदवार जाने के लिये निराशापूर्वक उठ खड़ा हो जाता है, क्योंकि उसे मालूम है, उसके चेहरे पर तो उसका चरित्र खुदा हुआ नहीं है, किन्तु जाते-जाते वह कहकर ही जाता है-भाईसाहब, पहले आप मुझे यह बतायें कि आपको मुझ पर भरोसा नहीं है, या अपने आप पर, या फिर अपनी पत्नी पर...।

आलोक कुमार सातपुते 


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