शनिवार, 10 जून 2017

शार्टकट






आलोक कुमार सातपुते
        टी.वी. पर केन्दीय मंत्रिमण्डल का शपथ ग्रहण समारोह का सीधा प्रसारण चल रहा था। प्रमोद और उसकी पत्नी करूणा यह जानने को उत्सुक थे कि उनके राज्य से किसी को मंत्री बनाया जा रहा है, या नहीं। हालांकि अख़बारों में उनके राज्य से सबसे कम उम्र की महिला कमली तिवारी को महिला विकास मंत्री बनाये जाने की ख़बर पिछले कुछ दिनों से चल रही थी, पर अंतिम समय तक सब कुछ अनिश्चित ही था। उनके साथ उनकी पेईंग गेस्ट रेखा भी बडे़ ध्यान से शपथ ग्रहण समारोह देख रही थी। करूणा को इस बात की भी खुशी थी कि यदि कमली को मंत्री बनाया जाता है, तो वह सबसे कम उम्र की महिला मंत्री बनने का रिकार्ड बना लेगी। कमली तिवारी एक बेहद ही ख़ूबसूरत लड़की थी। वह किसी फिल्म की हीरोईन की तरह ही दिखती थी। पूरे राज्य में उसकी ख़़ूबसूरती के चर्चे होते रहते थे। उसके बारे में कहा जाता था कि वह एक सेलिब्रेटी लीडर है। राज्य का युवा वर्ग तो उसका दीवाना ही था। उसके संसदीय क्षेत्र मे तो युवा वर्ग ने उसकी ख़ूबसूरती को ही देखकर ही वोट दिया था। यह इस बात से प्रमाणित होता था कि उसने  पहली बार ही लोकसभा का चुनाव लड़ा था और उसके प्रतिद्वंद्वी की जमानत तक जब्त हो गई थी। कमली के बारे में पढ़ने को मिलता रहता था कि वह काॅलेज़ के दिनों से ही लीडरशिप कर रही है। जो भी हो, राज्य की महिलाओं को उससे बड़ी उम्मीदें थीं कि महिला विकास मंत्री का पद मिलने के बाद वह निश्चित तौर पर महिला सशक्तिकरण की दिशा में कार्य करेगी।

        शपथ ग्रहण के लिए उसका नाम पुकारा गया। उसने बडे़ ही आत्म-विश्वास के साथ अंग्रेज़ी में शपथ ली। शाम होते-होते उसका विभाग भी पता चल चुका था। आशानुरूप उसे महिला विकास मंत्रालय ही मिला था। वह राज्य मंत्री न बनाकर सीधे केबिनेट मंत्री बनाई गयी थी। यह उनके राज्य के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। रात होते-होते अलग-अलग चैनलों में उसका अंग्रेजी में इंटरव्यू भी चलने लगा था। इन सारे कार्यक्रमों को उनकी पेईंग गेस्ट रेखा भी उनके साथ ही बड़े ध्यान से देख रही थी। रेखा एक दलित जाति की लड़की थी और एक सरकारी आॅफ़िस में क्लर्क थी। वह शहर से पांच सौ कि.मी. दूर जंगल के बीच बसे एक छोटे से कस्बे की रहने वाली थी। आमतौर पर अपने कमरे में ही घुसे रहने वाली रेखा आज दिनभर उनके साथ ही ये सारे कार्यक्रम देखती रही। आज उसने आफ़िस से छुट्टी ली हुई थी। अचानक रेखा ने करूण से कहा-दीदी ये कमली हमारे ही कस्बे की रहने वाली है।यह सुनकर पति-पत्नी दोनें को बड़ा आश्चर्य हुआ, क्यांेकि वे कमली के बारे में जितना कुछ जानते थे, उसके हिसाब से तो वह उनकेे अपने ही शहर की थी। वे तो कमली के बारे में अपने शहर की छात्र राजनीति के दौर से पढ़-सुन रहे थे। वे उसके विश्वविद्यालय प्रतिनिधि चुने जाने से लेकर उसके महापौर बन जाने और फिर इस्तीफ़ा देकर विधायक बनने और फिर तुरंत ही इस्तीफ़ा देकर लोकसभा चुनाव लड़ने तक के सारे घटनाक्रम से वाकिफ़ थे। कमली का कम उम्र में ही बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित होना, जहाँ एक ओर महिलाओं के लिए गर्व की बात थी, तो दूसरी ओर कुछ महिलाओं को उससे ईष्र्या भी होती थी। ख़ैर रेखा के यह बताने पर कि कमली किसी छोटे से कस्बे की रहने वाली है, उन्हे यक़ीन ही नहीं हुआ और उन्होंने रेखा की बातों को कोई तवज्जो नहीं दी। फिर अचानक रेखा ने धमाका करते हुए उन्हें बताया कि कमली पहली कक्षा से लेकर काॅलेज़ के फस्र्ट ईयर तक हमारे ही कस्बे में पढ़ी है। पूरी तरह हिन्दी मीडियम की सरकारी स्कूल और काॅलेज़ में। प्रमोद को लगा कि रेखा को कोई ग़लतफ़हमी हो गई है, क्योंकि उन्हांेने तो हमेशा कमली को एक सेलीब्रेटी की तरह ही आत्मविश्वास से पूर्ण फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलते हुए ही सुुना था। ऐसे में यह मानना कठिन था कि वह किसी हिन्दी मीडियम की सरकारी स्कूल में पढ़ी हुई है। उसने रेखा को समझाते हुए कहा-अरे तुम्हे कोई ग़लतफ़हमी हो रही है। हम तो इसे काॅलेज़ के जमाने से जान रहे हैं, जब ये छात्र नेता हुआ करती थी। इस पर रेखा ने कहा- नहीं, मुझे कोई ग़लतफ़हमी नही् हो रही है। वह मेरे ही कस्बे के सरकारी काॅलेज़ में मेरे ही साथ फस्र्ट ईयर तक पढी़ है। हम दोनां किसी जमाने में पक्की सहेलियाँ रह चुकी हैं। अच्छा-अच्छा ठीक है कहकर उन्हांने बात ख़त्म कर दी। उन्हं रेखा की बातों पर बिल्कुल ही यकीन नहीं हुआ। करूणा सोचने लगी कि कहाँ यह रेखा, जो कि हिन्दी भी शुध्द तरीके से नहीं बोल पाती है। क्षेत्रीय बोली मिश्रित हिन्दी बोलने वाली लड़की, और कहां फर्राटेदार अंगरेज़ी बोलने वाली कमली। थोड़ी देर के बाद रेखा अपने कमरे में सोने चली गई। अगले दिन के अख़बारों में कमली के शपथ लेने से लेकर उससे संबंधित सारी ख़बरें प्रमुखता से छपी थीं। साथ ही छपा था उसका जीवन परिचय, जिसमें स्पष्ट लिखा हुआ था कि वह पहली कक्षा से लेकर काॅलेज के फस्र्ट ईयर तक एक छोटे से कस्बे में ही पढ़ी हुई है। वह रेखा का बताया हुआ कस्बा ही था। यह पढ़ने के बाद करूणा का खुशी का ठिकाना ना रहा। आज रेखा अचानक ही वीआईपी हो गई थी। वह कमली के बारे में रेखा से और ज़्यादह जानना चाहती थी। उसने रेखा के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। अलसाई हुई सी रेखा ने दरवाज़ा खोला। करूणा ने चहकते हुए कहा- अरे तू सही कह रही थी। ये कमली तो तेरे ही कस्बे की रहने वाली तेरी पक्की सहेली ही है। हां, दीदी मैंने तो आपको कल ही बताया था, रेखा ने कहा। 


सुन ना, मुझे कमली के बारे में ज़्यादह से ज़्यादह जानने की उत्सुकता हो रही है।मैं यह भी जानना चाह रही थी कि कि एक छोटे से कस्बे से उसने दिल्ली तक का सफ़र कैसे पूरा किया। आ ना बैठते हंै मुझे कमली के बारे में तुझसे पूरी जानकारी चाहिये। करूणा ने उत्साहित होकर कहा। मैं तैयार होकर आती हूँ दीदी, कहकर रेखा ने दरवाज़ा लगा दिया। आज सण्डे था। थोडी़ देर बाद रेखा तैयार होकर बाहर निकल आई। करूणा ने रेखा से कहा- यार रेखा, अब तोे तुम्हारी पक्की सहेली केबिनेट मंत्री बन गई है। मंत्री लोगों के पास यह पाॅवर होता है कि वह अपने किसी भी परिचित सरकारी कर्मचारी को अपने स्टाॅफ़ में रख सकता हैं। मुझे तो लग रहा है कि दो-चार दिनों में वह तुम्हंे अपने स्टाॅफ़ में बुलवा ही लेगी। अब तुम दिल्ली जाने के लिए तैयार रहो। अगर तुम दिल्ली न भी जाओ, तो केन्द्रीय मंत्रियों का उनके अपने राज्य में भी एक कार्यालय होता है। वह यहाँ वाले आॅफ़िस में तो तुम्हें जरूर बुलवा ही लेगी। तब तो यार, तुम भी वीआईपी हो जाओगी। यार, हमारा छोटा-मोटा काम करा दिया करना। उसने उत्तेजना के साथ एक ही सांस में सारी बातें कह दी थी। उसकी बातें सुनकर रेखा के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान आ गई और उसने कहा-दीदी आपने उस दिन मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया था। मैंने यह कहा था कि वह किसी जमाने में मेरी पक्की सहेली रही है। चार-पाँच सालों से तो मेरी उससे बातचीत भी नहीं हो रही है। वह किसी भी अपरिचित को अपने स्टाॅफ़ में रख लेगी, पर मुझे कतई नहीं रखेगी। इस पर करूणा ने आश्चर्य से पूछा-क्यों? इस पर उसने बेहद गंभीर लहज़े में कहा कि मेरे पास उसके डर्टी सीक्रेट्स हंै। यह कहते हुए उसका मन विषाद से भर उठा। 
         रेखा पिछले दो सालों से उनके यहाँ पेईंग गेस्ट के रूप में रह रही थी। चूंकि प्रमोद लोग भी दलित जाति से ही थे, सो रेखा उनसे एकदम घनिष्ठ हो गई थी। उनके बीच एक अनजाना सा अपनापन बन गया था। करूणा उसे अपनी छोटी बहन ही मानती थी। थोड़ी देर बाद रेखा ने कहना शुरू किया गया -आज तक मैंने कभी किसी को उसके बारे में बताया नहीं है, लेकिन चूंकि आप मेरी अपनी हैं, इसलिए मैं आपको कमली के डर्टी सीक्रेट्स के बारे में बता रही हूँ। वरना तो यह राज़ मेरे सीने में दफ़्न सा हो चुका था। थोड़ा रूककर उसने बताना शुरू किया-दीदी कमली एक बेहद ग़रीब परिवार की लड़की है। उसके पिता की मृत्यु बहुत पहले ही चुकी थी। उसकी माँ हमारे कस्बे के अमीर लोगों के घरों में खाना बनाने का काम करती थी। काम छोटा होने के बावजूद सम्मानजनक था। लोग उसे महाराजिन-महाराजिन कहते थे। फाॅरेस्ट विभाग के एक ठेकेदार ने उसे अपनी रखैल की तरह ही रखा था। कमली की माँ कमली की तरफ़ ध्यान नहीं देती थी। अभावों में रहने के बावज़ूद उसमें गरीबी से उत्पन्न हीनता के भाव बिल्कुल भी नहीं थे। ब्राम्हण होने के कारण उसमें आत्मविश्वास कूट-कूटकर भरा हुआ था। मेरे अलावा उसकी दो-तीन और दलित सहेलियाँ थीं। वह कभी मेरे घर, तो कभी दूसरी सहेलियों के घर खाना खाती, और बडे़ अधिकार के साथ मांगकर खाती थी। वह कहती देखो मैं ब्राम्हण होने के बावजूद छुआछूत नहीं मानती हूँ। मै दलितों के घर भी खाना खा लेती हूं। ऐसा कहकर वह ऐसा जताती थी मानांे वह हमारे घर खाना खाकर अहसान जता रही हो। वह दिन भर इधर-उधर घूमती रहती और सिर्फ़ रात में ही अपने घर जाती थी। वह शुरू से ही बडी़ ही महत्वाकांक्षी लड़की थी। उसमें लीडरशीप का गुण कूट-कूटकर भरा हुआ था। प्रायमरी स्कूल से लेकर हाॅयर सेकण्डरी तक वह अपनी कक्षा की कप्तान रही, और बड़ी दबंगई से कप्तानी करती रही। कस्बे में होने वाले नेताओं के कार्यक्रमों में वह हमेशा ही यह कोशिश करती थी कि किसी भी तरह उसे मंच पर जाने का मौका मिल जाये। चूंकि वह एक दबंग लड़की थी, और हम सब लोग दब्बू थीं, इसलिए हम एक तरह से उसके पीछे-पीछे ही रहती थीं। वो मुझसे हमेशा ही कहती थी-रेखा देखना एक दिन मैं मंत्री बनूंगी। मुझे याद है जब हम बारहवीं कक्षा में थे, तभी यह घोषणा हो गई थी हमारे क्षेत्र के सारे राजनैतिक पद, दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षित हो गये हैं। उसने जब पेपर में यह ख़बर पढ़ी, तो बेहद उदास हो गई, लेकिन अगले ही दिन वह वापस अपने रंग में आ गई। उसने मुझसे कहा था-रेखा, यह तो अच्छी बात है कि यहाँ के सारे पद दलितों-आदिवासियों के लिए आरक्षित हो गये हंै। यदि मैं लीडर नहीं बन पाई तो कोई बात नहीं, तुम ही लीडर बन जाना, और मुझे अपनी असिस्टेण्ट बना लेना। फिर तो हम दोनों ही पाॅवरफुल हो जायेंगे। मैं तुझे राजनीति सीखा दूंगी। मैंने उससे कहा कि यार ये लीडरी-वीडरी मुझसे नहीं होगी। मुझे तो बस छोटी-मोटी क्लर्क वग़ैरह की नौक़री भी मिल जाये, तो ही मेरे लिये बहुत है। इस पर उसने नाराज़ होकर कहा था-यार, तुम छोटे लोग छोटा ही सोचोगे। अरे यार बडा़ सोचो। बडा़ सोचोगे तो ही तो कुछ बडा़ कर पाओगे।

        एक बार हम स्कूल की तरफ़ से पडो़सी राज्य की राजधानी घूमने के लिए गये। कमली ने पता लगा लिया था कि वहां पर महिला विकास विभाग की मंत्री गंगादेवी नाम की एक ब्राम्हण महिला है। बस फिर क्या था। उसने मंत्री से मिलने का समय ले लिया। वह मुझे भी ज़िद करके अपने साथ ले गई। हम दोनांे उस मंत्री बंगले की भव्यता को देखकर दंग रह गये। निर्धारित समय पर हमारा बुलावा हुआ। बंगले की भव्यता देखकर मैंने कमली से कहा जा तू ही अंदर जा, पर कमली ने बडे़ आत्मविश्वास से कहा-रेखा देखना एक दिन मेरा भी ऐसा ही बंगला होगा। तो क्या तू उस समय भी मुझसे मिलने के लिए झिझकेगी। यार अपने अंदर की हीनभावना को दूर कर और चल मेरे साथ। वह मुझे ज़बरदस्ती अंदर ले गई। अन्दर अपने चेम्बर में धीर-गंभीर मुद्रा में गंगादेवी बैठी हुई थी। कमली ने बे-झिझक कहा कि मैडम हम लोग आपसे बेहद प्रभावित हैं। आपके कामों के बारे में हम लोग अपने राज्य के अख़बारों में पढ़ते ही रहते हैं। आप हमारी प्रेरणास्त्रोत हैं। हम लोग भी आप जैसी ही नेता बनना चाहती हंै। इस पर गंगादेवी ने हमे उपर से लेकर नीचे तक तौलते हुए-कहा पता नहीं तुम लोग समझोगे या नहीं, पर मैं तुम्हें यह बात बता रही हूं कि राजनीति में सफलता का रास्ता बेडरूम से होकर ही गुजरता है। इतनी बड़ी मंत्री के मुँह से इतनी छोटी बात सुनकर मुझे उसकी भव्यता थोथी जान पड़ने लगी। उसका व्यक्तित्व का खोखलापन मेरे सामने ज़ाहिर हो चुका था। मुझे उस औरत पे घिन सी आने लगी थी, लेकिन कमली तो बेहद खुश थी। उसे सफलता पाने का शाटर्कट रास्ता मिल चुका था। 
       वहां से बाहर निकलकर उसने मुझमें कहा था रेखा मैं सफलता पाने के लिए कुछ भी कर सकती हूँ। खै़र ये बात आई-गई हो गई। वह प्रायः कहती-यार इस छोटे से कस्बे में कुछ नहीं रखा है। मुझे तो बडे़ शहर जाना है। यहाँ पर तो मेरा दम घुटता है। चूँकि बडे़ शहर जाने और हाॅस्टल आदि में रहकर पढा़ई करने की उसकी हैसियत नहीं थी, सो उसने बडे़ ही बेमन से वहाँ के काॅलेज़ में फस्र्ट इयर में एडमिशन ले लिया था, लेकिन फस्र्ट ईयर के बाद उस फाॅरेस्ट ठेकेदार ने उसे इस शहर में पढ़ने के लिए भेज दिया। चूँकि ठेकेदार का यहां पर भी एक घर था, सो वह उसी के घर में रहते हुए काॅलेज़ की पढा़ई करने लगी। और जल्द ही छात्र राजनीति मे सक्रिय होकर एक बड़ी नेता बन गयी। और दीदी उसके बाद की कहानी तो आप सभी जानते ही हंै। हाँ वह मुझसे अपने सभी डर्टी सीक्रेट्स शेयर करती रही। उसने बताया था कि उसने छात्र राजनीति के दौरान ही एक बडी़ पार्टी के संगठन में संेध लगा दी थी, और संगठन के सबसे बडे़ नेता के साथ हमबिस्तर होकर महापौर बन गई थी। बाद मंे वह उसकी रैखल बन गई। धीरे-धीरे वह आवश्यकतानुसार बिस्तर बदलती रही, और फिर विधानसभा और लोकसभा तक पहुंच गई। धीरे-धीरे मेरी उसके कामों में मेरी अरूचि और उसकी व्यस्तता के कारण हमारे बीच बातचीत बंद हो गई। कमली की सफलता के पाने के शार्टकट रास्ते के बारे में जानने के बाद करूणा को चिन्ता होने लगी कि देश के महिला विकास विभाग का भगवान ही मालिक है।




लेखक परिचय - 1. हिन्दी, उर्दू एवं अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में समान रूप स ेलेखन
 2.पाकिस्तान के अंग्रेजी अखबार डाॅन के उर्दू संस्करण में लघुकथाओं का धारावाहिक प्रकाशन।
3. पुस्तकें प्रकाशन - अपने-अपने तालिबान (हिन्दी शिल्पायन एवं उर्दू आक़िफ़ बुक डिपो), बेताल फिर डाल पर (सामयिक प्रकाशन), मोहरा, बच्चा लोग ताली बजायेगा (डाॅयमंड बुक्स) 


यह भी पढ़ें ........
समय रेखा -अंजू शर्मा 
क्या मेरी रजा की जरूरत नहीं थी - वंदना बाजपेयी 

घरेलु पति -रजा सिंह 

बेबस बुढापा - आशा पाण्डेय
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें