शुक्रवार, 30 जून 2017

“नज़रे बदलो नज़ारे बदल जायेंगे” आपकीसोच जीवन बना भी सकती है बिगाढ़ भी सकती है




पंकज प्रखर, 
सकारात्मक सोच व्यक्ति को उस लक्ष्य तक पहुंचा देती है जिसे वो वास्तव में प्राप्त करना चाहता है लेकिन उसके लिए एक दृण सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है| जब जीवन रुपी सागर में समस्यारूपी लहरें हमे डराने का प्रयत्न तोहमे सकारात्मकता का चप्पू दृण निश्चय के साथ उठाना चाहिए | यदि आप ऐसा करते है तो निश्चितरूप से मानकर चलिए आप की नैया किनारे लग ही जाएगी | लेकिन ये निर्भर करता है की उस समयसमस्या के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है ,आप उन परिस्थितियों पर हावी होते है या परिस्थितियाँ आप पर दोपंक्तियाँ याद आती है नज़रें बदली तो नज़ारे बदले,कश्ती ने बदला रुख तो किनारे बदले|सोच का बदलना जीवन का बदलना है जी हाँ आप जब चाहे अपने जीवन को बदल सकते है|

जनसेवा के क्षेत्र में रोल माॅडल बनीं पुष्पा पाल





प्रस्तुति - प्रदीप कुमार सिंह

अम्बेडकर नगर: महिलाओं व बच्चों के हित में कार्य करने के लिए रोल माॅडल के रूप में उभरी हैं अकबरपुर तहसील क्षेत्र के कुटियवा गांव निवासिनी पुष्पा पाल। 
पिता के निधन के बाद उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में काम करने की चुनौती न सिर्फ स्वीकार किया वरन उसे अभी तक भली-भांति आगे बढ़ाया भी है। उनके इसी जज्बे व योगदान को देखते हुए राज्य सरकार ने गत वर्ष उन्हें रानी लक्ष्मी बाई पुरस्कार से लखनऊ में सम्मानित भी किया था। बेवाना ब्लाॅक भवन के शिलान्यास मौके पर भी पुष्पा को सम्मानित किया गया था।

गुरुवार, 29 जून 2017

आईये हम लंठो को पास करते है ( व्यंग्य )





-रंगनाथ द्विवेदी अब इस देश मे वे दिन नही जब हम अन्य विज्ञापनो की भांति ही ये विज्ञापन भी अपने टेलीविजन या अखबारो मे लिखा हुआ देखेंगे कि "आईये हम अपनी शिक्षण संस्था से लंठो को पास करते है"। योग्यता बाधा नही परसेंटेज के हिसाब से सुविधाएँ उपलब्ध,हमारी विशेष उपलब्धि व आकर्षण है कि "हम अपना नाम न लिख पाने वाले छात्र को भी पूरे प्रदेश या राज्य मे टाप करवाते है"। इस तरह के तमाम पीड़ित व कमजोर छात्र मौके का लाभ उठा आज तमाम बड़ी नौकरियो में अपनी सफलता पूर्वक सेवाये दे रहे है। इन लोगो के जीवन कौशल व उपलब्धि की छटा अद्भूत है,कल हमारे ही कुछ सफल तथाकथित छात्रो को ये समाज नकारा और बेकार कहता था,आस-पास के लोग अपने बेटो को इनसे दूर रहने की सलाह देते थे। आज उन्हीं के वे तमाम उज्ज्वल बेटे स्याह से भी ज्यादा स्याह हो गये है"बेरोजगारी ने चेहरे का सारा लालित्य छिन लिया है"।

पढ़ाई के लिए छोड़ना पड़ा घर 16 फ्रैक्चर, 8 सर्जरी के बाद भी आईएएस बनीं - उम्मुल खेर, सिविल सेवा आईएएस 2017 में चयनित


     राजस्थान के पाली मारवाड़ में जन्मी उम्मुल की मां बहुत बीमार रहती थीं। पापा उन्हें छोड़कर दिल्ली आ गए। मां ने कुछ दिन तो अकेले संघर्ष किया, पर सेहत ज्यादा बिगड़ी, तो बेटी को पापा के पास दिल्ली भेज दिया। तब उम्मूल पांच साल की थी। दिल्ली आकर पता चला कि पापा ने दूसरी शादी कर ली है। वह अपनी नई बीवी के साथ एक झुग्गी में रहते हैं। नई मां का व्यवहार शुरू से अच्छा नहीं रहा। पापा निजामुद्दीन स्टेशन के पास पटरी पर दुकान लगाते थे। मुश्किल से गुजारा चल पाता था। उम्मुल के आने के बाद खर्च बढ़ गया। यह बात नई मां को बिल्कुल अच्छी नहीं लगी।

एंजिलिना जोली सिंड्रोम - सेहत के जूनून की हद


एक आम घर का दृश्य देखिये | पूरा परिवार खाने की मेज पर बैठा है | सब्जी रायता , चपाती , गाज़र का हलवा और टी .वी हाज़िर है | कौर तोड़ने ही जा रहे हैं कि टी वी पर ऐड आना शुरू होता है बिपाशा बसु नो शुगर कहती नज़र आती हैं | परिवार की १७ वर्षीय बेटी हलवा खाने से मना कर देती है | माँ के मनुहार पर झगड़ कर दूसरे कमरे में चल देती है | वहीँ बेटा विज्ञापन देख कर ६ पैक एब्स बनाने के लिए जिम कि तगड़ी फीस की जिद कर रहा है | सासू माँ अपने तमाम टेस्ट करवाने का फरमान जारी कर देती हैं|परिवार का एकमात्र कमाऊ सदस्य अपनी लाचारी जाहिर करता है तो एक अच्छा खासा माहौल तनाव ग्रस्त हो जाता है |

बुधवार, 28 जून 2017

जो मिला नहीं उसे भूल जा





सीताराम गुप्ता
दिल्ली
दुखों से बचने के लिए जीवन के बायोडाटा में सिर्फ़ उसे शुमार करें जो आज आपके पास है
उर्दू शायर अमजद इस्लाम ‘अमजद’ की ग़ज़ल का मत्ला है :
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते, कहाँ मोड़ था उसे भूल जा,
वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा।
जीवन में हमारी बहुत-सी ख़्वाहिशें होती हैं। उनमें से कुछ पूरी हो जाती हैं तो कुछ नहीं। हमारी जो ख़्वाहिशें पूरी नहीं हो पातीं हमारा सारा ध्यान उन्हीं पर केंद्रित रहता है। हम बार-बार उन्हीं अभावों को लेकर दुखी होते रहते हैं। अभाव ही हमारी ज़िंदगी का चिंतन बन जाता है जो हमारे दुखों का सबसे बड़ा कारण है। यही अभाव का चिंतन कालांतर में हमारे जीवन की वास्तविकता में परिवर्तित हो जाता है क्योंकि हम जैसा सोचते हैं वही हमारे जीवन में घटित होता है। ख़्वाहिशों अथवा इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता लेकिन ये हक़ीक़त हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि अभावों के बावजूद हमें जीवन में बहुत कुछ मिला होता है। हमारी अनेक उपलब्धियाँ होती हैं। हमने अभावों के बावजूद हार नहीं मानी है और ईमानदारी से आगे बढ़ने का प्रयास करते रहे हैं। इन उपलब्धियों को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है? लेकिन वास्तविकता यही है कि हम इन्हें नज़रअंदाज़ कर जो नहीं किया या जो नहीं मिला उसे सोच-सोचकर परेशान होते रहते हैं।

फेसबुक और महिला लेखन





कितनी कवितायें  भाप बन  कर उड़ गयी थी 
उबलती चाय के साथ 
कितनी मिल गयी आपस में 
मसालदान में 
नमक मिर्च के साथ 
कितनी फटकार कर सुखा दी गयी 
गीले कपड़ों के साथ धूप में 
तुम पढ़ते हो 
 सिर्फ शब्दों की भाषा 
पर मैं रच रही थी कवितायें 
सब्जी छुकते हुए 
पालना झुलाते हुए 
नींद में बडबडाते हुए 
कभी सुनी , कभी पढ़ी नहीं गयी 
कितनी रचनाएँ 
जो रच रहीहै 
हर स्त्री 
हर रोज 
                             सृजन और स्त्री का गहरा नाता है | पहला रचियता वो ईश्वर है और दूसरी स्त्री स्वयं | ये जीवन ईश्वर की कल्पना तो है पर मूर्त रूप में स्त्री की कोख   में आकार ले पाया है | सृजन स्त्री का गुण है , धर्म है | वह हमेशा से कुछ रचती है | कभी उन्हीं मसालों से रसोई में कुछ नया बना देती है की परिवार में सब अंगुलियाँ चाटते रह जाएँ | कभी फंदे - फंदे जोड़ कर रच देती है स्वेटर | जिसके स्नेह की गर्माहट सर्द हवाओ से टकरा जाती है | कभी पुराने तौलिया से रच देती है नयी  दरी | जब वो इतना सब कुछ रच सकती है तो फिर साहित्य क्यों नहीं ? कभी - कभी तो मुझे लगता है की क्या हर स्त्री के अंदर कविता बहती है , किसी नदी की तरह या कविता स्वयं ही स्त्री है ? फिर भी भी लम्बे समय तक स्त्री रचनकार अँगुलियों पर गिने जाते रहे | क्या कारण हो सकता है इसका ... संयुक्त परिवारों में काम की अधिकता , स्त्री की अशिक्षा या अपनी खुद की ख़ुशी के लिए कुछ भी करने में अपराध बोध | या शायद तीनों |

नर्गिस - हम न रहेंगे , तुम न रहोगे , फिर भी रहेंगी निशानियाँ


जीवन परिचय 
1 जून 1929 को नर्गिस का जन्म कलकत्ता में हुआ था। उनका असली नाम तो फातिमा राशिद था, लेकिन दुनिया में उन्हें उनके फिल्मी दुनिया के नाम नर्गिस के नाम से पहचान मिली।
नर्गिस ने 1935 में चाइल्ड एक्टर के तौर पर फिल्म ‘तलाश-ए-हक’ से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की, लेकिन उनका असली करियर शुरू हुआ 1942 में फिल्म ‘तमन्ना’ से। 1940-1960 के बीच उन्होंने कई बड़ी और सफल फिल्मों में काम किया और खूब पसंद भी किया गया। उन्हें सबसे ज्यादा पहचान राज कपूर के साथ फिल्मों में मिली। राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी खासी मशहूर रही और दोनों के रिश्तों के लेकर भी मीडिया में खूब चर्चाएं रहीं।

लक्ष्मी नारायण सिंह उर्फ़ लच्छु महाराज

शास्त्रीय संगीत जगत में प्रसिद्ध बनारस घराने से ताल्लुक रखने वाले मशहूर तबला वादक लक्ष्मी नारायण सिंह उर्फ लच्छू महाराज संगीत के असली साधक थे. तबले की थाप पर उन्होंने पूरी दुनिया को नाचने के लिए मजबूर किया. उनके जाने से बनारस घराने के साथ ही पूरी काशी में एक रिक्तता का आभास हो रहा है.
लच्छू महाराज ने अपने जीवन में जिन ऊंचाइयों को छुआ, वह हर किसी के बस की बात नहीं.





लच्छू महाराज का जन्म 16 अक्टूबर 1944 को बनारस में ही चौक इलाके में हुआ था. उन्होंने छोटी उम्र में ही तबला वादन शुरू कर दिया था. उनका विवाह टीना नामक फ्रांसीसी महिला से हुआ था.
तबला वादन के प्रति समर्पण भाव के चलते 1962 में उन्हें दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो में प्रस्तुति का मौका मिल गया. इसके बाद से पं. लच्छू महाराज ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उनकी उंगलियों के जादू को देखते हुए उन्हें ‘विश्व तबला सम्राट’ की उपाधि मिली.
बनारस के संगीत प्रेमियों की माने तो वे संगीत के असली साधक थे. वह अपने फक्कड़ मिजाज के लिए जाने जाते हैं. उनके करीबी लोग बताते हैं कि काफी अनुनय-विनय करने के बाद ही वह स्थानीय कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति देने के लिए तैयार होते थे.

भीष्म सहानी का व्यक्तित्व




जीवन परिचय 
बहुमुखी प्रतिभा के धनी भीष्म साहनी का जन्म रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुआ था। विभाजन के बाद वह भारत आ गए। बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में साहनी ने उनके भारत आने की परिस्थिति का उल्लेख किया था। उन्होंने बताया था कि वह स्वतंत्रता समारोह का जश्न देखने रावलपिंडी से सप्ताह भर के लिए दिल्ली आए थे। उनकी पंडित नेहरू को लाल किले पर झंडा फहराते और हिन्दुस्तान की आजादी का जश्न देखने की हसरत थी। लेकिन जब वह दिल्ली पहुंचे तो पता चला कि गांडियां बंद हो गईं और फिर उनका लौटना नामुमकिन हो गया।ष्म साहनी ने तमस के अलावा झरोखे, बसंती, मय्यादास की माडी, जैसे उपन्यासों और हानूश, माधवी, कबिरा खड़ा बाजार में जैसे चर्चित नाटकों की भी रचना की। भाग्यरेखा, निशाचर, मेरी प्रिय कहानियां उनके कहानी संग्रह हैं।

काश, मेरे मुल्क में भी शांति होती- मुजून अलमेलहन, यूएन की गुडविल अंबेसडर



            मुजून सीरिया के शहर डारा में पली-पढ़ीं। पापा स्कूल टीचर थे। उन्होंने अपने चारों बच्चों (दो बेटे और दो बेटियों) की पढ़ाई को सबसे ज्यादा तवज्जो दी। सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक देश में गृह युद्ध छिड़ गया। सरकार और कट्टर इस्लामी ताकतें एक-दूसरे पर हमले करने लगीं। देखते-देखते डारा शहर तबाही के कगार पर पहुंच गया। स्कूल और सरकारी इमारतों पर बम बरसने लगे। तमाम लोग मारे गए। हर पल खौफ में बीत रहा था। हजारों लोग घर छोड़कर चले गए। तब मजबूरन मुजून के परिवार ने सीरिया छोड़कर जाॅर्डन में शरण लेने का फैसला किया। यह वाकया फरवरी, 2013 का है।

मंगलवार, 27 जून 2017

नहीं पता था मेरी जिद सुर्खियों में छाएगी - प्रियंका भारती, सामाजिक कार्यकर्ता


           


  प्रियंका तब 14 साल की थीं। यह बात 2007 की है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली यह बच्ची उन दिनों पांचवी कक्षा में पढ़ रही थी। गांव की बाकी लड़कियों की तरह उसकी भी शादी हो गई। मां और सहेलियों का साथ छूटने के ख्याल से वह खूब रोईं। मां ने समझाया, क्यों चिंता करती हो? अभी तो बस शादी हो रही है, गौना पांच साल बाद होगा। तब तक तुम हमारे साथ ही रहोगी। मन को तसल्ली मिली। शादी के दिन सुंदर साड़ी और गहने मिले पहनने को। बहुत अच्छा लगा प्रियंका को। दो दिन के जश्न के बाद बारात वापस चली गई। प्रियंका खुश थीं कि ससुराल नहीं जाना पड़ा।

तुफानों का गजब मंजर नहीं है



सुशील यादव

122२  1222 १22
तुफानों का गजब मंजर नहीं है
इसीलिए खौफ में ये शहर नहीं है

तलाश आया हूँ मंजिलो के ठिकाने
कहीं मील का अजी पत्थर नहीं है

सोमवार, 26 जून 2017

चूड़ियाँ ईद कहती है


-रंगनाथ द्विवेदी

चूड़ियाँ ईद कहती है चले आओ----------

कि अब चूड़ियाँ ईद कहती है। भर लो बाँहो मे मुझे, क्योंकि बहुत दिन हो गया, किसी से कह नही सकती, कि तुम्हारी हमसे दूरियाँ---- अब ईद कहती है।

रविवार, 25 जून 2017

ईद मुबारक ~हामिद का तोहफा

                   




  पतिदेव को टूर पर जाना था | मैं सामान पैक  करने में जुटी थी और ये जनाब टी वी देखने में | मुझे लगता है दुनिया भर के  पुरुष इस मामले में एक से ही हैं  | कहीं जाना हो तो कुछ सामन भले ही छूट जाए पर खबर एक भी न छूटे | खाना - पीना,  ओढना -बिछाना जैसे सब कुछ खबरे  ही हैं | पर आज तो हद हो गयी समय भागता ही जा रहा रह और ये हैं की टीवी पर ही नज़रे गडाए बैठे हैं | सारी  दुनिया की ख़बरों का जिम्मा आप ने ही लिया है क्या ,"बडबडाते हुए मैं टी वी बंद करने आई | पर श्रीमान जी मेरे इरादों को भांप कर मुझे रोकते हुए बोले अरे , रुको , रुको , इतनी महत्वपूर्ण बहस चल रही है | मैं टी वी की तरफ देखा | कुछ बड़े नामी गिरामी पत्रकार धर्म के मुद्दे पर बहस कर रहे थे | यूँ तो उन सब के कुछ नाम थे पर मुझे दिख  रहे थे कुछ ... जो सिर्फ मुसलमान थे , कुछ ... जो सिर्फ हिन्दू थे | पूरा मुकम्मल इंसान तो कोई था ही नहीं | 

आग




लेखिका – स्मिता दात्ये
आग
“दीदी!”
हूँ ”
“तुमने आग देखी है?”
“क्या बात है छोटी अब तक सोई नहीीं? कैसी बातें कर रही है? सो जा”
“दीदी, आग बहुत जलाती है न? कैसा लगता होगा जलते समय?”
“छोटी, तेरी शादी हुए 28 साल होने को आए, पर है त अभी छोटी ही। इतने सालों में मैंने कितनी बार तुझे अपने घर बुलाया, रहने के लिए , पर तू कभी आई नहीीं। हमेशा महेशजी का बहाना करके बात टाल गई। इस बार तू ने खुद कहा की तुझे मुझसे मिलना है , मेरे घर रहने आना चाहती है। पता है मुझे कितनी खुशी हुई थी। तू ने कहा था की तू पूरा महीना भर रहना चाहती है। तुझे आए 7-8 दिन हुए हैं, पर त इतनी गुमसुम रहती है की क्या कह ूँ। कुछ बताती भी नहीीं। सच बता, क्या बात है?”
“कुछ नहीीं दीदी, मैं तो बस आग के बारे में सोच रही थी। क्या तुम्हें इस आग से भी भयंकर किसी ऐसी आग की जानकारी है, जो दिखाई नहीीं देती, पर तन-मन को जलाती है .. जलाती रहती है…?
“दीदी, तुम उठकर क्यों बैठ गई? दिन भर इतना काम करती रहती हो, थक जाती हो, रात को तो अच्छी नीींद मिलनी चाहिए । पर मेरे कारण तुम ठीक से सो भी नहीीं पा रही हो। ठीक है, अब मैं कुछ नहीीं कह ूँगी। तुम सो जाओ।“

फिर हुई मुलाकात


क्या वक्त आया है, रिटायर जिला-शिक्षा अधिकारी को अब टीचर नहीं पहचानता है ! मैडम लता शर्मा, ने ये मैडम माथुर को नहीं कहा,पर मन ही मन सोच रही है |’ जब वो कैमेस्ट्री की टीचर माथुर के पास अपनी पोती रश्मि को कोचिंग क्लास में पढ़ाने की बात करने के लिए आई थी |’
क्या आप अपने तीन ग्रुप मे से किसी एक में भी और, लड़की को नहीं पढ़ा सकती !ये तो बड़ी हैरानी की बात है|…आपसे इस जवाब की अपेक्षा कतई नहीं थी |’मैडम शर्मा ने लगभग निराश होते हुए कहा |
‘अब आपसे क्या कहूँ मैडम, ,टाइम होता तो आपको निराश नहीं करती | स्कूल से आने के बाद घर की, बच्चो की जिम्मेदारी, पूरी करने के बाद इन तीन ग्रुप को मुश्किल से पढ़ा पाती हूँ | मै पैसो के लिए नही बस आत्म संतुष्टि के अपने ज्ञान को बच्चियों में बाँट देती हूँ, वो पूर्ण मेहनत के साथ ऐसे में और, एक लड़की की जिम्मेदारी नहीं ले सकती |’ मैडम माथुर ने अपनी सफाई दे दी और चुप हो गयी |

क्षितिज

नेहा अग्रवाल
कहने को तो बहुत कुछ था आकाश के पास पर शायद धरा के पास ही वक्त की कमी थी।
आज तीन साल हो गये थे आकाश को पर धरा आज भी सबके सामने उसके प्यार का मजाक बना मुस्करा कर गुजर जाती हैं ।धरा रखती तो अपने कदम जमीन पर ही है पर आकाश को ऐसा लगता था ।
जैसे धरा का एक एक कदम उसके दिल की दहलीज को लहूलहान कर देता है।
आकाश की धुंधली आंखो मैं एक बार फिर तीन साल पुराने मंजर का साया लहरा गया था।

रितु गुलाटी की लघुकथाएं



दोष 
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रात के दस बज रहे थे।हम खाना खा कर टहलने निकले थे कि बाहर पडोस मे कुछ शोर सा सुना,देखा तो पुलिस टीम आयी हुई थी,….पूछने पर पता चला मिसिज शर्मा के किरायेदार ने दारू जरा जयादा ही चढा ली थी,..उसका बहकना मिसिज शर्मा को सहन नही हुआ।पहले खुद डांटा फिर भी दिल ढंडा ना हुआ तो शकित प्रर्दशन के चलते पुलिस टीम को बुलवा लिया था।पुलिस व किरायेदार मे नौकझौक चालू थी,तभी हम घूमने हेतू आगे बढ गये थे।आध पौन घंटे बाद घूमकर जब हम लौटै तो पुलिस जा चुकी थी।किरायेदार अपने कमरे के बाहर बैठा सहचरी संग बातो मे लगा था,,कह रहा था…..मै पुलिस से नही डरता….अपने घर मे मै कुछ भी करू।आज कुछ जयादा हो गयी तो कया हुआ???उसकी इन बातो को सुन हमने अंदाजा लगा लिया था कि पुलिस भी समझा बुझा कर लौट गयी थी।

भलमनसाहत





पूनम पाठक “पलक” इंदौर (म.प्र.)
मई की एक दोपहर और लखनऊ की उमस | भारी भीड़ के चलते वह बस में जैसे तैसे चढ़ तो गई परन्तु कहीं जगह न मिलने की वजह से बच्चे को गोदी में लिए चुपचाप एक सीट के सहारे खड़ी हो गयी | अत्यधिक गहमागहमी और गर्मी से बच्चे का बुरा हाल था | वो उसे चुप करने में तल्लीन थी कि,
“बहन जी आप यहाँ बैठ जाइये “ कहते हुए पास की सीट से एक व्यक्ति उठकर खड़ा हो गया |
“नहीं भाईसाहब आप बैठिये, मैं यहीं ठीक हूँ” विनम्रतापूर्वक निवेदन को अवीकर करते हुए उसने कहा |
“अरे आपके पास बच्चा है, आपको खड़े रहने में तकलीफ होगी, बैठ जाइये ना |” उन सज्जन के विशेष आग्रह पर वह सकुचाकर बैठ गई | सच ही तो था बच्चे को लेकर खड़े रहने में उसे वास्तव में बहुत परेशानी हो रही थी | वह बच्चे को पुचकारने लगी और पानी पिलाकर उसे चुप कराया |

क्यों ख़ास है ईद का चाँद



मुसलमानों का त्योहार ईद रमज़ान का चांद डूबने और ईद का चांद नज़र आने पर उसके अगले दिन चांद की पहली तारीख़ को मनाई जाती है। इसलामी साल में दो ईदों में से यह एक है (दूसरा ईद उल जुहा या बकरीद कहलाता है)। पहला ईद उल-फ़ितर पैगम्बर मुहम्मद ने सन 624 ईसवी में जंग-ए-बदर के बाद मनाया था।पर अक्सर हम देखते है की सरकारी छुट्टी की घोषणा तो पहले से हो जाती है पर अचानक खबर आती है की ईद का चाँद नहीं दिखा इसलिए कल ईद नहीं होगी | तो सवाल उठता है की ईद के चाँद में आखिर ऐसा क्या ख़ास है ?
             दरसल ईद-उल-फ़ितर हिजरी कैलंडर (हिजरी संवत) के दसवें महीने शव्वाल यानी शव्वाल उल-मुकरर्म की पहली तारीख को मनाई जाती है. अब समझने वाली बात यह भी है कि हिजरी कैलेण्डर की शुरुआत इस्लाम की एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना से मानी जाती है. वह घटना है हज़रत मुहम्मद द्वारा मक्का शहर से मदीना की ओर हिज्ऱत करने की यानी जब हज़रत मुहम्मद ने मक्का छोड़ कर मदीना के लिए कूच किया था.

शुक्रवार, 23 जून 2017

आलोक कुमार सातपुते की लघुकथाएं





1हिजड़ा 
वह दैहिक सम्बन्धों से अनभिज्ञ एक युवक था । उसके मित्रजन उसे इन सम्बन्धों से मिलने वाली स्वार्गिक आनन्द की अनुभूति का अतिशयोक्तिपूर्ण बखान करते। उसका पुरुषसुलभ अहम् जहाँ उसे धिक्कारता, वहीं उसके संस्कार उसे इस ग़लत काम को करने से रोकते थे । इस पर हमेशा उसके अहम् और संस्कारों में युद्ध होता था । एक बार अपने अहम् से प्रेरित हो वह एक कोठे पर जा पहुँचा। वहाँ पर वह अपनी मर्दांनगी सिद्ध करने ही वाला था कि, उसके संस्कारों ने उसे रोक लिया। चँूकि वह संस्कारी था, सो वह वापस आने के लिये उद्यत हो गया, इस पर उस कोठेवाली ने बुरा सा मँुह बनाया, और लगभग थूकने के भाव से बोली-साला हिजड़ा।
बाहर निकलने पर उसके मित्रों ने उससे उसका अनुभव पूछा, इस पर उसने सब कुछ सच-सच बता दिया। इस पर उसके मित्रों का भी वही कथन था-साला हिजड़ा।
...इतना होने पर भी वह आज संतुष्ट है, और सोचता है कि, वह हिजड़ा ही सही, है तो संस्कारी।

प्रतिशत


घर के सभी लोग तरह तरह से समझा रहे थे पर सलोनी की रुलाई थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। दादी अलग भगवान को कोसे जा रहीं थीं कि मेरी बच्ची ने तो कोई भी कसर नहीं रख छोड़ी थी। माघ पूस की कड़ाके की ठंड में भी बेचारी जल्दी जल्दी तैयार होकर सुबह 6 बजे की कोचिंग जाती फिर वापस आकर कालेज भागती थी। क्या जाता था मुरलीवाले का अगर अंगरेजी में भी उसके नंबर दूसरे विषयों की तरह अच्छे आ जाते तो। क्या कालेज के टीचर, कोचिंगवाले सर जी, घर तो घर पूरे मुहल्ले के लोग सलोनी की मेहनत, लगन देखकर दंग थे। सभी को उम्मीद थी कि अगर वह टाप नहीं कर सकी तो टाप टेन में जरूर आएगी। लेकिन अंगरेजी की बजह से 93 प्रतिशत पर अटक गई थी। सलोनी को यही डर खाये जा रहा था कि अब वह कैसे सब को फेस करेगी। पर सलोनी के पिता जी की चिंता अलग थी, उन्हें डर था कि कहीं उनकी बच्ची को सदमा न लग जाए। अचानक वे मोबाइल लिए सलोनी के पास आए और उसके कान से लगा दिया।
हैलो, सलोनी बधाई अच्छे नंबरों से पास होने की, पहचाना।

फटी चुन्नी






सीमा जो मात्र 14 साल की रही थी ,बैठ कर सील रही है अपनी इज्जत की चुन्नी को आशुओं की धागा और वेवसी की सुई से ।
कल ही लौटी है बुआ के घर से ।वहाँजाते वक्त सुरमयी सी कौमार्य को ओढ़ कर गयी थी ।पर आते वक्त सब कुछ बिखर गया था ।
बड़े मान से बुआ ने बुलाया था प्रसव के दिन नजदीक आ रहे थे ।बुआ फिर से माँ बनने बाली थी ,पहले से वह इक प्यारी सी तीन साल की बिटिया की माँ थी ।
वहाँ वह हँसती खिलखिलाती बुआ का सारा काम करती ,फूफा जी भी बात – बेबात उसे प्यार करते रहते ।
सीमा खुश हो जाती पिता तुल्य वात्सल्य से भरा प्यार।पर कभी कभी चौंक जाती पापा तो ऐसे प्यार नहीं करते ।ऐसे नहीं ‘छूते’, ।

सतीश राठी की लघुकथाएं








===माँ ===            - सतीश राठी


बच्चा , सुबह विधालय के लिए निकला और पढ़ाई के बाद खेल के पीरियड में ऐसा रमा कि दोपहर के तीन बज गए |
माँ डाँटेगी! डरता – डरता घर आया | माँ चौके में बैठी थी , उसके लिए खाना लेकर | देरी पर नाराजगी बताई , पर तुरंत थाली लगाकर भोजन कराया | भूखा बच्चा जब पेट भर भोजन कर तृप्त हो गया तो , माँ ने अपने लिए भी दो रोटी और सब्जी उसी थाली में लगा ली |
‘’ ये क्या माँ  ! तू भूखी थी अब तक ? ‘’
‘’ तो क्या  ! तेरे पहले ही खा लेती क्या  ? ‘’ तेरी राह तकती तो बैठी थी  | ‘’
अपराध बोध से ग्रस्त बच्चे ने पहली बार जाना कि माँ सबसे आखिर में ही  भोजन करती है |

नयी सोंच -कुमार गौरव की लघुकथाएं ( ई - बुक )




                                                       प्रस्तुत है कुमार  गौरव की लघुकथाओ की ई -बुक ,
 नयी सोंच 
 इसमें आप पढेंगे आठ  लघुकथाएं 

दूध - भात




जब दुआरी के कटहल पर कौए ने नीर बनाया तो धनेसरी खूब खुश हुई थी । अब तो बडका समदिया घर के पास ही आ गया । पीरितिया के बापू उहां आने का सोचेगा और कौआ इहां फटाक से उसको खबर कर देगा । केतना दिन हो गया मुंह देखे , पिरितया के जनम में भी नहीं आए थे खाली पैसा भेजवा दिए अब तो पिरितिया घुटन्ना भरने लगी है ।
रोज बरतन बासन के बहाने अंगना में मोरी के पास घंटों बैठी रहती । लेकिन निर्मोहिया एक्को बार भी कांव कांव नहीं करता उसकी तरफ देखकर ।

नारी सम्मान




मॉल में रामायण का मंचन चल रहा था । चलते चलते सीता की राह में एक बडा पत्थर आ गया तो राम ने आगे बढकर लात मारकर पत्थर को रास्ते से हटा दिया । पत्थर पैर लगते ही औरत के रूप में बदल गया । औरत ने अंगडाई ली , कमर सीधी किया और रास्ता छोडकर जंगल की तरफ चल दी ।
लक्ष्मण को बहुत गुस्सा आया वो चिल्लाकर बोले ” एहसानफरामोश औरत तुम श्रीराम के कारण जड से चेतन अवस्था में आई क्या तुम्हें इसके लिए धन्यवाद कहना उचित नहीं लगा । ”

भूख और कवि




नेताजी ने क्षेत्र में कवि सम्मेलन रखवाया ।
कवि को खबर करवाया शाम को कवि सम्मेलन है अपनी बेहतरीन कविता लेकर पहुँच जाना ।
कवि फूला न समाया । अपने सबसे नये कुरते पाजामें को कलफ किया । संदूक ने निकाला अपनी सहयोग के आधार पर छपी ताजातरीन काव्य संग्रह की प्रकाशक द्वारा दी गई एक मात्र प्रति को और झोले में रख छल दिया सम्मेलन को ।
पत्नी ने आवाज दी ” रोटी तो खालो । ”
कवि गुर्राये तुझे रोटी की पडी है वहाँ मेरा सम्मान होना है , मंत्री जी का कार्यक्रम है भूखे थोडे आने देंगे।
सम्मेलन शुरु हुआ कवि को मंच पर दुशाला ओढाकर सम्मानित किया गया । मंत्री जी कार्यक्रम छोडकर अपने गुर्गौं के साथ गेस्ट हाउस चले गये । कवि ने मंत्री जी की प्रशंसा और अपनी कविताओं के साथ मंच संभाल लिया ।

नयी सोंच





धर्मपरायण परिवार में नई बहू के आगमन के उपलक्ष्य में रामचरितमानस का पाठ एवं विद्वजनों द्वारा व्याख्यान रखा गया । सारा परिवार बाहर व्याख्यान सुन रहा था वहीं सुनसान पाकर किसी ने बहू को दबोच लिया । पलटकर जो देखा तो दूर के रिश्ते का देवर था । नजर मिलते ही उसने कुत्सित ढंग से आंख दबाई ” भौजाई में तो आधा हिस्सा होता ही है । ”
बाहर प्रसंग चल रहा था लक्ष्मण ने सूर्पनखा की नाक काट दी थी और सूर्पनखा विलाप करती हुई लौट रही थी ।
बहू ने जोर का धक्का दिया और पास पडी फांसुल उठाकर आधा हिस्सा मांगनेवाले उस पुरूष से उसका पुरा पुरूषत्व छिन लिया ।

सूखी रोटियाँ




चैनल के लिए कहानियों की खोज में कोशी के कछार भटकते भटकते एक बुढिया को देखा जो रोटियां सुखा सुखाकर घर के आंगन में बने एक बडे से मचान पर रख रही थी । उसने बुढिया से इसका कारण पूछा तो मुस्कुरा खर वापस अपने काम में लग गई । स्टोरी न बन पाने के अफसोस के साथ कुछ फोटोज खींचे और मन में सोचा कम से कम ब्लॉग पर जरूर लिखूंगा इस पगली बुढिया के बारे में ।
फिर वो शाम होते ही लौट आया जिला मुख्यालय के अपने होटल पर । अभी खाना खाकर सोने की कोशिश कर ही रहा था कि एडिटर का फोन आया ” नेपाल ने बराज के चौबीसो गेट खोल दिये हैं ,भयंकर तबाही मचाएगी कोशी , काम पर लग जाओ । ”

चालाक कबूतर




बहेलिये ने कबूतर पकड़ा तो कबूतर चिल्ला उठे ” हमें छोड़ दो , हमें भी जीने का अधिकार है संविधान में भी लिखा है शायद । ”
बहेलिया हँसा और पिंजरे में रखकर दरवाजा बंद करते हुए बोला ” अबे आज मंदिर निर्माण समिति की बैठक है रात के खाने में जाएगा तू । भगवान के काम में लग रहा जीवन तेरा , सीधा स्वर्ग जाएगा । ”

मोहसिन की बेवा




मोहसिन सेना की वर्दी पहने लद्दाख के ग्लेशियर में कहीं दब गया ।
सरकार उसे मरा हुआ नहीं मानती । वो ड्यूटी पर नहीं आता उसकी सैलरी नहीं जाती खाते में । मोहसिन की बेबा रोज एटीएम लेकर जाती है टेलर की दुकान पर । अफजल दोस्त था मोहसिन का , पिन मालूम है उसे । रोज चेक करता है और कुछ रूपये जेब से निकालकर उसके हाथ में रख देता है अभी इतना ही आया है कहकर ।
आज अफजल की बीबी ने पैसे को लेकर हंगामा कर दिया तो अफजल ने कह दिया पैसे नहीं हैं एटीएम में ।
चक्की पर आटा लिए सर झुकाए खड़ी है मोहसिन की बेबा । चक्कीवाला पिसाई मांग रहा है छह किलो का पंद्रह रूपया ।

सूखा





इलाके में लगातार तीसरे साल सूखा पडा है अब तो जमींदार के पास भी ब्याज पर देने के लिए रूपये नहीं रहे । जमींदार भी चिंतित है अगर बारिश न हुई तो रकम डूबनी तय है । अंतिम दांव समझकर जमींदार ने हरिद्वार से पंडित बुलवाकर बारिश हेतु हवन करवाया । दान दक्षिणा समेटते हुए पंडित ने टोटका बताया कोई गर्भवती स्त्री अगर नग्न होकर खेत में हल चलाये तो शर्तिया बारिश होगी ।
मुंशीजी को ऐसी स्त्री की तलाश का जिम्मा सौंपा गया । मुंशीजी ने गांव में घर घर घुमने के बदले सबको एकसाथ पंचायत बुलाकर समस्या और पंडित जी के द्वारा बताया निदान बताया और गुजारिश की सहयोग करने की ।

गुरुवार, 22 जून 2017

आरोप –प्रत्यारोप : बेवजह के विवादों में न खोये रिश्तों की खुशबू




कहते हैं जहाँ प्यार है वहां तकरार भी है | दोनों का चोली –दामन का साथ है | ऐसे में कोई अपना खफा हो जाए तो मन  का अशांत हो जाना स्वाभाविक ही है | वैसे तो रिश्तों में कई बार यह रूठना मनाना चलता रहता है | परन्तु कई बार आप का रिश्तेदार थोड़ी टेढ़ी खीर होता है | यहाँ  “ रूठा है तो मना  लेंगे “ कह कर आसानी से काम नहीं चलता |वो ज्यादा भावुक हो या   उसे गुस्सा ज्यादा आता है , जरा सी बात करते ही आरोप –प्रत्यारोप का लम्बा दौर चलता हो , जल्दी मानता ही नहीं हो तो फिर आप को उसको मनाने में पसीने तो जरूर छूट जाते होंगे | पर अगर रिश्ता कीमती है और आप उसे जरूर मानना चाहेंगे | पर सवाल खड़ा होता होगा ऐसे रिश्तेदार को मनाये तो मनाये कैसे | ऐसा  ही किस्सा रेशमा जी के साथ हुआ |

बुधवार, 21 जून 2017

चाँद सा चेहरा चाहिए तो करिए योग - शहनाज हुसैन





कौन नहीं चाहता चाँद सा सुन्दर चेहरा | पर आर्कषक त्वचा, काले चमकीले बाल तथा छरहरा बदन केवल मात्र स्वस्थ शरीर से ही प्राप्त किया जा सकता है। मैंने समग्र स्वास्थ्य आयुर्वेदिक सिद्धांतों को योग के माध्यम से ही प्रोत्साहित किया है। इस समग्र सौंदर्य की अनोखी अवधारणा को विश्वभर में सराहा गया।
मेरे विचार में वर्तमान आधुनिक जीवनशैली में समग्र स्वास्थ्य तथा सौंदर्य को प्राप्त करने के लिए योग बहुत प्रसांगिक है। वास्तव में योग मेरे व्यक्तिगत जीवन का अभिन्न अंग है और मैंने इसके कई लाभ प्राप्त किए हैं।
सुंदर त्वचा तथा चमकीले बालों के लिए प्राणायाम सबसे महत्वपूर्ण आसन है। इससे तनाव कम होता है तथा रक्त में ऑक्सीजन का संचार बढ़ता है और इससे रक्त-संचार में सुधार होता है। उत्थासन, उत्कावासन, शीर्षासन, हलासन तथा सूर्य नमस्कार आंतरिक तथा बाहरी सौंदर्य को निखारने में अहम भूमिका अदा करते हैं।
योगासन करने से व्यक्ति शारीरिक तथा मानसिक दोनों रूप से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है। योग से न केवल मांसपेशियों सु²ढ़ होती हैं, बल्कि शरीर में प्राणाशक्ति बढ़ती है तथा आंतरिक अंगों में ²ढ़ता आती है। साथ ही नाड़ी तंत्र को संतुलित बनाती है। योग मानसिक तनाव से मुक्ति प्रदान करता है तथा मानसिक एकाग्रता प्रदान करता है।

साडे नाल रहोगे ते योगा करोगे




अशोक परूथी
अपने दुनीचंद जी लोक-संपर्क विभाग में काम करतें हैं। ‘पब्लिसिटी’ में विश्वास रखते हैं। वे सरकारी मशीनरी का एक पुर्जा जो हैं। जब तक उनका एक आध फोटू या लेख कुछेक समाचार पत्रों में ना लग जाये तब तक उनके “आत्माराम” को संतुष्टि नहीं होती। कोई सरकारी मौका या दिवस हो या न हो, कम से कम ‘फोटू’ के साथ अख़बारों में उनके नाम से कुछ जरूर लिखा होना चाहिये। अपने दुनीचंद जी उस बहू की तरह हैं जो रोटी तो कम बेलती है लेकिन अपनी चूड़ियाँ खूब खनकाती है ताकि पतिदेव और सासू मां को पता लगता रहे कि बहू किचन में है तो घर का काम-काज ही कर रही होगी।
दुनीचंद जी इतने सनकी हैं कि अगर इनको अपने बारे में जनता को कुछ बताने का मौका न मिले तो इनको बदहजमी और पेट में गैस की शिकायत हो जाती है। इस समस्या से निवारण के लिये वे जंगलों की तरफ निकल पड़ते हैं फिर वहां चाहे बकरियां मिले या भेड़ें, उनके साथ अपना ‘फोटू’ खिचवाते हैं। है क्या, गडरिये का डंडा खुद पकड़ लेते हैं और उसे अपना कैमरा पकडवा देते हैं।

योग दिवस




डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
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स्वस्थ
यदि रहना है तो
जीवन में
योग अपनाओ
इसको जीवन अंग बना कर
रोगों को दूर भगाओ
स्वस्थ शरीर में
स्वस्थ मन का
जब निवास होगा
स्वस्थ विचारों
सद्कर्मों का
अजस्र प्रवाह बहेगा

योग--न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है




रंगनाथ द्विवेदी योग---------- न हमारे राम और न तुम्हारे रहीम का है। रुग्ण मन,रुग्ण काया किस काम का बोलो, शरीर,शरीर पहले है ये कहां-------- किसी हिन्दू या मुसलमान का है। योग----------

मंगलवार, 20 जून 2017

कहीं आपको फेसबुक का नशा तो नहीं ?




संजीत शुक्ला 
 (कानपुर )
                        ऍफ़ बी  या फेस बुक  विधाता कि बनाई दुनियाँ के अन्दर एक और दुनियाँ ......... जीती जागती सजीव ...कहते है कभी भारतीय ऋषि परशुराम ने विधाता कि सृष्टि के के अन्दर एक और सृष्टि बनाने कि कोशिश कि थी .... नारियल  के रूप में |उन्होंने आखें ,मुंह बना कर चेहरे का आकार दे दिया था ....... पर किसी कारण वश उस काम को रोक दिया | पर युगों बाद मार्क जुकरबर्ग ने उसे पूरा कर दिखाया फेस बुक या मुख पुस्तिका के रूप में | बस एक अँगुली का ईशारा और प्रोफाइल पिक के साथ  पूरी जीती –जागती दुनियाँ आपके सामने हाज़िर हो जाती है |भारत ,अमरीका ,इंगलैंड या पकिस्तान सब एक साथ एक ही जगह पर आ जाते हैं और वो जगह होती है आप के घर में आपका कंप्यूटर ,लैपटॉप या मोबाइल | कितना आश्चर्य जनक कितना सुखद | इंसान का अकेलापन दूर करने वाली ,लोगों को लोगों से जोड़ने वाली साइट इतनी लोकप्रिय होगी इसकी कल्पना तो शायद मार्क जुकरबर्ग ने भी नहीं कि थी | आज फेस बुक दुनियाँ कि सेकंड नम्बर कि विजिट की  जाने वाली साइट है |पहली गूगल है | इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि आज इसके लगभग एक बिलियन रजिस्टर्ड यूजर्स हैं | यानी कि दुनियाँ का हर सातवाँ आदमी ऍफ़ बी पर है ........... आप भी उन्हीं में से एक हैं ,हैं ना ? आज अगर आप किसी से मिलते हैं तो  औपचारिक बातों के बाद उसका पहला प्रश्न यही होता है “क्या आप ऍफ़ बी  पर हैं और अगर आप नहीं कहते हैं तो अगला आप को ऊपर से नीचे तक ऐसे देखता है “ जैसे आप सामान्य मनुष्य नहीं हैं बल्कि चिड़ियाघर से छूटे कोई जीव हों |

अस्तित्व - अनस्तित्व के सूक्ष्म रहस्य को खोलते योग के आठ सूत्र - योगा दि अल्फा एंड ओमेगा



पतजलि योग पर ओशो के १०० प्रवचन हैं| इस प्रवचनमाला का नाम है: योगा दि अल्फा एंड ओमेगा| इनके अतिरिक्त, एक और प्रवचनमाला है चेतना का सूर्य, जिसमें, ओशो ने आधुनिक युग को ध्यान में रखकर योग के नए आयामों की वैज्ञानिक चर्चा की है|प्रस्तुत लेख इस प्रवचनमाला से उद्धृत ओशो का एक संक्षिप्त संकलन है| पूरा पढ़ने के लिए यह पुस्तक ‘योग: नए आयाम’ उपलब्ध है|  योग विश्‍वासों का नहीं जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है|

“योग विज्ञान है”

ओशो 

योग का इस्लाम, हिंदू, जैन या ईसाई से कोई संबंध नहीं है। लेकिन चाहे जीसस, चाहे मोहम्मद, चाहे पतंजलि, चाहे बुद्ध, चाहे महावीर, कोई भी व्यक्ति जो सत्य को उपलब्ध हुआ है, बिना योग से गुजरे हुए उपलब्ध नहीं होता। योग के अतिरिक्त जीवन के परम सत्य तक पहुंचने का कोई उपाय नहीं है।
जिन्हें हम धर्म कहते हैं वे विश्वासों के साथी हैं। योग विश्वासों का नहीं है, जीवन सत्य की दिशा में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों की सूत्रवत प्रणाली है। इसलिए पहली बात मैं आपसे कहना चाहूंगा वह यह कि  योग विज्ञान है, विश्वास नहीं। योग की अनुभूति के लिए किसी तरह की श्रद्धा आवश्यक नहीं है। योग के प्रयोग के लिए किसी तरह के अंधेपन की कोई जरूरत नहीं है।
नास्तिक भी योग के प्रयोग में उसी तरह प्रवेश पा सकता है जैसे आस्तिक। योग नास्तिक-आस्तिक की भी चिंता नहीं करता है। विज्ञान आपकी धारणाओं पर निर्भर नहीं होता; विपरीत, विज्ञान के कारण आपको अपनी धारणाएं परिवर्तित करनी पड़ती हैं। कोई विज्ञान आपसे किसी प्रकार के बिलीफ, किसी तरह की मान्यता की अपेक्षा नहीं करता है। विज्ञान सिर्फ प्रयोग की, एक्सपेरिमेंट की अपेक्षा करता है।

प्रधानमंत्री के साथ योग करेंगे सी.एम.एस. के 5000 छात्र




 सिटी मोन्टेसरी स्कूल के पाँच हजार छात्र आगामी 21 जून को तृतीय अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के साथ योग करेंगे। यह जानकारी सी.एम.एस. के मुख्य जन-सम्पर्क अधिकारी श्री हरि ओम शर्मा ने दी है। श्री शर्मा ने बताया कि सी.एम.एस. छात्र आजकल बड़े जोर-शोर व उत्साह से योगाभ्यास में जुटे हैं। सी.एम.एस. के विभिन्न कैम्पसों में प्रतिदिन प्रातः विशेष योग शिविर का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें योग विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में
सी.एम.एस. छात्र योगाभ्यास कर रहे हैं।