शुक्रवार, 26 मई 2017

भूमिका के अनुसार ही हो चरित्र


'एक राजा के पास एक बहुरुपिया आया और उसने राजा से कहा कि वो रूप बदलने में इतना माहिर है कि कोई उसे पहचान ही नहीं सकता। राजा ने कहा कि चाहे तुम जितने रूप बदलो, मैं तुम्हें पहचान लूंगा।
राजा और बहुरुपिया के बीच शर्त लग गई। बहुरूपिया ने कहा कि आप जिस दिन मुझे नहीं पहचान पाएंगे, आप एक स्वर्ण मुद्रा मुझे इनाम में देंगे। 
राजा तैयार हो गया। बहुरूपिया रोज़ नए रूप में राजा के पास आता, राजा उसे पहचान लेता।
बहुरुपिया बहुत हैरान था कि चाहे जिस रूप में भी वो आए, राजा पहचान लेता। धीरे-धीरे बहुरुपिया ने राजा के पास आना बंद कर दिया।
कई दिन बीत गए।
एक दिन अचानक राज्य में खबर उड़ी कि पास के गांव में एक बहुत पहुंचे हुए महात्मा आए हैं। लंबी दाढ़ी, गेरूआ वस्त्र और माथे पर गज़ब का तेज़।
महात्मा की तारीफ सुन कर राजा का भी मन उनसे मिलने का हुआ। राजा महात्मा के पास पहुंचे। महात्मा के चेहरे पर सचमुच गज़ब का तेज़ था। राजा महात्मा से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें सोने की सिक्कों से भरी एक थैली भेंट की।
पर महात्मा ने उनसे वो थैली नहीं ली। महात्मा ने कहा कि ये सिक्के उनके किसी काम के नहीं।
राजा इस बात को सुन कर और प्रभावित हुआ। आखिर में वो उन्हें प्रणाम करके लौट आया। एक दिन महात्मा भी अचानक गांव छोड़ कर चले गए।
बात आई गई हो गई।
कुछ दिनों के बाद अचानक एक दिन बहुरूपिया फिर राजा के पास लौट आया। राजा ने बहुरुपिया को देखा तो पूछा कि तुम कहां चले गए थे भाई?
बहुरुपिया मुस्कुराने लगा। उसने कहा कि वो कहीं नहीं गया था। वो तो यहीं था।
राजा ने हैरानी से पूछा कि तुम कहां थे? किस भेष में थे? बहुरुपिया ने कहा कि गांव में जो महात्मा आए थे, वो मैं ही तो था। आपने मुझे पहचाना नहीं था। अब आप मुझे शर्त वाली एक स्वर्ण मुद्रा दीजिए।
राजा बहुत हैरान हुआ। राजा ने कहा कि वो तो मैं दे ही दूंगा लेकिन तुम ये बताओ कि मैं तो तु्म्हें महात्मा के रूप में सोने से भरी पूरी थैली दे रहा था, तब तुमने उसे नहीं लिया और अब एक मु्द्रा लेने चले आए हो, क्यों?
बहुरुपिया हंसा। उसने कहा कि महाराज, तब मैं महात्मा के भेष में था। अगर मैं स्वर्ण मुद्राओं से भरी आपकी उस थैली को ले लेता और फिर एक दिन गायब हो जाता तो आपका और लोगों का भरोसा साधु-महात्माओं से उठ जाता। आदमी जिस भूमिका में रहता है, उसे वैसे ही चरित्र का निर्वाह भी करना चाहिए। मैं साधु था तो साधु के चरित्र को जी रहा था। अब बहुरुपिया हूं तो अपना इनाम लेने आपके पास चला आया हूं।'
साधु की भूमिका में साधु सा चरित्र ही रखना चाहिए।

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