बुधवार, 31 मई 2017

प्रेम की ओवर डोज



प्रेम का सबसे सही प्रमाण विश्वास है

                  निधि की शादी को चार साल हो गए हैं वह पति के साथ नासिक में रहती है | |उसके पति उसे बहुत प्रेम करतें हैं | उसका दो साल का बेटा है | निधि के माता – पिता निधि की ख़ुशी देख कर बहुत खुश होते हैं | अक्सर बताते नहीं थकते उनके दामाद जी उन्की बेटी से कितना प्रेम करते हैं | जब भी निधि मायके आती है साथ – साथ आते हैं और उसे साथ ही वापस ले जाते हैं | जहाँ भी निधि जाना चाहती है अपना हर काम छोड़ कर उसके साथ जाते हैं | अगर कभी निधि को अकेले मायके आना पड़ता है तो दिन में ६ बार फोन कर के उसका हाल – चाल लेते हैं | ऐसी कौन सी पत्नी होगी जो अपने भाग्य पर न इतराए | किसके माँ – पिता ये सब देख कर गर्व न महसूस करते होंगे |लिहाजा निधि के माता –पिता भी हर आये – गए से उसके भाग्य की प्रशंसा करते | जब निधि भी उपस्तिथ होती तो हँस कर हां में समर्थन करती | धीरे – धीरे ये हँस कर किया गया समर्थन मुस्कुरा कर फिर मौन , फिर भावना रहित समर्थन में बदलने लगा | एक दिन उसकी माँ यूँ ही दामाद जी की तारीफ कर रहीं थी तो निधि फूट – फूट कर रोने लगी ,” बस करो माँ , बस करो , वो मुझे प्यार नहीं करते , मुझ पर शक करते हैं | इसी कारण एक पल भी मुझे अकेला नहीं छोड़ते | बार – बार फोन करके कहाँ हो क्या कर रही हो पूंछते रहते हैं | अब मैं थक गयी हूँ माँ , अब नहीं सहा जाता |

सोमवार, 29 मई 2017

अरे ! , चलेंगे नहीं तो जिंदगी कैसे चलेगी |


हजारों किलोमीटर की यात्रा  की शुरुआत बस एक कदम से होती है



मुहल्ले के अंकल जी वॉकर ले कर ८० की उम्र दोबारा चलना सीख रहे थे | अभी कुछ दिन पहले गिरने से उनके पैर की हड्डी टूट गयी थी | प्लास्टर खुलने  के बाद भी मांस पेशियाँ अकड गयी थी , जिन्होंने चलने तो क्या खड़े होने में मदद देने से इनकार कर दिया था | इक इंसान जो जिंदगी भर चलता हैं , भागता है दौड़ता है | किसी दुर्घटना के बाद डेढ़ – दो महीने में ही चलना भूल जाता है | एक – एक कदम अजनबी सा लगता है | हिम्मत जबाब दे जाती है | लगता है नहीं चला जाएगा | फिर एक अंत : प्रेरणा जागती है ,अरे ! , चलेंगे नहीं तो जिंदगी कैसे चलेगी |तब जरूरत  होती है अपनों के प्यार की , वाकर के सहारे की और द्रण इच्छा शक्ति की |  और शुरू हो जाती है कोशिश फिर से सीखने की |चल पड़ते हैं कदम |

रविवार, 28 मई 2017

कतरा कतरा पिघल रहा है


 साधना सिंह


कतरा कतरा पिघल रहा है  
दिल नही मेरा संभल रहा है  || 

हवा भी ऐसे सुलग रही है 
और ये सावन भी जल रहा है ||

कि एक तेरे जाने से देखो, 
कैसे सबकुछ बदल रहा है || 

शनिवार, 27 मई 2017

वो पहला खत







बचपन में एक गाना  अक्सर सुनते थे  "लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में हज़ारों रंग के सितारे बन गए " | गाना हमें बहुत पसंद था पर हमारा बाल मन सदा ये जानने की कोशिश करता ये खत सितारे कैसे  बन जाते हैं।. खैर बचपन गया हम बड़े हुए और अपनी सहेलियों को  बेसब्री मिश्रित ख़ुशी के साथ उनके पति के खत पढ़ते देख हमें जरा -जरा अंदाज़ा होने लगा कि खत सितारे ऐसे बनते हैं।  और हम भी एक अदद पति और एक अदद खत के सपने सजाने लगे।  खैर दिन बीते हमारी शादी हुई और शादी के तुरंत बाद हमें इम्तहान देने के लिए मायके   आना पड़ा।  हम बहुत खुश थे की अब पति हमें खत लिखेंगे और हम भी उन खुशनसीब सहेलियों की सूची में आ जाएंगे जिन के पास उनके पति के खत आते हैं।

स्त्री और नदी का स्वच्छन्द विचरण घातक और विनाशकारी






लेखक:- पंकज प्रखर
कोटा(राज.)

स्त्रीऔर नदी दोनों ही समाज में वन्दनीय है तब तक जब तक कि वो अपनी सीमा रेखाओं का उल्लंघन नही करती | स्त्री का व्यक्तित्व स्वच्छ निर्मल नदी की तरह है जिस प्रकार नदी का प्रवाह पवित्रऔर आनन्दकारकहोता है उसी प्रकार सीमा रेखा में बंधी नारी आदरणीय और वन्दनीय शक्ति के रूप में परिवार और समाज में  रहती है| लेकिन इतिहास साक्षी है की जब –जब भी नदियों ने अपनी सीमा रेखाओं का उल्लंघन किया है समाज बढ़े –बढे संकटों से जूझता नजर आया है| तथाकथित कुछ महिलाओं ने आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर जब से स्वच्छंद विचरणकरते हुए  सीमाओं का उल्लंघन करना शुरू किया है तब से महिलाओं की  स्थिति दयनीय और हेय होती चली गयी है |

स्मृति - पिता की अस्थियां ....





सुशील यादव


पिता ,
बस दो दिन पहले
आपकी चिता का
अग्नि-संस्कार कर
लौटा था घर ....
माँ की नजर में
खुद अपराधी होने का दंश
सालता रहा ...
पैने रस्म-रिवाजों का
आघात
जगह जगह ,बार बार
सम्हालता रहा ....

शुक्रवार, 26 मई 2017

भूमिका के अनुसार ही हो चरित्र


'एक राजा के पास एक बहुरुपिया आया और उसने राजा से कहा कि वो रूप बदलने में इतना माहिर है कि कोई उसे पहचान ही नहीं सकता। राजा ने कहा कि चाहे तुम जितने रूप बदलो, मैं तुम्हें पहचान लूंगा।
राजा और बहुरुपिया के बीच शर्त लग गई। बहुरूपिया ने कहा कि आप जिस दिन मुझे नहीं पहचान पाएंगे, आप एक स्वर्ण मुद्रा मुझे इनाम में देंगे। 
राजा तैयार हो गया। बहुरूपिया रोज़ नए रूप में राजा के पास आता, राजा उसे पहचान लेता।
बहुरुपिया बहुत हैरान था कि चाहे जिस रूप में भी वो आए, राजा पहचान लेता। धीरे-धीरे बहुरुपिया ने राजा के पास आना बंद कर दिया।
कई दिन बीत गए।
एक दिन अचानक राज्य में खबर उड़ी कि पास के गांव में एक बहुत पहुंचे हुए महात्मा आए हैं। लंबी दाढ़ी, गेरूआ वस्त्र और माथे पर गज़ब का तेज़।

गुरुवार, 25 मई 2017

ब्रेस्ट कैंसर - गुलाबी दिल नहीं जानकारी ही बचाव है







कल से जिस संख्या में नन्हे से गुलाबी दिल देखने को मिल रहे हैं उसके हिसाब से तो आज बहुत सारी  महिलाएं अस्पतालों में जा कर अपना चेकअप शुरू करा देंगी | पर अफ़सोस की ऐसा कुछ नहीं होगा | अव्वल तो बहुत से लोग इस प्रतीकात्मक कैम्पेन का मतलब ही नहीं समझ पाए | जो समझ भी गए उन्होंने इसे गंभीरता के स्थान पर हलके में ही लिया होगा | क्यों न हो ? जिस देश में महिलाएं अपनी छोटी – बड़ी हर तकलीफ को नज़रअंदाज करती है | जहाँ छोटे शहरों  गाँव देहात में शिक्षा की कमी है वहाँ प्रतीकत्मक प्रचार से कुछ नहीं होगा | जरूरत है इस गंभीर मुद्दे पर खुल कर बोलने की |
लाइलाज नहीं है स्तन कैंसर
कैंसर शब्द दिमाग में आते ही बात आती है की अब पीड़ादायक मृत्यु होगी और इसी कारण कैंसर होने के समाचार मात्र से ही रोगी को जीवन के प्रति निराशा हो जाती है। लेकिन स्तन या ब्रेस्ट कैंसर के क्षेत्र में एक अच्छी बात यह है कि  इसके ठीक होने की संभावना ज़्यादा होती है। स्तन कैंसर होने का पता साधारणतः पहले या दूसरे चरण में ही चल जाता है। इसलिए इसका इलाज सही समय पर हो पाता है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है हर किसी को इस बारे में सही जानकरी हो और वे सचेत हो। स्तन कैंसर से बचने का सबसे पहला कदम है जागरूकता। उसके बाद आता है इस रोग से बचने के उपाय। जीवनशैली में बदलाव और सचेतता ही आपको कष्टदायक स्तन कैंसर से बचा सकता है।

मंगलवार, 23 मई 2017

दो स्तन



ये महज कविता नही वरन रोंगटे खड़े करता एक भयावह यथार्थ है।

रंगनाथ द्विवेदी

कुछ भिड़ झुरमुट की तरफ देख, अचानक मै भी रुक गया-------- और जैसे ही मेरी नज़र उस झुरमुट पे पड़ी, उफ!मेरे रोंगटे खड़े हो गये, एक पैत्तीस साल की औरत का----------- विभत्स बलात्कार मेरे सामने था,

जब मोटिवेशन ,डीमोटिवेट करें – मुझे डिफेंसिव पेसिमिज्म से सफलता मिली



जो आशावादी  था उसने हवाई जहाज बनाया , जो डिफेंसिव पेसिमिस्ट था उसने पैराशूट बनाया | दोनों ही सफल हैं व् समाज के लिए जरूरी भी |

                     मैं मालविका वर्मा , मेडिकल फोर्थ इयर स्टूडेंट हूँ | आज जब मैं सफलता के नए अध्याय  लिख रही हूँ तो पीछे पलट कर देखने पर मुझे अपने वो तीन ड्राप ईयर’स और उनमें की गयी गलतियां याद आती हैं | जब मैं लगातार असफल हो रही थी | मेरा सपना डॉक्टर बनने का था और मैं  किसी भी प्रकार उसका इंट्रेंस क्लीयर करना चाहती थी | मैंने भी ठान ली थी चाहें कुछ भी हो जाए मुझे ये इंट्रेंस एग्जाम क्लीयर करना ही है | फिर भी मैं असफल हो रही थी | दरसल मेरी गलती मेहनत में नहीं मेरी स्ट्रेटजी में थी | जो की अपने मूल स्वाभाव को न समझ पाने के कारण हुई |
                            शुरू से ही मेरे घर में पढाई का बहुत अच्छा  वातावरण था  | मेरे पिता आई आई एम अहमदाबाद से गोल्ड मेडीलिस्ट व् माँ एक नामी स्कूल में प्रिंसिपल है | बचपन से ही मेरे ऊपर दवाब था |दो जीनियस लोगों की बेटी को अच्छा तो करना ही चाहिए | आखिर कार जींस जो मिले हैं |  और था भी सही | शुरू से ही मेरे माता – पिता ने मेरी पढाई का बहुत ध्यान रखा | माँ मुझे घर आने के बाद  नियम से पढ़ाई कराती  और पिताजी न सिर्फ मुझे एक से बढ़कर एक बुक्स मुहैया कराते बल्कि यूँ खेलते – खेलते न जाने कितनी जानका रियाँ दे देते | इस तरह से कह सकते हैं की बचपन से ही मेरा आई क्यू बहुत स्ट्रांग हो गया

रविवार, 21 मई 2017

समयरेखा






अंजू शर्मा  


"छह बजने में आधा घंटा बाक़ी है और अभी तक तुम तैयार नहीं हुई!  पिक्चर निकल जाएगी, जानेमन!!!"

मानव ने एकाएक पीछे से आकर मुझे बाँहों में भरते हुए ज़ोर से हिला दिया!  बचपन से उसकी आदत थी, मैं जब-जब क्षितिज को देखते हुए अपने ही ख्यालों में डूबी कहीं खो जाती, वह ऐसे ही मुझे अपनी दुनिया में लौटा लाता!  उसका मुझे 'जानेमन' कहना या बाँहों में भरकर मेरा गाल चूम लेना किसी के मन में भी भ्रम उत्पन्न कर सकता था कि वो मेरा प्रेमी है!  मेरी अपनी एक काल्पनिक दुनिया थी जिसमें खो जाने के लिए मैं हरपल बेताब रहती!  ढलते सूरज की सुनहरी किरणों में जब पेड़ों की परछाइयाँ लंबी होने लगती, शाम दबे पाँव उस प्रेमिका की तरह मेरी बालकनी के मनी-प्लांट्स को सहलाने लगती जो अपने प्रेमी की प्रतीक्षा करते हुए हर सजीव-निर्जीव शय को अपनी प्रतीक्षा में शामिल करना चाहती है!  ऐसी शामों के धुंधलकों में मुझे खो जाने देने से बचाने की कवायद में, तमाम बचकानी हरकतें करता, वह मेरे आँचल का एक सिरा थामे हुए ठीक मेरे पीछे रहता!  ऐसा नहीं था कि यह उसकी अनधिकार चेष्टा मात्र थी, कभी मैं भी उसकी हंसी में शामिल हो मुस्कुराती तो कभी कृत्रिम क्रोध दिखाते हुए उसकी पीठ पर धौल जमाते हुए ऐतराज़ जताती!

शनिवार, 20 मई 2017

बहू और बेटी



वो बेटी ही थी | और शादी के बाद बहू बन गयी |
सर पर पल्ला रखो ~ अब तुम बेटी नहीं बहू हो
• कुछ तो लिहाज करो , पिता सामान ही सही पर ससुर से बात मत करो ~ तुम बेटी नहीं बहू हो
• माँ ने सिखाया नहीं , पैताने बैठो ~ तुम बेटी नहीं बहू हो
• घर से बाहर अकेली मत निकलो ~ तुम बेटी नहीं बहू हो
• अपनी राय मत दो , जो बड़े कहे वही मानो ~ तुम बेटी नहीं बहू हो

शुक्रवार, 19 मई 2017

गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं ?




एक हिन्दू सन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा. वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे .
सन्यासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पुछा ;
” क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?’

शिष्य कुछ देर सोचते रहे ,एक ने उत्तर दिया, ” क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”
” पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है , जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं “, सन्यासी ने पुनः प्रश्न किया .

स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर – जब आप खाना खा रहे हो और खाना आपको



कई बार तब हम भोजन में अपनी समस्याओं का समाधान ढूँढने लगते हैं जब भावनाएं हमें  खा रही होती हैं – अज्ञात 


“देखिये आप बिंज ईटिंग डिसऑर्डर से बुलुमिया नेर्वोसा की तरफ बढ़ रही हैं अब अगर आप खाने से दूर नहीं रहीं तो ये खाना आपको खा जाएगा “कहते हुए डॉक्टर ने मुझे दवाइयों और देखभाल की लंबी – चौड़ी  फेहरिशत  पकड़ा | मैं निराशा से भरी डॉक्टर के केबिन से बाहर निकली | मुझे देख कर बाहर बैठी दो लडकियां मुस्कुरा दी | एक ने चुटकी ली ,” अगर ये अपना खाना कम कर दे तो देश की खाने की समस्या काफी हद तक खत्म हो जायेगी | उसके बाद हंसी के ठहाके  काफी देर तक मेरा पीछा करते रहे और मैं साडी के पल्लू से अपने भीमकाय शरीर को ढकने का असंभव  प्रयास करती रही | आप की जानकारी के लिए बता दूं की मेरी उम्र ३६ साल कद पांच फुट दो इंच और वजन पूरे ९० किलो | यानी 100 से बस १० कम | मेरा स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर का इलाज़ चल रहा है | क्योंकि मैं खाने से दूर नहीं रह पाती | अच्छा बुरा मैं कुछ भी खाती हूँ |यहाँ  तक की कुछ न मिलने पर मैं कच्चा आलू भी कहा लेती हूँ |  मैं तनाव में खाती हूँ और खाने की वजह से उपजे तनाव में और खाती हूँ | खाने  से मेरा ऐसा लगाव पहले नहीं था | माँ कहती हैं  ,” मैं बचपन में कुछ नहीं खाती थी , वो बुलाती रह जाती थीं और मैं खेल में इतनी मगन की सुनती ही नहीं | खाना ठंडा हो जाता तो एक दो कौर खा कर माँ अच्छा नहीं लग रहा है कह कर भाग जाती | कई बार माँ के डर लंच में दिया खाना सहेलियों को खिला देती या स्कूल के  डस्टबिन में फेंक आती , ताकि वो मुझे डांट न सके | फिर कब कैसे मैं इतना ज्यादा खाने लगी और खाना मुझे खाने लगा ? यादों के झरोखों से देखती हूँ तो वो दिन याद आता  है  जब रितेश से मेरी शादी हुई थी , न जाने कितने अरमान ले कर मैं इस घर में आई थी |

बुधवार, 17 मई 2017

प्रेम दगाबाज है -ओशो





तुम एक प्रेम में पड़ गए। तुमने एक स्त्री को चाहा, एक पुरुष को चाहा, खूब चाहा। जब भी तुम किसी को चाहते हो, तुम चाहते हो तुम्हारी चाह शाश्वत हो जाए। जिसे तुमने प्रेम किया वह प्रेम शाश्वत हो जाए। यह हो नहीं सकता। यह वस्तुओं का स्वभाव नहीं। तुम भटकोगे। तुम रोओगे। तुम तड़पोगे। तुमने अपने विषाद के बीज बो लिए। तुमने अपनी आकांक्षा में ही अपने जीवन में जहर डाल लिया।
यह टिकने वाला नहीं है। कुछ भी नहीं टिकता यहां। यहां सब बह जाता है। आया और गया। अब तुमने यह जो आकांक्षा की है कि शाश्वत हो जाए, सदा—सदा के लिए हो जाए; यह प्रेम जो हुआ, कभी न टूटे, अटूट हो; यह श्रृंखला बनी ही रहे, यह धार कभी क्षीण न हो, यह सरिता बहती ही रहे—बस, अब तुम अड़चन में पड़े। आकांक्षा शाश्वत की और प्रेम क्षणभंगुर का; अब बेचैनी होगी, अब संताप होगा। या तो प्रेम मर जाएगा या प्रेमी मरेगा। कुछ न कुछ होगा। कुछ न कुछ विध्‍न पड़ेगा। कुछ न कुछ बाधा आएगी।

बदलाव


नौकरी वाली बहू






लेखिका -राधा शर्मा ( मुंबई -महाराष्ट्र )
कल रास्ते में निधि मिली | निधि उम्र ३२ साल एक घरेलू महिला व् दो बच्चों की माँ है | सामान्य रूप से शिक्षित निधि जब १० साल पूर्व गाजे –बाजे के साथ ससुराल में आई थी तब अक्सर उसे अपने पिता द्वारा दहेज़ कम देने के ताने सुनने पड़ते थे | निधि सोचती कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा ,वह सबकी की सेवा से सबका दिल जीतने का प्रयास करती रही |पर जब दहेज़ के ताने बर्दाश्त से बाहर हो गए तो उसने छोटे बच्चो को ट्यूशन पढ़ना शुरू किया | अपने ममतामयी व्यवहार के कारण धीरे –धीरे कई बच्चे उससे ट्यूशन पढने आने लगे |निधि खुश रहने लगी पर उसका मन तब टूट गया जब उसने अपनी सास को पड़ोसन से कहते सुना “ बहू के पिता ने तो कुछ दिया नहीं,लड़का सेत में चला गया . पर अब ये कुछ कमाने लगी है ,चलो हम यही मान लेंगे यही दहेज़ है |
हमारे समाज का कोढ़ दहेज़ न जाने कितनी लड़कियों को लील चुका है | कहीं न कहीं लड़की जन्म के समय निम्न और माध्यम वर्गीय माता –पिता के माथे पर आई चिंता की लकीरों का कारण भी यही है कि उन्हें लगता है “ बेटी हो गयी अब तो उन्हें जोड़ना ही जोड़ना है उसके लिए |

मर -मर कर जीने से अच्छा है जी कर मरें



एक बगीचे में एक छोटा सा फूल—घास का फूल—दीवाल की ओट में ईटों में दबा हुआ जीता था। तूफान आते थे, उस पर चोट नहीं हो पाती थी, ईटों की आड़ थी। सूरज निकलता था, उस फूल को नहीं सता पाता था, उस पर ईटों की आड़ थी। बरसा होती थी, बरसा उसे गिरा नहीं पाती थी, क्योंकि वह जमीन पर पहले ही से लगा हुआ था। पास में ही उसके गुलाब के फूल थे।
एक रात उस घास के फूल ने परमात्मा से प्रार्थना की कि मैं कब तक घास का फूल बना रहूंगा। अगर तेरी जरा भी मुझ पर कृपा है तो मुझे गुलाब का फूल बना दे। 

मंगलवार, 16 मई 2017

टर्मिनली इल - कुछ लम्हे जो मिले हैं उस पार जाने वाले के साथ






प्रेम वो नहीं है जो आप कहते हैं प्रेम वह है जो आप करते हैं

                      इस विषय को पढना आपके लिए जितना मुश्किल है उस पर लिखना मेरे लिये उससे कहीं अधिक मुश्किल है | पर सुधा के जीवन की त्रासदी  ने मुझे इस विषय पर लिखने पर विवश किया | 

             सुधा , ३२ वर्ष की विधवा | जिस   के   जीवन का अमृत सूख गया है | वही कमरा था , वही बिस्तर था ,वही अधखाई दवाई की शीशियाँ , नहीं है  तो सुरेश | १० दिन पहले जीवनसाथी को खो चुकी सुधा की आँखें भले ही पथरा गयी हों | पर अचानक से वो चीख पड़ती है | इतनी जोर से की शायद सुरेश  सुन ले व्  लौट आये | अपनी सुधा के आँसूं पोछने और कहने की “ चिंता क्यों करती हैं पगली | मैं हूँ न | सुधा जानती है की ऐसा कुछ नहीं होगा | फिर भी वो सुरेश के संकेत तलाशती है , सपनों में सुरेश को तलाशती हैं , अगले जन्म का सोंच , किसी नन्हे शिशु में  सुरेश को तलाशती है | उसे विश्वास है , सुरेश लौटेगा | यह विश्वास उसे इतनी दर्द व् तकलीफ के बाद भी  जिन्दा रखता है | मृत्यु की ये गाज उस पर १० दिन पहले नहीं गिरी थी |  दो महीने पहले यह उस दिन गिरी थी जब डॉक्टर ने सुरेश के मामूली सिरदर्द को कैंसर की आखिरी स्टेज बताया था | और बताया था की महीने भर से ज्यादा  की आयु शेष नहीं है | बिज़ली सी दौड़ गयी थी उसके शरीर में | ऐसा कैसे ? पहली , दूसरी , तीसरी कोई स्टेज नहीं , सीधे चौथी  ... ये सच नहीं हो सकता | ये झूठ है | रिपोर्ट गलत होगी | डॉक्टर समझ नहीं पाए | मामूली बिमारी को इतना बड़ा बता दिया | अगले चार दिन में १० डॉक्टर  से कंसल्ट किया | परिणाम वही | सुरेश तो एकदम मौन हो गए थे | आंसुओं पोंछ कर सुधा ने ही हिम्मत करी | मंदिर के आगे दीपक जला दिया और विश्वास किया की ईश्वर  रक्षा करेंगे चमत्कार होगा , अवश्य होगा |
सुधा , स्तिथि की जटिलता समझ तो रही थी पर मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रही थी

सोमवार, 15 मई 2017

परमात्मा और उसके सेवक कभी भी छुट्टी नहीं लेते हैं!






- डा0 जगदीश गाँधी, संस्थापक-प्रबन्धक
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) परमात्मा तथा उसके सेवक छुट्टी कर लें तो संसार तथा ब्रह्ममाण्ड में हाहाकार मच जाये:- 
            परमात्मा ने जब से यह सृष्टि बनायी तभी से अपने सेवकों सूर्य, वायु, चन्द्रमा, ग्रह, पर्यावरण, प्रकृति आदि को अपने द्वारा रचित मानव जाति की सेवा के लिए नियुक्त किया। सृष्टि का गतिचक्र एक सुनियोजित विधि व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। ब्रह्ममाण्ड में अवस्थित विभिन्न नीहारिकाएं ग्रह-नक्षत्रादि परस्पर सहकार-संतुलन के सहारे निरन्तर परिभ्रमण विचरण करते रहते हैं। अपना भू-लोक सौर मंडल के वृहत परिवार का एक सदस्य है। सारे परिजन एक सूत्र में आबद्ध हैं। वे अपनी-अपनी कक्षाओं में घूमते तथा सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सूर्य स्वयं अपने परिवार के ग्रह उपग्रह के साथ महासूर्य की परिक्रमा करता है। इतने सब कुछ जटिल क्रम होते हुए भी सौर, ग्रह, नक्षत्र एक दूसरे के साथ न केवल बंधे हुए हैं वरन् परस्पर अति महत्वपूर्ण आदान-प्रदान भी करते हैं। इस सृष्टि का रचनाकार परमात्मा कभी अवकाश नहीं लेता है तथा उसके सेवक सूर्य अपनी किरणों

माँ की माला






नेहा नाहटा,जैन
दिल्ली


माला फेरकर जैसी ही प्रेरणा ने आँखे खोली,सामने खड़ी बेटी और पतिदेव ठहाके मारने लगे
मान्या तो पेट पकड़ पकड़ कर हंसी से दोहरी हुयी जा रही थी ।
प्रेरणा आँखे फाडे अचंभे से उन्हें देखते हुए बोली,"अरे क्या हुआ,ऐसे क्यों हँस् रहे हो तुम दोनों "
पर दोनों की हंसी तो रुकने का नाम ही नही ले रही थी।
प्रेरणा ने निखिल का मुँह अपने हाथ से टाइट दबाकर उनकी हंसी रोकते हुए बेटी से पूछा,
" बाबू प्लीज़ बताना ,क्या हुआ ऐसा,जो तुम हँस रहे हो,
क्या मेरे चेहरे पर कुछ लगा हुआ है ।"

रविवार, 14 मई 2017

मातृ दिवस पर- एक माँ के अपने बच्चों ( बेटे और बेटी ) के नाम पत्र





                                      आज इन दो पत्रों को पढ़ते हुए फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम का एक डायलाग याद आ गया | पिता भले ही अपने स्नेह को व्यक्त करे न करे  बच्चों के साथ खुल कर बात करे न करें पर माँ कहती रहती है , कहती  रहती है , भले ही बच्चा सुने न सुने | पर ये कहना सिर्फ कहना नहीं होता इसमें माँ का स्नेह होता है आशीर्वाद होता है और विभिन्न परिस्तिथियों में अपने बच्चे को समन्वय करा सकने की कला का उपदेश भी | पर जब बच्चे दूर चले जाते हैं तब भी फोन कॉल्स या पत्र के माद्यम से माँ अपने बच्चे का संरक्षण करती रहती है | वैसे तो आजकल लड़का , लड़की की परवरिश में में कोई भेद नहीं पर एक माँ ही जानती है की दोनों को थोड़ी सी शिक्षा अलग - अलग देनी है | जहाँ बेटी को पराये घर में रमने के गुर सिखाने हैं वहीँ बेटे के मन में स्त्रियों के प्रति सम्मान की भावना भरनी है | ऐसे ही एक माँ ( डॉ >  भारती वर्मा ) के अपने बच्चों ( बेटे व् बेटी ) के लिए लिए गए भाव भरे खत हम अपने पाठकों के लिए लाये है | ये खत भले ही ही निजी हों पर उसमें दी गयी शिक्षा हर बच्चे के लिए है | पढ़िए और लाभ उठाइये .........

मदर्स डे : माँ और बेटी को पत्र


मेरी प्यारी बेटी
कैसी हो?कितने दिन हो गए तुम्हें अपने गले से लगाए हुए। कहाँ तो एक दिन भी तुम्हें याद किए बिना बीतता नहीं था मेरा। पर अब कितनी विवश हूँ मैं। याद रोज़ करती हूँ, रोज़ अपनी अश्रुपूर्ण आँखों से तुम्हारे पापा के साथ उन रूपों के बीच निहारती हूँ तुम्हें, जिनमेँ जब-तब हमें याद कर आँसू बहाते हुए ढूँढती हो तुम। पर मैं तुम्हारे आँसू पोंछ नहीं सकती, तुम्हें सांत्वना नहीं दे दे सकती, तुम्हें अपनी छाती से लगा कर चुप नहीं करा सकती, क्योंकि अब मैं तुम्हारे पापा के साथ उस संसार में हूँ जहाँ से , लोग कहते हैं कोई लौट कर नहीं आता। बस दूर से अपनों को देख सकता है। अब यही हमारे बस में है बेटी

मदर्स डे : कौन है बेहतर माँ या मॉम





कहते है हर चीज परिवर्तनशील है समय बदलता है तो सब कुछ बदल जाता है | पर सृष्टि का पहला रिश्ता माँ और संतानं का आज भी यथावत है………. आज भी माँ का अपनी संतान के प्रति वही स्नेह है वही कोमल भावनाएं हैं |फिर भी समय के साथ माँ की सोंच में उसके दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ है | अगर एक एक पीढ़ी पहले तक कि माँ की बात करे तो माँ की धुरी केवल बच्चे हुआ करते थे | उसका पूरा समय बच्चो में जाया करता था |उसके ईतर वो अपने लिए कुछ भी नहीं सोचती थी |बच्चे बड़े होते थे …. अपने अपने घर बसाते थे और माँ एकाकी महसूस करती थी,अपने को छला हुआ महसूस करती थी | वहीं आज माओं में परिवर्तन आया है |माँ और बच्चे का ममता का रिश्ता यथावत है पर वो अपने बारे में भी सोंचती है ,कुछ समय अपने लिए भी निकालती है,उसके कुछ शौक हैं जिन्हें वो पूरा करना चाहती है कुछ सपने है जिन्हें वो पाना चाहती है ऐसे में कई बार वो अपने बच्चो को उतना समय नहीं दे पाती जितना वो चाहते हैं ,पर जीवन के विविध पहलुओ पर राय ज्यादा बेहतर दे पाती है |तो फिर बेहतर कौन है “माँ या मॉम “अटूट बंधन टीम नें इस विषय पर विचार आमंत्रित किये …… यह एक बहुत रोचक प्रयोग रहा हर आयु वर्ग के लोगों ने बढ़ –चढ़ कर हिस्सा लिया | उनमें से कुछ के विचार हम यहाँ आप सब के लिए लाये हैं |

मदर्स डे : पांच लघुकथाएं



दिल का दर्द 
मंगलवार को हरिद्धार जाना हुआ और अभी तक मन वही अटका है ! वो बूढ़ी सी आँखे अभी भी दिख रही सवाल भरी |
गंगा स्नान के वक्त वो वहा बेठी थी ! कुछ पोलोथिन लेकर , आते जाते गीले कपड़ो को रखने के लिए कोई ले ले तो |
कमजोर और बुजुर्ग इतनी तेज धूप | मासूम सी चेहरे की चमक बता रही थी की काफी अच्छी ज़िन्दगी जी होगी उन्होंने | तभी आते जाते कोई कुछ देता तो आँखे झुका लेती थी कोई पहचान ना ले शायद |
जब में गयी तो बहुत अभिमान से — लेकिन उनसे मिल कर बहुत बेबस सा महसूस किया | मैंने कुछ बिस्किट के पैकेट दिए — और कुछ कपडे जो देने के लिए ले गयी थी उसमे से एक। साड़ी मैंने उन्हें दी | आँखे छलछला गयी उनकी और बोली बेटा ये साड़ी उस कोने में बेठी लड़की को दे दो | इस फटी साड़ी में ठीक हु पर आते जाते लोग उसको नहीं उसके जिस्म को घूरते है तो रोना आता है | उस लड़की को देख मन परेशान हुआ ! अम्मा। क्या वो आपकी ? पैदा नहीं किया मैंने — मुझे मेरे बुढ़ापे का बोझ समझ और उसको अपाहिज समझ छोड़ गए यहाँ हमारे अपने ! जब तक मेरी साँस है में उसको सम्भालूंगी बाद में ये गंगा मैया ||
आह्ह्ह्ह समझ नहीं पायी क्या करू ! अपने कपडे उस लड़की को पहनाए तो बोली ऐ जीजी ये पेट भरता क्यों नहीं | उसने मुझे ऐसी ज़िन्दगी दी तो पेट क्यों दे दिया | भारी मन से कुछ खाना दिलाया खा कर संतोष से बोली अब कब आओगी ||
चली आई – मन वही |

मदर्स डे : माँ को समर्पित सात स्त्री स्वर

                              



  वो माँ भी है और बेटी भी |इस अनमोल रिश्ते में अनमोल प्रेम तो है ही पर जहाँ एक और उसके ह्रदय में अपनी माँ के प्रति कृतज्ञता का भाव है वहीँ अपने बच्चों के प्रति कर्तव्य  का बोध | कैसे संभाल पाती है एक सती स्नेह के इन दो सागरों को एक साथ | तभी तो छलक जाती हैं बार बार आँखें , और लोग कहतें हैं की औरतें रोती बहुत हैं | आज मदर्स डे के अवसर पर हम लाये हैं एक साथ सात स्त्री स्वर , देखिये कहीं आप की आँखें भी न छलक पड़ें | इसमें आप पढेंगें वंदना गुप्ता , संगीता सिंह " भावना ", डॉ . किरण मिश्रा , आभा खरे , सरस दरबारी , डॉ . रमा द्विवेदी और अलका रानी की कवितायें 

दरवाजे के पार माँ - मुंशी प्रेमचंद्र (लघु कथा )





सूरज क्षितिज की गोद से निकला, बच्चा पालने से-वही स्निग्धता, वही लाली, वही खुमार, वही रोशनी। मैं बरामदे में बैठा था। बच्चे ने दरवाजे से झांका। मैंने मुस्कुराकर पुकारा। वह मेरी गोद में आकर बैठ गया। उसकी शरारतें शुरू हो गईं। कभी कलम पर हाथ बढ़ाया, कभी कागज पर। मैंने गोद से उतार दिया। वह मेज का पाया पकड़े खड़ा रहा। घर में न गया। दरवाजा खुला हुआ था।

मदर्स डे : माँ को समर्पित कुछ भाव पुष्प ~रंगनाथ द्विवेदी



जहाँ एक तरफ माँ का प्यार अनमोल है वही हर संतान अपनी माँ के प्रति भावनाओं का समुद्र सीने में छुपाये रखती है | हमने एक आदत सी बना रखी है " माँ से कुछ न कहने की " खासकर पुरुष एक उम्र के बाद " माँ मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ " कह ही नहीं पाते | मदर्स डे उन भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर देता है | इसी अवसर का लाभ उठाते हुए रंगनाथ द्विवेदी जी ने माँ के प्रति कुछ भाव पुष्प अर्पित किये हैं | जिनकी सुगंध हर माँ और बच्चे को सुवासित कर देगी |




माँ की दुआ आती है मै घंटो बतियाता हूं माँ की कब्र से, मुझे एैसा लगता है कि जैसे------- इस कब्र से भी मेरी माँ की दुआ आती है। नही करती मेरी सरिके हयात भी ये यकिने मोहब्बत, कि इस बेटे से मोहब्बत के लिये,

शनिवार, 13 मई 2017

मदर्स डे पर विशेष- प्रिय बेटे सौरभ


एक माँ का पत्र बेटे के नाम
              प्रिय बेटे सौरभ ,
                             आज तुम पूरे एक साल के हो गए | मन भावुक है याद आता है आज ही का दिन जब ईश्वर ने तुम्हे मेरी गोद में डाला था तब मैं तो जैसे पूर्ण हो गयी थी | जिसे पूरे नौ महीने अपने अन्दर छुपा कर रखा , पल –पल जिसका इंतज़ार किया उसे देखना छूना कितना सुखद है | हाँ  महसूस तो मैं तुम्हे पहले से ही कर रही थी अपने गर्भ  के अन्दर | जब लगता था किसी कली  को अपने अन्दर कैद कर लिया है | जो पल –पल खिल रही है | मेरी जिंदगी अब तुम्हारे चारों और घूमती है , सुबह से रात तक | जानती हो तुम्हारी नानी हँसती  हैं , कहती है ,” ये कल की बिटिया मम्मी बनते ही बदल गयी | और क्यों न बदलूँ  , तुम हो ही इतने प्यारे | जब तुम खेलते –खेलते आकर मुझे देख जाते हो , मुझे देखते ही किसी की गोदी से उतर कर मेरे पास आने की जिद करते हो या मुझे किसी दूसरे बच्चे को गोद में उठाता हुआ देखकर रोने लगते हो , तो अपने वजूद पर अभिमान हो उठता है | मेरे नन्हे से फ़रिश्ते ईश्वर तुम्हे खूब लंबी  आयु  व् जीवन की हर ख़ुशी दें | अले ले ले ... का तुमने तो रोना शुरू कर दिया ... अब पत्र लिखना बंद , मेरा बेटू  बुलाएगा तो मम्मी सबसे पहले उसके पास जायेगी |

तुलना


महत्व


अवतारों तथा महापुरूषों के कष्टमय जीवन हमें प्रभु की राह में सब प्रकार के कष्ट सहने की सीख देते हैं!




- डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) जब-जब राम ने जन्म लिया तब-तब पाया वनवास:-
राम ने बचपन में ही प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया और उन्होंने अपने शरीर के पिता राजा दशरथ के वचन को निभाने के लिए हँसते हुए 14 वर्षो तक वनवास का दुःख झेला। लंका के राजा रावण ने अपने अमर्यादित व्यवहार से धरती पर आतंक फैला रखा था। राम ने रावण को मारकर धरती पर मर्यादाओं से भरे ईश्वरीय समाज की स्थापना की। कृष्ण के जन्म के पहले ही उनके मामा कंस ने उनके माता-पिता को जेल में डाल दिया था। राजा कंस ने उनके सात भाईयों को पैदा होते ही मार दिया। कंस के घोर अन्याय का कृष्ण को बचपन से ही सामना करना पड़ा। कृष्ण ने बचपन में ही ईश्वर की इच्व्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया और उनमें अपार ईश्वरीय ज्ञान व ईश्वरीय शक्ति आ गई और उन्होंने बाल्यावस्था में ही कंस का अंत किया। इसके साथ ही उन्होंने कौरवों के अन्याय को खत्म करके धरती पर न्याय की स्थापना के लिए महाभारत के युद्ध की रचना की। बचपन से लेकर ही कृष्ण का सारा जीवन संघर्षमय रहा किन्तु धरती और आकाश की कोई भी शक्ति उन्हें प्रभु के कार्य के रूप में धरती पर न्याय आधारित साम्राज्य स्थापित करने से नहीं रोक सकी।

सतीश राठी की लघुकथाएं










         


===माँ ===  

बच्चा , सुबह विधालय के लिए निकला और पढ़ाई के बाद खेल के पीरियड में ऐसा रमा कि दोपहर के तीन बज गए |
माँ डाँटेगी! डरता – डरता घर आया | माँ चौके में बैठी थी , उसके लिए खाना लेकर | देरी पर नाराजगी बताई , पर तुरंत थाली लगाकर भोजन कराया | भूखा बच्चा जब पेट भर भोजन कर तृप्त हो गया तो , माँ ने अपने लिए भी दो रोटी और सब्जी उसी थाली में लगा ली |
‘’ ये क्या माँ  ! तू भूखी थी अब तक ? ‘’
‘’ तो क्या  ! तेरे पहले ही खा लेती क्या  ? ‘’ तेरी राह तकती तो बैठी थी  | ‘’
अपराध बोध से ग्रस्त बच्चे ने पहली बार जाना कि माँ सबसे आखिर में ही  भोजन करती है |





शुक्रवार, 12 मई 2017

फॉरगिवनेस : जब मैंने अपने माता - पिता को माफ़ किया


          
क्षमा करना किसी कैदी को आज़ाद करना है , और ये समझना है की वो कैदी आप खुद हैं – लुईस .बी . सेमेडेस
                  मदर्स डे आने वाला है | ठीक एक महीने बाद फादर्स डे है | गर्मी की छुट्टियों में आने वाले ये दिन बच्चों , खासकर छोटे बच्चों के लिए बहुत स्पेशल होते है | बच्चे अपने पेरेंट्स के लिए गिफ्ट्स , ग्रीटिंग कार्ड्स वैगैरह बड़े जतन  से बनाते हैं | और क्यों न करें जब पेरेंट्स होते ही इतने स्पेशल हैं | सोशल मीडिया हो , प्रिंट मीडिया हो , या आम महफ़िल हर तरफ माता – पिता के त्याग और निस्वार्थ प्रेम की बात हो रही है | फिर भारतीय संस्कृति में तो माता पिता का दर्जा भगवान् से भी ऊँचा है | ऐसे में मेरे लेख  का शीर्षक पढ़ कर आप जरूर सकते में आ गए होंगे | हो सकता है आप मुझे किसी दुष्ट बच्चे की  उपाधि से भी नवाज़ दें | कैसा बच्चा है अहसान फरमोश जो माता – पिता को माफ़ करने की बात कह रहा है | क्या जमाना आ गया है बच्चे संस्कार हीन हो गए हैं | आप के इन आरोपों के बीच में  मुझे याद आ रही है सात साल की छोटी सी बच्ची जिसकी माँ ने पिता से झगडे के बाद फिनायल की पूरी बोतल पी ली थी | माँ हॉस्पिटल में आई सी यू में ऑक्सीजन मास्क लगाए अपनी साँसों के लिए संघर्ष कर रही थी और मैं अपने एक साल के छोटे भाई को गोद में लिए बाहर से टुकुर – टुकुर ताक  रही थी | मुझे पहली बार अहसास हो रहा था , माँ इतना पास हो कर भी मुझसे इतना दूर हैं | मेडिकल स्टाफ मुझे माँ के पास जाने से रोक रहा है | मैं उन्हें छटपटाते हुए देख सकती थी  पर  मैं उन्हें गले से नहीं लग सकती | मैं दूसरी तरफ देखती हूँ वहां पिताजी किसी पुलिस वाले से बात कर रहे हैं , वो उन्हें पैसे दे रहे हैं | शायद मामला रफा – दफा करने के लिए | (तब तो नहीं समझी थी पर आज समझती हूँ ) मेरी गोद में मेरा भाई रो रहा है | मैं उसे चुप करा रही हूँ , वो सुसु कर देता है मैं उसके कपडे बदलती हूँ | माँ से जिस भाई को गोद लेने पर मैं झगड़ती थी की उसे उतारों मुझे लो , आज मैं उसी भाई की माँ बन गयी हूँ | नन्ही सी माँ | तभी पिताजी मेरी तरफ आते हैं | मेरी गोद से भाई को छीनते हैं और मेरी बांह पकड़ कर घसीटते हैं चालों घर चलो ये इतना रो रहा है अस्पताल की शांति भंग कर रहा है | मैं जाने से इनकार करती हूँ | पिताजी मुझे घसीटते हैं | मैं माँ – माँ चिल्लाती हूँ | पिताजी मुझे एक थप्पड़ मारते हैं ,” मत कर माँ – माँ , बहुत घटिया औरत है तेरी माँ , मरने चल दी , अरे मेरी नौकरी चली जाती.... सुसाइड करेंगी , नीच औरत | पिताजी अनवरत माँ को गालियाँ दिए जारहे हैं | इस बीच मैं पीछे मुड – मुड़ कर माँ को ढूंढती हूँ | मैं  फिर माँ चिल्लाती हूँ | पिताजी मेरे बाल नोचते हैं ,” नाम न ले उस घटिया औरत का | पर माँ को ऐसी हालत में अस्पताल में अकेले छोड़ कर जाना मुझे गंवारा नहीं है मैं अनवरत रो रही हूँ व् मार खाते हुए भी फिर – फिर पिताजी की बांह पकड कर कहीं रहीं हूँ ,” पिताजी माँ कब लौटेंगी | जितनी बार मैं माँ शाद कहती हूँ उतनी बार पिताजी मुझे मारते हैं | अपनी माँ को मरणासन्न हालत में छोड़ कर पिताजी से अनवरत माँ के लिए अपशब्द सुनने को विवश हूँ |

बुधवार, 10 मई 2017

जोरबा टू बुद्ध : ओशो




ओशो कहते हैं कि जोरबाका अर्थ होता है- एक भोग-विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति और बुद्धाका अर्थ निर्वाण पाया हुआ।
जोरबा केवल शुरुआत है। यदि तुम अपने जोरबा को पूर्णरूपेण अभिव्यक्त होने की स्वीकृति देते हो, तो तुम्हें कुछ बेहतर, कुछ उच्चतर, कुछ महत्तर सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। वह मात्र वैचारिक चिंतन से पैदा नहीं हो सकता, वह तुम्हारे अनुभव से जन्मेगा, क्योंकि वे छोटे-छोटे, क्षुद्र अनुभव उकताने वाले हो जाएंगे। गौतम बुद्ध स्वयं इसीलिए बुद्ध हो पाए, क्योंकि वे जोरबा की जिंदगी खूब अच्छी तरह जी चुके थे।