रविवार, 30 अप्रैल 2017

जयललिता – बाल कलाकार से मुख्यमंत्री तक का सफ़र





तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता का सोमवार ( 5 दिसंबर) को चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल में 68 की आयु में निधन हो गया। तमिलनाडु के रायपाल ने उन्हें महिला सशक्तिकरण का उदाहरण बताया है |वास्तव में वो बहुत सशक्त महिला थी |फिल्म हो या राजनीति हर जगह उन्होंने सफल होने का चेलेंज लिया और उसे पूरा करके भी दिखाया | ऐसे अभूतपूर्व सफलता विरले लोगों को ही मिलती है | परन्तु उससे भी ऊपर उनकी एक सफलता है वो है जनता में उन्हें अम्मा का दर्जा मिलना | माँ का यह दर्जा उस प्यार व् श्रद्धा की निशानी है जो केवल उसी शख्स को मिल सकती है जो जनता के दिलों पर राज करता हो |आइये जानते हैं उनके जीवन सफ़र के बारे में ………….

६ बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रह चुकीं जयललिता का जन्म 24 फरवरी 1948 को मैसूर के एक परंपरागत तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जब वो दो साल की थीं तो उनके पिता का निधन हो गया था। परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी इसलिए उन्होंने 1961 में महज 13 साल की उम्र में बाल कलाकर के तौर पर फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया। 1964 में कन्नड़ फिल्म चिन्नादा गोमबे (सोने की गुड़िया) से उन्होंने व्यस्क भूमिकाएं करनी शुरू की। उन्होंने फिल्मी जीवन की शुरुआत भले ही कन्नड़ फिल्मों से की हो लेकिन उन्हें बड़ी सफलता तमिल फिल्मों में मिली।
1965 में जयललिता ने अपनी पहली तमिल फिल्म “वेन्निरा अदाई” (सफेद लिबास) की। इसी साल उन्होंने तमिल फिल्मों के सुपरस्टार एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) के साथ भी पहली बार काम किया। एमजीआर और जयललिता की जोड़ी सुनहरे परदे पर हिट रही। दोनों ने एक साथ 28 फिल्मों में लीड रोल किया। 1970 के दशक में दोनों ने अज्ञात कारणों से एक साथ फिल्में करनी बंद कर दी थीं। दोनों ने आखिरी बार 1973 में आई फिल्म पट्टीकट्टू पोनैया में काम किया था। हालांकि जयललिता 1980 तक फिल्मों में काम करती रहीं। उन्होंने अपने करीब बीस साल लंबे फिल्मी करियर में करीब 300 फिल्मों में काम किया। उन्होंने कुछ हिंदी और एक अंग्रेजी फिल्म में भी अभिनय किया था लेकिन वहां वो सफलता का स्वाद नहीं चख सकीं।
फिल्मों में जयललिता के मेंटर रहे एमजीआर राजनीति में भी उनके गुरु बने। 1977 में एआईएडीएमके के नेता के तौर पर एमजीआर पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। उनके पीछे-पीछे जयललिता भी आज्ञाकारी शिष्या की तरह 1982 में एआईएडीएमके की सदस्य बनकर राजनीति में आ गईं। 1983 में उन्हें पार्टी के प्रचार विभाग का सचिव बनाया गया। 1984 में एमजीआर ने उन्हें राज्य सभा का सांसद बनाया। हालांकि कुछ समय बाद ही एमजीआर से उनके मतभेद शुरू हो गए। जब 1987 में एमजीआर का देहांत हुआ तो पार्टी में विरासत की जंग छिड़ गई। पार्टी का एक धड़ा एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के साथ था तो दूसरा धड़ा जयललिता के साथ।
एआईएडीएमके के कुल 132 विधायकों में से 97 के समर्थन से जानकी 1988 में राज्य की मुख्यमंत्री बनीं लेकिन राजीव गांधी की तत्कालीन केंद्र सरकार ने 21 दिन बाद ही उनकी सरकार को बरखास्त कर दिया। 1989 के तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में एआईएडीएमके की अंदरूनी कलह का साफ असर दिखा और डीएमके सत्ता में वापस आ गई। जयललिता के गुट को चुनाव में 27 सीटें मिली थीं वहीं जानकी गुट को महज दो सीटों से संतोष करना पड़ा था। इस चुनाव में करारी हार के बाद जानकी ने राजनीति से किनारा कर लिया और एआईएडीएमकी और एमजीआर की राजनीतिक विरासत की एकमात्र उत्तराधिकारी जयललिता बन गईं।

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