मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

बदलाव किस हद तक ?






रहिमन प्रिति सराहिए, मिले होत रंग दून । 
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून

                                               प्रेम का एक अलग ही रंग होता है , जहाँ दोनों एक दूसरे के लिए अपना रंग त्याग देते हैं |तब एक  रंग बनता है , प्रेम का रंग | भले ही प्रेम के एकात्म भाव की फिलोसिफी में इसे सर्व श्रेष्ठ पायदान पर रखा गया हो परन्तु किसी रिश्ते में एक दूसरे के हिसाब से बदलाव की हद क्या हो | यह जरूर चर्चा का विषय है |  अक्सर किसी नव विवाहित जोड़े से मिलने के बाद हमारे मुँह से अनायास ही ये निकल पड़ता है ," अरे फलाने भैये तो ये सब्जी खाते ही नहीं थे , भाभी ने बदल दिया " या अमुक दीदी ये रंग तो कभी पहनती ही नहीं थी जीजाजी ने बदल दिया | " इसके बाद वातावरण नव विवाहित जोड़े की शर्मीली सी मुस्कान के साथ खुशनुमा हो जाता है | रिश्ता पति - पत्नी का हो, सास - बहू का या कोई और हम जिस भी रिश्ते को चलाना चाहते है उसमें पूरा प्रयास करते हैं की दूसरे के हिसाब से जितना
हमसे हो सके खुद को बदल लें | पर ये बदलना स्वैक्षिक होता है | इसमें आनद की अनुभूति होती है | परन्तु अगर यह दवाब में या सप्रयास करना पड़े तो यही कलह या रिश्ता टूटने की वजह बनती है |जिस दिन हम अगले पर बदलने का दवाब डालने लगते हैं रिश्ते का दम घुटने लगता है | वस्तुत :  किसी भी रिश्ते में जरूरत से ज्यादा उम्मीद दूसरे पर बदलने का दवाब बनाती है | 

अहसासों का स्वाद


                  cognitive neurology के प्रोफेसर क्रिस फ्रिथ के अनुसार हम सभी का एक आंतरिक जगत होता है है जो हमारे पिछले अनुभवों के आधार पर बनता है | बाह्य जगत में हम अपने आंतरिक जगत की स्वीकृति चाहते हैं |  हम जिसके जितना जयादा करीब होते हैं | हम अपने आंतरिक जगत की स्वीकृति के लिए उतना ही ज्यादा लालायित रहते हैं | जब वो हमें स्वीकृत नहीं करता तो एक भय सा बैठ जाता है | भयभीत मनुष्य को अपने अनुभवों व् पूर्वाग्रहों  से बना अपना अस्तित्व खतरे में लगने लगता है | जिसके कारण वो दूसरे पर दवाब बनाना शुरू करता है | दूसरा बदल जाए तो उसके पूर्व अनुभवों  द्वारा संचित ज्ञान पर मुहर लग जायेगी और वो सुरक्षित महसूस करेगा | ये बिलकुल वैसा ही है जब हम किसी खोल या कवच के भीतर खुद को सुरक्षित महसूस करें | उम्र बढ़ने के साथ – साथ ये कवच और मजबूत  होता जाता है और लगने लगता है की हम ही  बिलकुल सही है | जहाँ  मुझसे बिलकुल उलट अनुभव रखने वाले व्यक्तित्व  की सम्भावना को बिलकुल नकार दिया जाता है |

पौधे की फ़रियाद

 जिन्दगी में कई मोड़ ऐसे आते है जहाँ हमें यह निर्णय  लेना पड़ता है की हम सही सिद्ध होना चाहते हैं या खुश रहना चाहते हैं |रिश्ते वही चलते हैं जहाँ कोई दवाब न हो व्  प्रेम इतना गहरा हो  की तमाम झगड़ों और असहमतियों के बावजूद साथ चलना अलग होने से बेहतर सौदा लगे | 
वंदना बाजपेयी 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें