मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

बच्चों की शिक्षा सर्वाधिक महान सेवा है!






-डाॅ. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
            ‘‘स्कूल चार दीवारों वाला एक ऐसा भवन है जिसमें कल का भविष्य छिपा है’’ आने वाले समय में विश्व में एकता एवं शांति स्थापित होगी या अशांति एवं अनेकता की स्थापना होगी, यह आज स्कूलों में बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा पर निर्भर करता है। एक शिल्पकार एवं कुम्हार की भाँति शिक्षकों का यह प्रथम दायित्व एवं कत्र्तव्य है कि वह बच्चों को आध्यात्मिक गुणों से इस प्रकार से संवारे और सजाये कि उनके द्वारा शिक्षित किये गये बच्चे विश्व का प्रकाशबनकर सारे विश्व को आध्यात्मिक प्रकाश से प्रकाशित कर सकें। महर्षि अरविंद ने शिक्षकों के सम्बन्ध में कहा है कि ‘‘शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींचकर उनमें शक्ति निर्मित करते हैं।’’ 

            बच्चों की शिक्षा सर्वाधिक महान सेवा है - सर्वशक्तिमान परमेश्वर को अर्पित मनुष्य की ओर से की जाने वाली समस्त सम्भव सेवाओं में से सर्वाधिक महान सेवा है- (अ) बच्चों की शिक्षा, (ब) उनके चरित्र का निर्माण तथा (स) उनके हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम उत्पन्न करना। इसलिए हमारा मानना है कि बच्चों के मन-मस्तिष्क पर अपने शिक्षकों द्वारा दी गई नैतिक शिक्षाओं का अत्यधिक गहरा प्रभाव पड़ता है। टीचर्स बच्चों को इतना पवित्र, महान तथा चरित्रवान बना सकते हंै कि ये बच्चे आगे चलकर सारे समाज, राष्ट्र व विश्व को एक नई दिशा देने की क्षमता से युक्त हो सकें। एक बालक अच्छे भविष्य की आशा है। यदि एक भी बच्चा पूर्ण गुणात्मक व्यक्ति (टोटल क्वालिटी पर्सन-टी.क्यू.पी.) बन जाये तो वह विश्व में बदलाव लाकर उसे एकताबद्ध कर देगा। 
            एक अत्यन्त ही सुन्दर सी प्रार्थना है कि हे मेरे परमात्मा मैं साक्षी देता हूँ कि तुने मुझे इसलिए उत्पन्न किया है कि मैं तुझे जाँनू तथा तेरी पूजा करूँ।परमात्मा को जानने का मतलब है परमात्मा की ओर से कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह के माध्यम से धरती पर अवतरित हुई शिक्षाओं न्याय, समता, करूणा, भाईचारा, त्याग व हृदय की एकता को जानना और पूजा करने का मतलब है ईश्वर की इन्हीं शिक्षाओं पर चलना। हमारे प्रतिदिन के प्रत्येक कार्य-व्यवसाय परमात्मा की सुन्दर प्रार्थना बने। धरती पर आध्यात्मिक समाज की स्थापना के लिए तीन क्षेत्रों को उजागर करने की आवश्यकता है, जो कि अभी तक अविकसित हंै। ये तीन क्षेत्र हैं (अ) शिक्षा (ब) धर्म और (स) कानून, व्यवस्था और न्याय। इन तीनों का विस्तृत विवरण इस प्रकार है:-
(अ) शिक्षा:
                        आज के युग तथा आज की परिस्थितियों में विश्व मंे सफल होने के लिए बच्चों को टोटल क्वालिटी पर्सन (टी0क्यू0पी0) बनाने के लिए स्कूल को जीवन की तीन वास्तविकताओं भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शिक्षायें देने वाला समाज के प्रकाश का केन्द्र अवश्य बनना चाहिए। टोटल क्वालिटी पर्सन ही टोटल क्वालिटी मैनेजर बनकर विश्व में बदलाव ला सकता है। उद्देश्यहीन तथा दिशाविहीन शिक्षा बालक को परमात्मा के ज्ञान से दूर कर देती है। उद्देश्यहीन शिक्षा एक बालक को विचारहीन, अबुद्धिमान, नास्तिक, टोटल डिफेक्टिव पर्सन, टोटल डिफेक्टिव मैनेजर तथा जीवन में असफल बनायेगी। 
            शिक्षा एक सतत् और रचनात्मक प्रक्रिया है। मानव प्रकृति में निहित क्षमताओं को विकसित करना और समाज की समृद्धि एवं प्रगति हेतु उनकी अभिव्यक्ति का संयोजन करना ही उसका लक्ष्य है। बच्चों को आध्यात्मिक, सामाजिक तथा भौतिक ज्ञान से सुसज्जित करके यह सम्भव होता है। सच्ची शिक्षा विश्लेषणात्मक योग्यताओं, आत्मविश्वास, संकल्प शक्ति और लक्ष्यपरक शक्तियों के विकास की क्षमताऐं प्रदान करती हैं। साथ ही वह ऐसी दृष्टि प्रदान करती है जो व्यक्ति को समुदाय के सर्वोत्तम हितों का संरक्षक तथा सामाजिक परिवर्तन का आत्मप्रेरित माध्यम बनने की योग्यता प्रदान करती है।
(ब) धर्म:
               परमात्मा की ओर से दिव्य अवतारों का युग-युग में अवतरण एक प्रगतिशील दैवी प्रेरणा के अन्तर्गत होता है। यह सच्चा ज्ञान है तथा इसका उचित उपयोग व जीवन में धारण करना बुद्धिमानी है। (पहला) स्वयं के जीवन में सफलता तथा (दूसरा) सामाजिक परिवर्तन के द्वारा पृथ्वी पर आध्यात्मिक सभ्यता स्थापित करने के ज्ञान तथा बुद्धिमत्ता दो सशक्त साधन हैं। परमात्मा सबसे ऊँची आत्मा है। वह सृष्टि का रचयिता है। हम उसे गाॅड, ईश्वर, अल्लाह, रब-नूर आदि नामों से पुकारते हैं। परमात्मा अजन्मा है। उसका कोई नाम तथा आकार-प्रकार नहीं है। परमात्मा को भौतिक आँखों से नहीं देखा जा सकता है। परमात्मा प्रकाश पुंज की तरह है। वह मनुष्य के पवित्र हृदय में आत्म तत्व के रूप में रहता है।
                        परमात्मा की प्रगतिशील दैवीय प्रेरणा के मायने है कि परमात्मा द्वारा सिलसिलेवार श्रंृखला में युग-युग में अवतरित दैवीय शिक्षक कृष्ण (5000 वर्ष पूर्व), बुद्ध (2500 वर्ष पूर्व), ईशु (2000 वर्ष पूर्व), मोहम्मद (1400 वर्ष पूर्व), नानक (500 वर्ष पूर्व), बहाउल्लाह (200 वर्ष पूर्व) तथा उनकी शिक्षायें युग की आवश्यकता को पूरा करने के लिए विश्व के विभिन्न स्थानों में अवतरित हुई हैं। धर्म का बुनियादी उद्देश्य मानव जाति की एकता, मानवीय प्रेम तथा भाईचारे को विकसित करना है। बच्चों को बताना चाहिए कि सभी अवतार राम, कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, मोजज, अब्राहम, जोरस्टर, महावीर, नानक, बहाउल्लाह एक ही परमात्मा की ओर से आये हैं।
                        आध्यात्मिक शिक्षा के अन्तर्गत बालक को पवित्र ग्रन्थों- गीता, कुरान, त्रिपटक, बाईबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे अकदस में संकलित परमात्मा की शिक्षाओं का ज्ञान कराना चाहिए तथा परमात्मा की शिक्षाओं पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए। 
(स) कानून, व्यवस्था और न्याय:
            बच्चों को बचपन से ही अपने माता-पिता के द्वारा बनाये नियमों तथा स्कूल में प्रिन्सिपल एवं स्कूल के टीचर्स द्वारा बनाये गये नियमों (या कानूनों) का पालन करना सिखाना चाहिए ताकि बड़े होकर जब वे समाज में प्रवेश करें तब वे समाज के नियमों एवं कानूनों का और न्याय का पालन करें।
(5) कुछ उपयोगी विचार:
            नेल्सन मण्डेला ने कहा है कि शिक्षा सबसे अधिक शक्तिशाली हथियार है जिसके उपयोग से विश्व में बदलाव लाया जा सकता है।महान विचारक विक्टर ह्ूगो ने कहा है कि पूरे संसार की समस्त सैन्यशक्ति और बमों की शक्ति से भी अधिक शक्तिशाली वह विचार होता है जिसका समय आ चुका हो।बालकों की भौतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक गुणों की संतुलित शिक्षा वह विचारहै जिसका समय आ चुका है। 
(6)  धरती पर शैतानी सभ्यता के स्थान पर आध्यात्मिक सभ्यता स्थापित करने के लिए हमें बालक के तीन क्लास रूम (अ) घर का वातावरण, (ब) स्कूल का वातावरण तथा (स) समाज का वातावरण शिक्षाप्रद बनाना होगा।
            स्कूल ही समाज के प्रकाश या अन्धकार का केन्द्र है: बालक ईश्वर की सर्वोच्च कृति है। प्रत्येक बालक अवतार की तरह ही पवित्र, दयालु और ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय लेकर इस पृथ्वी पर जन्म लेता है। किसी भी बालक का घरउसका प्रथम क्लास रूम है, ‘स्कूलउसका दूसरा क्लास रूम है तथा समाज उसका तीसरा क्लास रूम है। इस प्रकार कोई भी बालक अपने सम्पूर्ण जीवन की परीक्षाओं के लिए घर’, ‘स्कूलतथा समाजरूपी तीनों क्लास रूमों से शिक्षा ग्रहण करता है। इन तीनों स्कूलों में आपस में सहयोग अति आवश्यक है। ये तीनों मिलकर बालक के चरित्र का निर्माण करते हैं। विश्व में ईश्वरीय सभ्यता स्थापित करने के लिए इन तीनों क्लास रूमों को अच्छा बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
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