मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

" बहू बेटी की तरह होती है यह कथन सत्य है या असत्य "





डॉ मधु त्रिवेदी 
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               बहू और बेटी " में समानता और असमानता केवल सोच की है जो बेटी है वो किसी और घर की बहू बननी है और जो बहू है किसी के घर की बेटी है बस केवल अन्तर यह है कि एक जाती है नया संसार बसाने तो दूसरी बेटे का नया संसार बसाने आती है दोनों ही स्थितियों में वंश सरम्परा का बढ़ना सुनिश्चित है -----
     "जीवन की राहे सुगम करनी है तो
      प्यार , स्नेह , ममत्व उगाना होगा
      पर - परायी भावना को छोड़ कर
       सास -बहू को माँ -बेटी बनना होगा
             बहुओं को बेटी बनाकर रखा जाए तो सासु और बहू के लिए जीवन सफर सरल तो होगा ही साथ ही घर के सभी लोग परस्पर नेह के बंधन में भी बँधे रहेगे । पोतियों का जन्म होने पर उनको महान बनाकर सर्वश्रेष्ठ एवं गौरवान्वित महसूस करो। बेटी किसी भी बात में कम नही है पुरुष के बराबर कदम से कदम मिला चल रही है । बेटी को सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत कर अच्छी बहू बनाया जा सकता है ।

         प्राय: देखने में आता है कि लोग सोशल मीडिया जैसे  साइट्स  फेसबुक , वाट्सप्प , ट्वीटर आदि पर अपनी बेटियों, बहुओं और पोतियों के साथ फोटो डालकर एवं शेयर कर अपने अनुभव को साझा करते हैं इससे पारस्परिक सामजस्य तो बढता ही है साथ ही जीवन समरसता भी बनी रहती है । इसलिए सास का भी दायित्व बनता है कि बहू को बाहर से आयी न समझकर उसको परिवार में बेटी का दर्जा दें जिससे उसको नया परिवार न मान अपना ही घर मानकर चलें ।
      
           बदलते परिवेश में ऐसी फैमिलियाँ भी है जहाँ  सास और बहू मां-बेटी की तरह रहती हैं।  आपस में उनमें तू-तू,मैं-मैं नहीं होता ,बल्कि एक-दूसरे को समझती हैं चाहती हैं। यदि सुख और दुखों का साथ साथ बँटवारा करती हैं और एक-दूसरे का संबल और सहारा बनती हैं।  इक्कीसवीं सदी की सासु माँ प्राचीन सासु माँओ की तरह न होकर काफी सुलझी हुई है वो बहू पर बंधन नहीं लादती है आजादी प्रदान करती है इसका उदाहरण विवाहोपरान्त जब वे शिक्षा प्राप्त करती है तो अपने बच्चों को भी छोड़ जाती है ।
         इसलिए यह तथ्य कि बहू  बेटी की तरह होती है
यह कथन सत्यता प्राप्त तभी कर सकता है जब एक छत के नीचे सास- बहू दोनों माँ बेटी का रिश्ता बना रह पायेगी ।



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