बुधवार, 12 अप्रैल 2017

बोझ






इस बार कामिनी के मायके आने पर कोई स्वागत नहीं हुआ | भाभियों ने मामूली दुआ सलाम कर रसोई की राह संभाली | बिट्टू के मनपसंद खाने के बारे में भी नहीं पूंछा | लौकी की सब्जी और तुअर दाल देख कर बिट्टू नाक - भौं बनाती , तब तक माँ की तरेरती आँखे देख चुपचाप वही गटक  लिया | पर बिट्टू हैरान थी की इस बार मामा ने भी कहीं घूमने चलने की बात नहीं कही | न ही दीदी , दीदी कर के उसकी माँ के इर्द - गिर्द घूमें | पर सब से ज्यादा आश्चर्य उसे नाना जी की बात सुन  कर हुआ जो नानी को डांटने के लहजे में कह रहे थे | ज्यादा बिटिया - बिटिया करती रहोगी तो बेटे बहुएं तुम्हारे खिलाफ हो जायेंगे |
कामिनी का जो हो सो हो , तुम अपने बुढापे के बारे में सोंचों | अब तो 8 वर्षीय बिट्टू से रहा नहीं गया | सीधे माँ के पास जा कर पूंछने लगी ,"माँ , आखिर इस बार ऐसा क्या हुआ है , कोई हमसे ठीक से बात क्यों नहीं कर रहा है |सब लोग इतना बदल क्यों गए हैं ? कुछ नहीं बेटा , इस बार मैंने हिम्मत कर के वो नीले साव भाभी और माँ को दिखा दिए जो तेरे पापा की बेल्ट से हर रात मेरी पीठ पर उभर आते हैं | बस , सबको भय हो गया की मैं अब कहीं यहीं न रुक जाऊं " कामिनी ने बैग पैक करते हुए सपाट सा उत्तर दिया |

वंदना बाजपेयी 

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