सोमवार, 3 अप्रैल 2017

जरूरी है असहमतियों से सहमत होना







कभी – कभी प्रेम उन बातों को नज़रंदाज़ करना भी है जो आपको पसंद नहीं हैं |
दो लोगों के मध्य रिश्ता चाहें कोई भी क्यों न हो परन्तु वह रिश्ता बरक़रार तभी रहेगा जब वह असहमतियों से सहमत होना सीख जायेंगे | दो लोग बिलकुल एक जैसा नहीं सोंच सकते | यह भिन्नता ही नए – नए विचारों को जन्म देती है | नए विचार नयी संभावनाओं को | किसी भी मुद्दे पर जब हम अपनी कोई बात रखते हैं तो अवश्य हमें वही बात ठीक लग रही होती है | मनोवैज्ञानिकों की सुने तो जैसे ही हम किसी मुद्दे पर अपना कोई विचार बना लेते हैं
तो हमें उस विचार से भावनात्मक लगाव हो जाता है | जिसको छोड़ना थोडा मुश्किल होता है | कुछ हद तक हमें लगने लगता है की जिनसे हम बात करें वो हमारे विचार मानें | खासकर की जो लोग हमारे करीब होते हैं कहीं न कहीं हम उनपर विचार थोपने लगते हैं | जैसे पति – पत्नी  पर व् माँ बच्चों पर | दोस्त आपस में एक दूसरे पर | कई बार ये इस हद तक हो जाता है की हम दूसरे को नीचा दिखने से भी बाज़  नहीं आते |  परन्तु दूसरे पर अपने विचार थोपना उसकी  स्वतंत्रता छीनने के जैसा है | स्वाभाविक है उस व्यक्ति से प्रेम करना मुश्किल है जो हमारा आकलन कर रहा हो | हम खुद चाहते हैं की लोग हमें पूर्ण रूप से स्वीकार करे पर दूसरों को नकारते हैं | प्रेम का अभाव , ये द्वंद ये कोलाहल तब तक चलता रहेगा जब तक हम असहमतियों से सहमत होना नहीं सीख जायेंगे | मैं हूँ , तुम हो .... इसीलिये तो हम हैं

वंदना बाजपेयी 



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