रविवार, 23 अप्रैल 2017

अर्थ डे और कविता









 अर्थ डे  और मैं कविता लिखने की नाकामयाब कोशिश में लगी हूँ  | मीडिया पर धरती को बचाने  का शोर है  | मैं मन की धरती को बचाने में प्रयासरत | धरती पर पानी की कमी बढती जा रही है और मन में आद्रता की | सूख रही है धरती और सूख रही है कविता | हाँ  कविता ! जो  जीवन के प्रात: काल में उगते सूर्य के साथ लबालब भरे मन के सरोवर पर किसी कमल के फूल सी खिल उठती  है | कितनी कोमल , कितनी मनोहर |  भ्रमर  गीत गाती सी खिलाती है पत्ती – पत्ती माँ , बहन व् अन्य रिश्तों को सितार के तार सा  छेड़ते हुए आ जाती है प्रेम के पायदान पर और  फैलाने  लगती है सुगंध | पर जीवन सिर्फ प्रेम और वसंत ही तो नहीं | की जब बढ़ चलता है उम्र का सूर्य , खिल जाती है धूप तो नज़र आने लगती हैं जीवन की  विद्रूपताएं |सूख ही जाता है थोडा सा सरोवर , तभी ...
शायद तभी परिवार और प्रेम की सीमाएं लांघ कर नज़र आने लगती है , गरीबी , बेचारगी , लाचारी , समस्याएं बहुत साधती है , बहुत संभालती है पर जीवन के मरुस्थल में आगे बढ़ते हुए  इतनी कम आद्रता में, हाँफने  लगती है कविता | लय  सुर छन्द न जाने कब गायब हो जाते हैं और बेचारी गद्य ( ठोस ) हो जाती है | और हम हो जाने देते हैं | हमें आद्रता की फ़िक्र नहीं , हमें कविता की फ़िक्र नहीं , हमें धरती की फ़िक्र नहीं | हमें बस भागना है एक ऐसी दौड़ में जो हमें लील रही है | पर हमारे पास सोंचने का समय नहीं | अगर हम रुक कर सोंचेंगे तो कहीं अगला हमसे आगे न चला जाए | चाहे हम सब हार जाएँ | काश की इस आत्मघाती दौड़ में हम समझ पाते की दौड़ को कायम रखने के लिए भी जरूरी है की आद्रता बची रहे , कविता बची रहे , धरती बची रहे | 

वंदना बाजपेयी 

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