गुरुवार, 9 मार्च 2017

हाउस वाइफ – बंद दरवाजों में सिसकते सपने


पिछले दिनों मैं अपने एक बहुत पुराने मित्र के घर खाने पर गया था। तरह-तरह की लाजवाब चीजें, जो आम तौर पर घर में नहीं बन सकतीं, खाने के बाद जाहिर है तारीफ होगी। अपने मित्र की मां से उनके हाथ के बने पकवानों की प्रशंसा भर ही की थी कि वे भावुक हो उठीं, ‘बेटा मुझे नई-नई चीजें बनाकर खिलाने का बहुत शौक है। मैंने कुकिंग भी सीखी थी और अपना टैलंट लोगों को सिखाना चाहती हूं। मेरा मन है कुकिंग क्लास खोलने का, इससे मेरी पहचान बनेगी, मैं लोगों तक अपने इस टैलंट को पहुंचाना चाहती हूं… मगर इसके पापा नहीं चाहते कि मैं काम करूं, वो कहते हैं कि जब मैं कमा रहा हूं और घर का खर्चा चला रहा हूं तो तुम्हें काम करने की क्या जरूरत, तुम बस घर का चूल्हा संभालो और यह खयाल दिमाग से निकाल दो…।’ बात खत्म करते-करते उनका गला भर आया था और सहसा एक बूंद उनकी आंखों से टपकते देखी। अनेक दबावों के कारण उन्होंने हाउस वाइफ बने रहना मंजूर किया , पर अब वे घर से निकल कर कुछ करनाचाहती हैं , पर निकल नहीं पा तीं।
यकीन मानिए, खाने का स्वाद ही भूल बैठा। मैंने पहली बार किसी महिला को ऐसा कहते सुना था, मगर लगा कि यह कहानी इनके अकेले की नहीं है। यह कहानी हर उस महिला की है जिसने इस ‘पुरुषवादी समाज’ में अपने लिए कोई स्पेस खोजने की हिमाकत की होगी। आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो महिलाओं के काम करने के खिलाफ है, खासकर मध्यवर्ग में। फोर्टी प्लस की उम्र की कई औरतें ऐसी हैं जो शुरू में परिवार के दबाव में या कई तरह की व्यावहारिक दिक्कतों की वजह से नौकरी नहीं कर पाईं। वे बाल-बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा आदि में लगी रहीं, लेकिन जब उनके बच्चे बड़े हो गए तो वे एक अकेलापन महसूस करने लगी हैं। वे घर में रहते-रहते डिप्रेशन तक का शिकार हो रही हैं। वे घर से बाहर निकलकर या घर में ही कुछ करना चाहती हैं, पर स्थितियां ऐसी हैं कि वे कुछ नहीं कर पातीं। उन्हें पति और परिवार से प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। लेकिन इसके लिए सिर्फ परिवार जिम्मेदार नहीं है। हमारे सिस्टम में ऐसी महिलाओं के लिए कोई खास गुंजाइश नहीं है। सरकारी नौकरियों में तो उम्र की सीमा तय है, प्राइवेट सेक्टर भी युवाओं को ही मौका दे रहे हैं। हाल के वर्षों में लड़कियों के प्रति सोच में बदलाव आया है। अब शहरी परिवार आम तौर पर लड़कियों की नौकरी के खिलाफ नहीं रह गए हैं।। लड़कियां मानकर चल रही हैं कि उन्हें नौकरी करनी ही है। पर उनकी मांओं की स्थिति विचित्र है। वे घर से बाहर निकलकर कुछ करना चाहती हैं पर निकल नहीं पातीं। उन्हें बताया जाता है कि उनका समय निकल चुका है। उनकी तुलना में अशिक्षित वर्ग की स्त्रियों की हालत कहीं बेहतर है। वे घर के साथ-साथ बाहर के काम भी करती हैं। और कुछ न कुछ धनोपार्जन भी करती हैं। उनका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
2011 की सेंसस रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण महिला कामगारों की संख्या शहरी कामगार महिलाओं की आबादी की दोगुनी है। वैसे अन्य देशों की तुलना में देश की अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान बेहद कम है। वर्ष 2000 में 39 प्रतिशतमहिलाएं श्रम क्षेत्र में योगदान करती थीं पर 2010 में इनकी संख्या घटकर 30 प्रतिशत तक रह गई। इस तरह भारतमें महिला कामगारों की आबादी विश्व के अन्य कई देशों से बहुत कम है। 2010 की ही एक रिपोर्ट के अनुसार 25 से54 वर्ष की उम्र के बीच की महिला कामगारों की संख्या हमारे देश में 39.5 प्रतिशत है , जो आर्थिक सिस्टम मेंसक्रिय भूमिका निभाती हैं। चीन में यह संख्या 82 प्रतिशत है तो ब्राजील में 72 प्रतिशत। जहां भारतीय शहरी क्षेत्र मेंमहिला कामगारों की संख्या 24 फीसदी थी , वहीं चीन में यह 65 प्रतिशत है। बेहतर होगा कि सरकार सामाजिकसंगठनों के साथ मिलकर ऐसी योजनाएं बनाएं कि वे महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें जो नियमित कामगार नहींहैं।

विश्वजीत मुखर्जी

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