गुरुवार, 9 मार्च 2017

दर्द भरी दास्तान – उन महिलाओं की जो भोगती हैं हर साल रेप / निकलवाने पड़ते हैं गर्भाशय




महाराष्ट्र में गन्ने की कटाई करने वाले मजदूरों के साथ जो होता है, उसे पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. उनके साथ हर साल इस हद तक रेप होता है कि गर्भाश्य निकलवाने पड़ते हैं |मॉनसून के बाद हर साल गौरी भिवड़े और उनके पति दसियों हजार लोगों के साथ गन्ने की कटाई का काम करने के लिए महाराष्ट्र के पश्चिमी जिलों में चले जाते हैं. और हर साल गौरी और उनके जैसी सैकड़ों महिलाओं का यौन शोषण होता है. गौरी बताती हैं कि हां, ऐसा तो हर साल होता है.
एक बार गौरी को प्रेग्नेंसी में बहुत दिक्कतें झेलनी पड़ीं. इसके बाद डॉक्टर ने उनसे कहा कि गर्भाश्य निकाल देते हैं ताकि आइंदा दिक्कत ना हो.
महाराष्ट्र में गन्ने की कटाई के लिए जाने वालीं महिलाएं साल दर साल बलात्कार झेल रही हैं.

खेतों के मालिकों से लेकर बिचौलिये तक, सब उनको अपना शिकार बनाते हैं. कार्यकर्ताओं के मुताबिक ऐसा कर्ज की वजह से होता है.एक कार्यकर्ता बताते हैं कि महिलाओं को उनके परिवार वाले गर्भाश्य निकलवा देने को कहते हैं ताकि वे रेप से प्रेग्नेंट ना हो जाएं. बीड जिले में दर्जनों ऐसी महिलाओं से मिल चुकीं मुंबई में ऐक्शनएड की रीजनल मैनेजर नीरजा भटनागर कहती हैं, “यह एक ऐसा उल्लंघन है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. इससे ज्यादा क्रूर मानवाधिकार उल्लंघन नहीं हो सकता कि आपको अपना गर्भाश्य इसलिए निकलवा देना पड़े ताकि आप उस अर्थव्यस्था का हिस्सा बन सकें जिसे आपकी रत्ती भर भी परवाह नहीं है.”
वैसे, चीनी मिलों की को-ऑपरेटिव के प्रवक्ता ऐसी घटनाओं से साफ इनकार करते हैं. महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज फेडरेशन के उपाध्यक्ष श्रीरामजी शेते कहते हैं, “हमने ऐसी कोई घटना नहीं सुनी है. अगर वे तन्खवाह या हालात से नाखुश होते तो हर साल क्यों आते?”
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक है और महाराष्ट्र भारत का सबसे बड़ा. यहां के पांच लाख ग्रामीण बीड़, शोलापुर, कोल्हापुर, सांगली और सतारा जिलों में गन्ना काटने पहुंचते हैं. मजदूरों को जोड़ों में रखा जाता है. ज्यादातर ऐसे हैं जिनके सिर पर कर्ज है. उन्होंने खेत मालिकों से 50-60 हजार रुपये कर्ज लिया है जिसके बदले वे छह से आठ महीने तक काम करते हैं. और काम खत्म हो जाने के बाद भी साहूकार कहता है कि अभी कर्ज बाकी है इसलिए अगले सीजन फिर आना होगा.ये लोग जिन हालात में रहते हैं, वे अमानवीय से भी बदतर कहे जा सकते हैं. फूस की झोपड़ियों में ना पानी होता है, ना बिजली. शौच की सुविधा तो सपनीली बात है. कई बार पति-पत्नी के साथ उनके बच्चे भी आते हैं. सुबह 4 बजे से शाम 4-5 बजे तक लगातार काम करते हैं.
कई जगह एक-आध डॉक्टर होता है जो कटाई के दौरान कट वगैरह लग जाने पर मरहम पट्टी कर देता है. लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि चोट अगर ज्यादा लग जाए, या कोई बीमारी हो जाए और कोई और प्रेग्नेंट हो जाए तो उन्हें उससे खुद निपटना होता है.
सतारा में काम करने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता अपना नाम नहीं बताना चाहतीं क्योंकि इससे वे मजदूर मुश्किल में फंस सकते हैं जिनके लिए वह काम करती हैं. वह बताती हैं, “यह बंधुआ मजदूरी का सबसे बुरा रूप है. और इसकी जलन सबसे ज्यादा औरतों को सहनी पड़ती है. वे लोग अपने परिवार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकतीं. वे बस भाग्य को दोष देती हैं. उन्हें पता है कि उनके साथ क्या होगा, फिर भी पेट भरना है तो काम करना ही होगा.”

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