गुरुवार, 9 मार्च 2017

मेरी बत्तीसी


चौराहे पर दो लड़के लड़ रहे थे। एक ने दूसरे को धमकी दी , “ओये, चुप कर जा…नही तां इक ऐसा घुसुन्न दऊँ कि तेरे छती-दे-छ्ती दंद बाहर आ डिगन गे!”
वही खड़े एक तमाशखोर ने जब यह सुना तो उसने आग में घी डाला, “ओये मुरखा तेनु एह वी नही पता कि साडे बती दंद होनदे ने, छत्ती नही …!”
तो पहला बोला, “मेनू एह पता है…नाले मैनू पता सी, तू वी मेरे नाल पंगा लेंगा…एस करके मैं ‘चार दंद तेरे वी गिन के उसनू दस्से ने!”
दाँतो के डाक्टर के पास जाने का समय बेगम ने ही लिया था। डॉक्टर ईलाज के लिए चार सौ डालर मांग रहा था लेकिन रामदुलारी फीस कम करवाने के लिये उससे सक्रिय रूप से बातचीत कर रही थी! वह उसे पचास डालर लेने के लिये रज़ामंद कर रही थी। लेकिन डाक्टर 75 डालर पर अटका पड़ा था।
डाक्टर का कहना था,” मेम, एक शर्त पर मैं पचास डालर ले सकता हूँ …दाँत निकालने से पहले दर्द की कोई दवा नही दूँगा …फिर उसने व्याख्या की – दर्द की दवा बहुत महंगी है, इतने पैसों में तो मैं मरीज को दाँतो को सुण करने वाली दवा की एक बूंद भी नही दे सकता। मरीज दर्द से चीखेगा, चिलायेगा, तड़फेगा, पीड़ा के मारे ‘डेंटल चेयर’ से उठ उठ कर बाहर आयेगा, बिना धड़ वाले मुर्गे की तरह छटपटायेगा… यह तो मरीज के साथ ज़ुल्म होगा और हाँ मेरी सेक्रेटरी मंजु दाँत निकालेगी जिसने इससे पहले कभी किसी का दांत नही निकाला …अब पीड़ा का आप खुद अंदाज़ा लगा लें!”

“मंजूर है, दर्द की बिल्कुल परवाह नही…. क्या आप मेरे पति को कल सुबह आठ बजे का टाईम दे सकते है?”
यह तो था मज़ाक… और अब यह वास्तविकता।
सुनयार, वकील और पुलिस वाले, यह ऐसे तीन पेशे वाले है जो किसी को नही बकशते। कहते हैं जब धंधे की बात आती है तो अपने बाप को भी नही छोडते और उन्हे भी थूक या चूना लगा देते हैं!
इनकी श्रेणी में मैं अपने तजुर्बे के आधार पर ‘डेंटिस्ट्स’ को भी जोड़ना चाहूँगा!
सन 1987-88 की बात है! उस वक़्त मैं यहाँ के (अमेरिका) के एक दूसरे शहर में रहता था। अभी नया नया ही भारत से यहाँ आया था! अपनी नौकरी वाली कंपनी से मैंने दांतों की बीमा-योजना खरीद ली थी जिसके तहत मैं साल में दो बार जाकर,अपनी जेब से बिना एक पैसा दिये अपने दाँत साफ करवा सकता था!
राम दुलारी की कसम इससे पहले तो मैं भी आपकी तरह किसी डेन्टिस्ट के पास नही गया था!
उन दिनो सुबह के वक़्त खुले में ही जंगल-पानी जाने का रिवाज़ और नियम हुआ करता था और आदत भी! लोग रास्ते में से किसी एक कीकर की एक टहनी से दातुन बना कर अपने दांत चमका लिया करते थे! उस वक़्त मेरी बत्तीसी ऐसी चमकती थी जैसे अनार के दाने हो! नही तो घर में नीम का एक बड़ा पेड़ भी था जो छाया और निमोलियां देने के ईलावा हमे दाँतो के डाक्टरों से भी दूर रखता था! लेकिन इनके पास जाना तो आजकल ‘स्टेटस सिंबल’ सा हो गया है। मेरी बाली-उमरिया में न तो यह डेंटिस्ट्स ही होते थे ओर न ही उनकी जात! हाँ, नाई, हलवाई, मौची और पंसारी आदि तो आम हुआ करते थे लेकिन इन दांत साफ करने वालों के बारे में मैंने तो कभी नही सुना था! जब अपने हाथ-पाँव मौजूद हैं तो किसी से दाँत साफ करवाने की क्या ज़रूरत? और हाँ, लोग शेर होते थे, उनके दाँत बहुत मजबूत होते थे। मैंने भी अपने जमाने में बांस और काने अपने दाँतो से गन्ने की तरह छीले हैं! …और फिर शेरां दे दंद किन्हे धोते? बस, यही तो होता था न? मर्द कीकर या नीम के दातुन से और औरतें रँगीले दातुन से (क्योंकि वह दाँतो को साफ करने के ईलावा उनके होंठो को भी रंग देता था) अपने दांत साफ करते थे।
किसी दिन कुछ न मिला तो हैंड-पम्प के पानी के साथ खाली उंगली से भी दाँत साफ करने का काम चला लिया जाता था ! अगर यह बात सच है और आपने भी इस हकीकत का समय देखा और झेला है तो ईमानदारी से अपने हाथ खड़े करें!
खैर, मेरा दाँतो का डाक्टर बड़ा हैरत में पड़ गया जब मैंने उसे 29 साल की उम्र में बताया कि मैं उससे पहले किसी दूसरे, मेरा मतलब पहले, डाक्टर के पास नही गया। इसके बावजूद भी उसे मेरे मुंह में एक ‘केविटी’ नही मिली। जब मैंने उसे बताया कि मैं पेड़ की एक लक्कड़ से अपने दांत साफ करता था तो वह विस्मित हो उठा! बाज़ार में ब्रुश और पेस्ट होती होगी लेकिन मुझे इसका इल्म नही क्योंकि मेरे पास यह सब कुछ नही था! मैंने अपने दौर में दूसरों को कच्चे कोयले में थोड़ा सा नमक मिलाकर और फिर उसे पीस कर ‘होम-मेड’ मंजन से भी अपने दाँत साफ करते देखा है।
छह महीने के बाद मैं फिर अपने डेन्टिस्ट के पास अपनी दूसरी ‘विजिट’ के लिए गया तो उसे फिर मेरे मुंह में थूक के इलावा कुछ नही मिला, मेरा मतलब दाँतो में कोई ‘कीड़ा-वीड़ा’ नही मिला जिसे यह अंग्रेज़ लोग ‘केविटी’ कहते हैं।
पहली बार यह शब्द सुना था लेकिन इससे पहले खड्डे और खाई तो बहुत बार मैंने सुन रखे थे क्योंकि बचपन में मेरा आधा दिन इन्ही में बितता था। मिट्टी के ढेले, टूटे घड़े के ठीकरे, ईंट, रोड़े और पत्थर मेरे खिलौने हुआ करते थे! गुल्ली डंडा, लुक्कन मिटी, गली मोहल्ले में बंदरों की तरह पेड़ो से ऊपर-नीचे लपकना तो कभी स्टापू की गेम जो लड़कियां खेलती थी, मेरे पसंदीदा खेल हुआ करते थे!
इन डाक्टरों से भी मेरा अल्हा ही बचाये! शायद इनको भी हमारी तरह अपने बिल देने पड़ते हैं। मेरा डेन्टिस्ट एक्सरे को देखते हुये कहने लगा, “मुझे तुम्हारा ‘विज़डम टूथ’ निकालना पड़ेगा…!”
“वह क्यूँ, भाई?”
“मेरा भी नही है…!”
“आपकी अक्कल…जाड़ नही है लेकिन मेरी भी बाहर निकालने का यह कोई अच्छा तर्क नही है!” मैंने उसे जवाबी तर्क दिया था! अपनी ‘विज़डम’ …टूथ ….निकालने के बाद मेरी भी निकालने पर लगे हो …पहले पूरी तरह अक्कल ……की जाड़ .. आने तो दो…!” मैंने अपने मन ही मन में उससे कहा!
“यह बात नही, क्या है कि आपका जबड़ा टाईट है, दाँतो में कम स्पेस रहता है, वैसे भी मुंह में इसका कोई लाभ नही” डाक्टर बोला।
“अपने दाँत फ्लास करते हो?” डाक्टर ने फिर पूछा !
“आई डीड नॉट गेट इट, यह फ्लास क्या होता है?” मेरा मासूम सा प्रश्न था!
मैंने भी उसे बड़े दलील दिये अपने ‘विज़डम टूथ’ को बचाने के लिये लेकिन मैंने उसके आगे अपने हथियार यह कह कर फेंक दिये, “आपको जो भी बीमा कंपनी से मिलता है ले लो लेकिन मुझे अपनी जेब से कुछ न देना पड़े तो मुझे इसमे कोई आपति नही…!”
ओ, रब्बा मैं की कर बैठा… बस पुछो मत …मेरी अक्कल -दाड़ इतनी मजबूत थी कि बाहर आने को तैयार नही थी, उसने डेन्टिस्ट के पसीने और छ्क्के दोनों ही छुड़ा दिये, उसके हाथों से उसके ओजार छूट कर जमीन पर गिरने लगे। वह बार बार अपनी घबराहट को छुपाने के लिये दूसरे कमरे में जाता और अपना पसीना पौंछ कर आता। मुझे अपनी नानी की बात याद हो आई जो कहती थी… “जो दूसरों की बात नही मानता उसका यही हाल होता है!”
काश, यह डाक्टर मेरी सुनता! आखिरकार, उसे दाँतो के सर्जन के पास मुझे भेजना पड़ा। पूरे चोदह दिन मैं तकलीफ में रहा और अपने चोदह दिन के वेतन से वंचित भी रहा – बस इतना ही उसका बिल था! ‘डैम इट!”
वह दिन गया और यह दिन आया मैं फिर किसी ‘डेन्टिस्ट’ के पिछवाड़े से भी नही गुज़रा!
मरता क्या न करता, इतिफाक से पिछले महीने मुझे फिर जाना पड़ा! मैंने तो बड़ी कौशीश की कि किसी तरह बच जाऊँ। मैं तो बाज़ार से अपने दाँत के नुकीलेपन को दूर करने के लिये बाज़ार से एक रेगमार भी खरीद लाया जिसे मॉडर्न युवतियाँ ‘नेल फायलर’ कहती है। हुआ यूं कि मेरा एक दाँत इतना नुकील्ला हो गया था कि मेरी जीभ को काटने लगा था। शायद मुझसे कहता हो, “अशोक, तुझे क्या हो गया है…एक जमाना था तुम ‘यूनियन लीडर’ थे, दूसरों के साथ अन्याय के विरूद्ध लड़ा करते थे,लेकिन अब हमेशा चुप रहते हो… एक भीगी बिल्ली की तरह हो गये हो…अपनी घर की बिल्ली बेगम की भी हमेशा बर्दाश्त कर लेते हो…?”
मरता क्या न करता, जाना पड़ा जी, बस मुझे जाना पड़ा! यह ‘डेन्टिस्ट’ अपने परिवार का ही था, बस दूर का रिश्ता था!
इधर वह मेरे दाँत की देखभाल भी करता रहा और उधर अपनी असिस्टंट को भी बार बार भेज कर अपनी ‘बिलिंग कलर्क’ को संदेशा भिजवाता रहा “उसे बोलो, फिफ़्ती परसेंट आफ…!”
और फिर थोड़ी देर बाद आकर वह आकर मुझे बताती कि मुझे जेब से 200 सौ डालर देने पड़ेगें! मैं फीस देने के लिये अपना सिर हिलाता, मैं बोल कहाँ सकता था (मेरा जबड़ा तो डाक्टर ने पहले ही सुन्न कर दिया था, मेरी जीभ को जैसे साँप डस गया था। मैं कैसे ‘ना’ करता?)
डॉक्टर जब मेरा दाँत निकाल रहा था, मुझसे कहने लगा, “बस दाँत ही निकालूंगा और कोई ग्राफ्ट की ज़रूरत नही…. या फिर जे तुस्सी ‘टूथ इंप्लांट’ करवाना ते उसदे वास्ते मैंनू तुहाडे मुंह ‘च स्क्रू(Screw) पाना पैना, तुहाडे जेबयों 1200 डालर वी लग जानगें….!”
“ओ, बस कर यारा,,, स्क्रू करण वास्ते ऐथे अंग्रेज़ कम ने, जेहड़ा तुस्सी अपनयां नू ही स्क्रू पाई जाने ओ? अजे तुससी ते अपने हो, आपनया नू वी स्क्रू करण तों तुस्सी बाज़ नहीआंदे!” मैंने अपने मन ही मन में कहा! समय की नज़ाकत को समझा करो,यारो! दांत ने पहले ही मेरा दम ले रखा है, उसके बाद दूर की रिस्तेदारी का यह डाक्टर मेरे इतने करीब बैठकर मेरे मुंह पर कंट्रोल किए बैठा है, मेरे कुछ बोलने की गुंजाईश कहाँ है? रिश्तेदार को शर्म आये तो आये, भला मैं क्या उससे कह सकता था?
मैं कभी डाक्टर साहिब को तो कभी उनकी सुन्दर ‘असिस्टेंट’ को देखता हुआ उनकी ‘चेयर’ से उठा जिसमें उसने मेरा दांत निकालने के लिये मुझे ‘लम्म्या’ पाया हुआ था। इसके बाद डाक्टर साहिब की असिस्टेंट मुझे बिल अदायगी की खिड़की तक ले गई तांकि मैं वहाँ से बिना बिल- भुगतान के नौ-दौ ग्यारह न हो जाऊँ!
अपना मुंह बंद किए बिल का भुगतान कर मैं अपने घर को रवाना हुआ! मैं खामोश था। कोई बाहर का ‘औतरा’ होता तो मैं उसके मुंह पर कुछ न कुछ दे मारता। लेकिन, यहाँ तो मेरा मुंह बंद करने के लिए दांत निकालने के बाद एक ‘गाज़’ (रूई का टुकड़ा) भी मेरे मुंह में ठूंस दिया गया था।
खैर, जो हुआ सो हुआ लेकिन मुझे इस बात का अफसोस है कि मेरे मुंह में अब मेरी बत्तीसी नही रही, मेरे दो मजबूत दांत इन डाक्टरों ने हलाक कर दिये हैं!
समाप्त
लेखक – अशोक परूथी “मतवाला

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें