गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

धर्म तथा विज्ञान का समन्वय इस युग की आवश्यकता है!






- प्रदीप कुमार सिंह पाल’, 
शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
            हमारे मन में प्रश्न उठता है कि यदि ईश्वर है तो संसार में इतना अज्ञान, मारा-मारी, असमानता तथा दुःख क्यों है? क्या समाज को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ विचारशील लोगों ने ईश्वर की अवधारणा को अपनी कल्पना द्वारा जन्म दिया है? जैसे बच्चों को प्रायः डराने के लिए मां कहती है कि जल्दी सो जाओ नहीं तो शैतान आकर तुम्हें उठा ले जायेगा। बालक भोला-भाला होता है वह मां की बात सच मानकर शैतान के डर से सो जाता है। इसी प्रकार अतीतकाल में गुफाओं से बाहर आकर कुछ बुद्धिमान लोगों ने कुछ कम बुद्धिमान लोगों को शिक्षा दी होगी कि बुरे काम करने से पाप होता है तथा अच्छे काम करने से पुण्य मिलता है। मानव की समझ के अनुसार प्रेरणादायी कथाओं तथा मूर्तियों-प्रतिमाओं के रूप में ईश्वर की पूजा के प्रचलन को बढ़ाया गया होगा। ऐसे बुद्धिमान लोगों की इसके पीछे लोक कल्याण की भावना रही होगी। इसी के बाद जाति के भेदभाव, रंग-भेद, अमीर-गरीब जैसी सामाजिक तथा धार्मिक कुरीतियों के युग की शुरूआत हुई होगी।
            इस अन्याय को देखकर कृष्ण की प्रखर प्रज्ञा व्याकुल हो उठी होगी। संसार में फैले अन्याय को रोकने तथा न्याय की स्थापना के लिए उस युग में न्यायालय के अभाव में उन्हें अन्तिम विकल्प के रूप में महाभारत युद्ध की रचना करनी पड़ी होगी। किसी रोगी, वृद्ध, मृत्यु तथा धार्मिक पाखण्ड को देखकर सिद्धार्थ जैसे बालक की मानवीय संवेदना जागी होगी। सिद्धार्थ इस अज्ञान से मनुष्य को मुक्त कराने के लिए ज्ञान की खोज में निकल पड़े। वह वर्तमान तथा सत्य में ठहर गये
और वह बुद्ध बन गये। बुद्ध ने सारे संसार को सन्देश दिया कि सभी मनुष्य एक समान है। इसी प्रकार ईशु ने अपना बलिदान देकर करूणा का सन्देश दिया। मोहम्मद ने आपस में एक दूसरे का खून बहाने वाले काबिलों को भाईचारे का सन्देश दिया। नानक ने स्वार्थ में लिप्त समाज को त्याग का सन्देश देकर उबारा। इसी प्रकार अनेक महापुरूषों ने संसार के अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों की भलाई के लिए अपना जीवन लगा दिया।
            मनुष्य की विचारशील तथा प्रगतिशील आस्था यह मानती है कि इस सारी सृष्टि को बनाने वाला एक परमपिता परमात्मा है। सभी धर्मों का स्त्रोत एक परमपिता परमात्मा है। इस सृष्टि की रचना परमपिता परमात्मा ने प्राणी मात्र के लिए की है। इसके विपरीत विज्ञान ऐसा नहीं मानता है। कभी एक वैज्ञानिक ने अपनी खोज के आधार पर कहा कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है उसके कुछ वर्षों बाद दूसरे वैज्ञानिक ने और गहराई से खोज करके दुनिया के सामने इस सत्य को उजागर किया कि नहीं पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है। यह एक सत्य है कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है। वह निरन्तर ब्रह्माण्ड का किस प्रकार निर्माण हुआ इसकी खोज-अनुसन्धान में लगा हुआ है। विज्ञान में निरन्तर खोजों-अनुसन्धानों द्वारा विकास हुआ है। प्रगतिशील विचार होने के कारण विज्ञान सदैव पुरानी खोजों से निरन्तर आगे की ओर बढ़ता जा रहा है। इसी प्रकार धर्म को भी प्रगतिशील होना चाहिए उसे पुरानी परम्पराओं, मान्यताओं तथा अन्धविश्वासों में ही नहीं बंधे रहना चाहिए। धर्म तथा विज्ञान का समन्वय इस युग की आवश्यकता है। धर्म के मायने हैं धारण करना। अर्थात सामाजिक तथा धार्मिक गुणों को जीवन में धारण करना। जो जोड़े वह धर्म है तथा जो तोड़े वह अधर्म है। सत्य की निरन्तर स्वतंत्र खोज ही धर्म का परम उद्देश्य है। मेरा धर्म, तेरा धर्म तथा उसका धर्म की संकीर्ण सोच को अब त्यागने में ही मानव जाति का हित है। आज के युग में व्यापक सोच यह है कि ईश्वर एक है, धर्म एक है तथा मानव जाति एक है।


            पूजा-पाठ, प्रेयर, सबद-कीर्तन, इबादत करते हुए ईमानदारी से अपना कार्य-व्यवसाय करने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ श्रेणी में आता है। साथ ही जो व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व को न मानते हुए अपने कार्य-व्यवसाय को यदि ईमानदारी के साथ करता है वह भी मनुष्यता की श्रेष्ठ श्रेणी में आता है। धर्म के नाम पर दूसरों की जान लेने वाले व्यक्ति का कोई धर्म नहीं होता। एक धर्म के व्यक्ति द्वारा दूसरे धर्म के व्यक्ति की जान लेना अमानवीय कृत्य है। ऐसे हिंसक व्यक्ति सामाजिकता, कानून-न्याय तथा व्यवस्था के विरोधी होते हैं। महात्मा गांधी से किसी व्यक्ति ने पूछा कि क्या ईश्वर का अस्तित्व है? इस प्रश्न के जवाब में महात्मा गांधी ने कहा कि ईश्वर है या नहीं है, इस बारे में मैं दावे के साथ कुछ नहीं कह सकता। लेकिन मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि सत्य ही ईश्वर है। नास्तिक व्यक्ति कुदरत अर्थात प्रकृति के नियमों का सम्मान करते हुए अपना जीवन व्यतीत करता है। भारतीय संविधान में आस्तिक तथा नास्तिक दोनों को समान अधिकार प्राप्त हैं। संविधान दोनों का बराबर से सम्मान करता है। इसलिए संविधान दोनों को अपने-अपने विचार के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
            मानव इतिहास में विश्व में राजनैतिक विचारधारा के कारण कम वरन् धर्म के नाम पर ही सबसे ज्यादा लड़ाइयाँ तथा युद्ध हुए हैं। धर्म के नाम पर हम रोजाना जो भी घण्टों पूजा-पाठ करते हैं वे भगवान को याद करने के लिए कम भगवान को भुलाने के ज्यादा होते हैं। रामायण में लिखा है परहित सरिस धर्म नही भाई, परपीड़ा नहीं अधमाई। अर्थात दूसरों का भला करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है तथा दूसरों का बुरा करने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है। गीता, त्रिपटक, बाईबिल, कुरान, किताबे-अकदस में जो लिखा है उसकी गहराई में जाकर उसे जानना तथा उसके अनुसार अपना कार्य-व्यवसाय करना ही पूजा है। देश संविधान तथा कानून से चलता है इसके अनुसार जीवन यापन करना भी हमारा कर्तव्य है।
     




   मानवीय गुण दया, करूणा, त्याग, प्रेम, एकता, मित्रता, समता, न्याय आदि सर्वभौमिक हंै। गुणात्मक शिक्षा के द्वारा हमें एक ऐसी जीवन शैली विकसित करनी है जो 21वीं सदी के वैश्विक युग में मानव जाति के लिए सर्वमान्य हो। भारत के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री टीएस ठाकुर के अनुसार देश-दुनिया में बढ़ती असहिष्णुता चिन्ता का विषय है। संविधान के अनुसार इंसान और भगवान के बीच रिश्ता बेहद निजी होता है, इससे किसी अन्य का कोई मतलब नहीं होना चाहिए। उनका कहना था, ‘मेरा धर्म क्या है? मैं अपने ईश्वर के साथ कैसे जुड़ता हूँ? उनकी इबादत किस तरह से करता हूँ? यह बेहद निजी मामला है। मेरे धार्मिक मामलों में दखल देने का किसी को कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने समाज में शांति के लिए सहिष्णुता की भावना विकसित करने पर जोर दिया।


 मनुष्य की दो सच्चाई हैं - पहला मनुष्य शरीर धारी है तथा दूसरा मनुष्य को विचारशील चेतना भी मिली है। शरीर थक कर सो जाता है लेकिन चेतना उस समय भी जाग्रत रहती है। चेतना के अस्तित्व का प्रमाण हमें सोते समय दिखाई देने वाले सपनों से लग सकता है। हमारी चेतना ही हमें सपनों के संसार में ले जाती है। मनुष्य की चेतना के दायरे के अनुरूप उसके लक्ष्य निर्धारित होते हंै। यदि हमारा लक्ष्य अपने परिवार तक सीमित है तो हमारी चेतना सांसारिक व्यक्ति की होगी। यदि हमारा लक्ष्य प्रदेश में एकता स्थापित करने का है तो हमारी चेतना का स्तर प्रदेश स्तरीय होगा। यदि हम देश में एकता करना चाहते हंै तो हमारी राष्ट्रीय स्तर की चेतना होगी। यदि हम सारे विश्व में एकता करना चाहते हंै तो हमारी चेतना का स्तर विश्वव्यापी होगा। आज विश्वव्यापी चेतना की आवश्यकता है। चेतना को हम दृष्टिकोण, प्रज्ञा, मन, सोच, संवेदना, अस्तित्व, चिन्तन, आत्मीयता, मनुष्यता किसी भी नाम से पुकार सकते हैं। मनुष्य का जन्म तो सहज होता है लेकिन चेतना का विकास निरन्तर प्रयास द्वारा किया जाता है।
            जिस प्रकार परिवार में सबकी अलग-अलग सोच होती है इसी प्रकार वृहत परिवार संसार में भी अलग-अलग सोच के लोग रहते हैं। जिस प्रकार एक पिता परिवार के प्रत्येक सदस्य की भावना तथा विकास का ख्याल रखता है उसी प्रकार विश्व रूपी परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को सत्य, चेतना, संविधान और न्याय-कानून का ज्ञान देकर ही उसके अज्ञान को दूर किया जा सकता है। हमारा फोकस विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को बिना जाति-धर्म का भेदभाव किये अपना मित्र बनाने का होना चाहिए। हमारे जीवन का लक्ष्य इस युग में विश्व एकता का होना चाहिए। अब केवल भारत की एकता से काम नहीं चलेगा वरन् सारे विश्व की एकता आवश्यक है। तभी हम विश्व से आतंकवाद तथा युद्धों को समाधान निकाल पायेंगे। इस विश्वव्यापी लक्ष्य को पाने के लिए प्रत्येक नास्तिक तथा आस्तिक दोनों तरह के चिन्तन वाले व्यक्तियों की आवश्यकता है। किसी का सहयोग उसे हम मित्र बनाकर ही ले सकते हैं।
            आज का प्रगतिशील धर्म तथा विकसित चेतना यह कहती है कि सभी पवित्र पुस्तकों-गीता, त्रिपटक, बाइबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे-अकदस का ज्ञान क्रमशः कृष्ण, बुद्ध, ईशु, मोहम्मद, नानक तथा बहाउल्लाह के माध्यम से युग-युग की आवश्यकतानुसार सम्पूर्ण मानव जाति के मार्गदर्शन के लिये एक ही परमात्मा ने भेजा है। एक ही परमात्मा के द्वारा भेजी गई इन पवित्र पुस्तकों गीता, त्रिपटक, बाइबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे-अकदस की मूल शिक्षायें समस्त मानव जाति को मुख्यतया एकता की शिक्षा देतीं हैं, साथ ही गीता द्वारा न्याय, त्रिपटक द्वारा समता, बाइबिल द्वारा करूणा, कुरान द्वारा भाईचारा, गुरू ग्रन्थ साहिब द्वारा त्याग तथा किताबे-अकदस द्वारा हृदय की एकता की शिक्षायें युग-युग की सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार एक ही परमात्मा ने भेजी है। सभी बालकों के मस्तिष्क व हृदय में परिवार एवं स्कूली शिक्षा के द्वारा न्याय, समता, करूणा, भाईचारा, त्याग तथा हृदय की एकता के इन सभी ईश्वरीय गुणों को बाल्यावस्था से ही रोपित करना चाहिए। ताकि हर बालक पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति बन सके। किसी भी पूजा स्थल मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरूद्वारा, बुद्ध विहार में की गई प्रार्थना को सुनने वाला परमात्मा एक ही है इसलिए एक ही छत के नीचे अब सब धर्मों की प्रार्थना होनी चाहिए।
            एक तरफ दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहां के लोग गरीबी और तंगहाली में जीते हैं और वहीं दूसरी ओर दुनिया में दौलतमंद देशों की भी कोई कमी नहीं है। विश्व के एक प्रतिशत लोगों में से कुछ के पास एक देश की इकोनाॅमी से भी ज्यादा संपत्ति है। मेरा सुझाव है कि जिस प्रकार गरीबी की रेखा निर्धारित है उसी प्रकार अमीरी की भी सीमा रेखा निर्धारित होनी चाहिए। ताकि कोई आदमी इतना अमीर न हो सके कि वह सारे विश्व को, लोकतंत्र को, मानव जाति को अपनी अकूत दौलत की ताकत से खरीद ले। कुदरत की सम्पदा पर इस धरती पर पलने वाले प्रत्येक जीव का अधिकार है। धरती की संसाधनों का सदुपयोग सारी मानव जाति तथा धरती पर पलने वाले जीवों के हित के लिए होना चाहिए न कि घातक शस्त्रों की होड़ के लिए। परमाणु शस्त्रों की होड़ केवल मनुष्य के अस्तित्व के लिए ही नहीं वरन् धरती पर पलने वाले प्रत्येक जीव तथा पर्यावरण के लिए खतरनाक है। विश्व के प्रत्येक नागरिक तथा राष्ट्र पर समान रूप से लागू होने वाले प्रभावशाली विश्व कानून हमें बनाना होगा। इसके लिए धरती की सरकार, विश्व संसद तथा विश्व न्यायालय की अतिशीघ्र आवश्यकता है। मानव जाति के अस्तित्व को बचाने का यहीं एकमात्र विकल्प है।




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