सोमवार, 16 जनवरी 2017

आओ मिलकर दिए जलाए








भारतीय संस्कृति में नवम्बर माह का विशेष महत्व् है,क्योंकि यह महीना प्रकाशपर्व दीपावली लेकर आता है.दीपावली अँधेरे पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है और यह एक सुखद संयोग ही है कि एक वर्ष पहले आपकी प्रिय पत्रिका ” अटूट बंधन “का प्रकाशन इसी माह की पहली तारीख से शुरू किया गया था.भौतिक रूप से दीपावली हर साल सिर्फ एक साँझ की रौशनी लेकर आती है और साल भर के लिए चली जाती है,किन्तु प्रतीकात्मक रूप से उसका सन्देश चिरकालिक है.प्रतिवर्ष दीपपर्व हमें यही सन्देश देता है कि अँधेरा चाहे कितना ही सघन क्यों न हो,चाहे कितना ही व्यापक क्यों न हो और चाहे कितना ही भयावह क्यों न हो,लेकिन उसे पराजित होना ही पड़ता है.एक छोटा सा दीप अँधेरे को दूर करके प्रकाश का साम्राज्य स्थापित कर देता है.

अंधेरे का खुद का कोई अस्तित्व नहीं होता,खुद का कोई बल नहीं होता,खुद की कोई सत्ता नहीं होती.अँधेरा प्रकाश के अभाव का नाम है और सिर्फ उसी समय तक अपना अस्तित्व बनाये रख सकता है,जब तक प्रकाश की मौजूदगी न हो.अँधेरा दिखाई भले ही बहुत बड़ा देता हो,लेकिन इतना निर्बल होता है कि एक दीप जलते ही तत्काल भाग खड़ा होता है.दीपक प्रकाश का प्रतीक है और सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है। दीपक से हम ऊंचा उठने की प्रेरणा हासिल करते हैं।
शास्त्रों में लिखा गया है ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’, अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर चलने से ही जीवन में यथार्थ तत्वों की प्राप्ति सम्भव है। अंधकार को अज्ञानता, शत्रु भय, रोग और शोक का प्रतीक माना गया है। देवताओं को दीप समर्पित करते समय भी ‘त्रैलोक्य तिमिरापहम्’ कहा जाता है, अर्थात दीप के समर्पण का उद्देश्य तीनों लोकों में अंधेरे का नाश करना ही है।
एक साल पहले अटूट बंधन परिवार ने भी समाज से निराशा के अँधेरे को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा का साम्राज्य स्थापित करने के लिए ” अटूट बंधन ” पत्रिका के रूप में एक नन्हा सा दीप जलाया था,जो आज देश के 18 राज्यों में ज्ञानमयी प्रकाश का केंद्र बन चुका है.नन्हे से दीपक में सजाई बाती की रौशनी चारों तरफ,निखरी हुई है. हम ” अटूट बंधन ” से जुड़े सभी पाठकों,लेखकों और विज्ञापनदाताओं के ह्रदय से आभारी हैं,जो निरंतर अपना स्नेहरूपी तेल इस दिए में डालते रहे और यह दीप अनवरत जलता रहा.तमाम आंधियां आयीं,बड़े-बड़े तूफ़ान आये,लेकिन आप सबके स्नेह ने इस दीप की रौशनी मद्धिम नहीं पड़ने दी.
आज बाहर के अँधेरे से ज्यादा भीतर का अँधेरा मनुष्य को दुखी बना रहा है.विज्ञानं ने बाहर की दुनिया में तो इतनी रौशनी फैला दी है,इतना जगमग कर दिया है कि बाहर का अँधेरा अब उतना चिंता का विषय नहीं रहा,लेकिन उसी विज्ञानं की रौशनी की चकाचौंध में भीतर की दुनिया हीन से हीनतर बनती
जा रही है,जिसका समाधान तलाश पाना विज्ञानं के बस की बात नहीं है.भीतर के अँधेरे से मानव जीवन की लड़ाई बड़ी लम्बी है.जब भीतर का अँधेरा छंटता है.तो बाहर की लौ जगमगा उठती है ,नहीं तो बाहर का घोर प्रकाश भी भीतर के अँधेरे को दूर नहीं कर पाता. भीतर की दुनिया का अँधेरा सिर्फ सकारात्मक सोच और प्रेरक विचारों से ही दूर किया जा सकता है.भीतर का अँधेरा दूर करने के लिए आत्मतत्व को पहचानना जरूरी है और ” अटूट बंधन ” का सिर्फ यही मकसद है कि सकारात्मक चिंतन का इतना प्रचार-प्रसार हो कि पूरी धरा से निराशा के अँधेरे का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाये.हमारी आपसे यही अपील है कि एक दिया हमने जलाया है और आप भी हमारे साथ आइये,एक दिया आप भी जलाइए और दीप से दीप जलाने का यह सिलसिला तब तक चलता रहे,तब तक मानव मन से अँधेरे का समूल नाश नहीं हो जाता |
आप सभी को दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
ओमकार मणि त्रिपाठी -प्रधान संपादक अटूट बंधन ग्रुप





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