बुधवार, 11 जनवरी 2017

फुंसियाँ





सुधीन्द्र,
जब यह पत्र तुम्हें मिलेगा , मैं तुम्हारे जीवन से बहुत दूर जा चुकी हूँगी । मेरे पैरों में इतने वर्षों से बँधी जं़जीर खुल चुकी होगी । मेरे पैर परों-से हल्के लग रहे होंगे और किसी भी रास्ते पर चलने के लिए स्वतंत्र होंगे ।
चलने से पहले तुम से चंद बातें कर लेना ज़रूरी है । कल रात फिर मुझे वही सपना आया । तुम मुझे अपने दफ़्तर की किसी पार्टी में ले गए हो । सपने में जाने-पहचाने लोग हैं । परस्पर अभिवादन और बातचीत हो रही है कि अचानक सबके चेहरों पर देखते-ही-देखते फुंसियाँ उग आती हैं । फुंसियों का आकार बढ़ता चला जाता है । फुंसियों की पारदर्शी झिल्ली के भीतर भरा मवाद साफ़ दिखने लगता है । और तब एक भयानक बात होती है । उन फुंसियों के भीतर मवाद में लिपटा तुम्हारा डरावना चेहरा नज़र आने लगता है । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते हैं । जैसे तुम तुम न हो कर कोई भयावह यमदूत हो । असंख्य फुंसियों के भीतर असंख्य तुम । मानो बड़े-बड़े दाँतों वाले असंख्य यमदूत… डर के मारे मेरी आँख खुल गई । दिसंबर की सर्द रात में भी मैं पसीने से तरबतर थी ।

” तुमने ऐसा सपना क्यों देखा ? ” जब भी मैं इस सपने का ज़िक्र तुमसे करती तो तुम मुझे ही कटघरे में खड़ा कर देते ।
” क्यों क्या ? क्या सपनों पर मेरा वश है ? ” मैं कहती । तुम्हारा बस चलता तो तुम मेरे सपने भी नियंत्रित कर लेते !
तुम कहते हो कि यह सपना मेरे अवचेतन मन में दबी हुई कोई कुंठा है, अतीत की कोई स्मृति है । दुर्भाग्य यह है कि मेरी तमाम कुंठाओं के जनक तुम ही हो । मेरे भूत और वर्तमान में तुम्हारे ही भारी क़दमों की चहलक़दमी की आवाज़ गूँज रही है ।
मुड़कर देखने पर लगता है कि मामूली-सी बात थी । मेरे गाल पर अक्सर उग आने वाली चंद फुंसियाँ ही तो इसके जड़ में थीं । लेकिन क्या यह बात वाक़ई इतनी मामूली-सी थी ? तुमने ‘ आइसबर्ग ‘ देखा है ? उसका केवल थोड़ा-सा हिस्सा पानी की सतह के ऊपर दिखता है । यदि कोई अनाड़ी देखे तो लगेगा जैसे छोटा-सा बर्फ का टुकड़ा पानी की सतह पर तैर रहा है । पर ‘ आइसबर्ग ‘ का असली आकार तो पानी की सतह के नीचे तैर रहा होता है जिससे टकरा कर बड़े-बड़े जहाज़ डूब जाते हैं । जो बात ऊपर से मामूली दिखती है उसकी जड़ में कुछ और ही छिपा होता है। बड़ा और
भयावह ।
मेरे चेहरे पर अक्सर उग आने वाली फुंसियों से तुम्हें चिढ़ थी । मेरा उन्हें सहलाना भी तुम्हें पसंद नहीं था । बचपन से ही मेरी त्वचा तैलीय थी । मेरे चेहरे पर फुंसियाँ होती रहती थीं । मुझे उन्हें सहलाना अच्छा लगता था ।
” फुंसियों से मत खेलो । मुझे अच्छा नहीं लगता । ” तुम ग़ुस्से से कह उठते ।
” क्यों ? ” आख़िर यह छोटी-सी आदत ही तो थी ।
” क्यों क्या ? मैंने कहा, इसलिए ! ”
” पर तुम्हें अच्छा क्यों नहीं लगता ? ”
तुम कोई जवाब नहीं देते पर तुम्हारा ग़ुस्सा बढ़ता जाता । फिर तुम मुझ पर चिल्लाने लगते । तुम्हारा चेहरा मेरे सपने में आई फुंसियों में बैठे यमदूतों-सा हो जाता । तुम चिल्ला कर कुछ बोल रहे होते पर मुझे कुछ भी सुनाई नहीं देता । मैं केवल तुम्हें देख रही होती । तुम्हारे हाथ-पैरों में किसी जंगली जानवर के पंजों जैसे बड़े-बड़े नाख़ून उग जाते । तुम्हारे विकृत चेहरे पर भयावह दाँत उग जाते । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते । तुम मेरे चेहरे की ओर इशारा कर के कुछ बोल रहे होते और तब अचानक मुझे फिर से सब सुनाई देने लगता ।
” भद्दी, बदसूरत कहीं की ।” तुम ग़ुस्से से पागल हो कर चीख़ रहे होते ।
शायद मैं तुम्हें शुरू से ही भद्दी लगती थी , बदसूरत लगती थी । फुंसियाँ तो एक बहाना थीं । शायद यही वजह रही होगी कि तुम्हें मेरी फुंसियाँ और उन्हें छूने की मेरी मामूली-सी आदत भी असहनीय लगती थी । जब हम किसी से चिढ़ने लगते हैं, नफ़रत करने लगते हैं तब उसकी हर आदत हमें बुरी लगती है । यदि तुम्हें मुझ से प्यार होता तो शायद तुम मेरी फुंसियों को नज़रंदाज़ कर देते । पता नहीं तुमने मुझसे शादी क्यों की ?
शायद इसलिए कि मैं अपने अमीर पिता की इकलौती बेटी थी । मेरे पापा को तुमने चालाकी से पहले ही प्रभावित कर लिया था । उनकी मौत के बाद उनकी सारी जायदाद तुम्हारे पास आ गई और तुम अपना असली रूप दिखाने लगे ।
” तुम भी पक्की ढीठ हो । तुम नहीं बदलोगी । ” तुम अक्सर किसी-न-किसी बात पर अपने विष-बुझे बाणों से मुझे बींधते रहते ।
सच्चाई तो यह है कि शादी के बाद से अब तक तुमने अपनी एक भी आदत नहीं बदली — सिगरेट पीना , शराब पीना , इंटरनेट पर पाॅर्न-साइट्स देखना , दरवाज़ा ज़ोर से बंद करना , बाथरूम में घंटा-घंटा भर नहाते रहना , बीस-बीस मिनट तक ब्रश करते रहना , आधा-आधा घंटा टाॅयलेट में बैठ कर अख़बार पढ़ना , रात में देर तक कमरे की बत्ती जला कर काम करते रहना , सारा दिन नाक में उँगली डाल कर गंदगी निकालते रहना , अजीब-अजीब से मुँह बनाना , बिना किसी बात पर हँस देना … ।
तुमने अपनी एक भी आदत नहीं बदली । केवल मैं ही बदलती रही । तुम्हारी हर पसंद-नापसंद के लिए । तुम्हारी हर ख़ुशी के लिए ।
जो तुम खाना चाहते थे, घर में केवल वही चीज़ें बनती थीं । टी.वी. के ‘ रिमोट ‘ पर तुम्हारा क़ब्ज़ा होता । जो टी.वी. कार्यक्रम तुम्हें अच्छे लगते थे , मैं केवल वे ही प्रोग्राम देख सकती थी । जो कपड़े तुम्हें पसंद थे , मैं केवल वे ही कपड़े पहन सकती
थी । मेरा जो हेयर-स्टाइल तुम्हें पसंद था , मैं केवल उसी ढंग से अपने बाल सँवार सकती थी । घर में केवल तुम्हारी मर्ज़ी का साबुन, तुम्हारी पसंद के ब्रांड का टूथपेस्ट और तुम्हें अच्छे लगने वाले शैम्पू ही आते थे । खिड़की-दरवाज़ों के पर्दों का रंग तुम्हारी इच्छा का होता । ड्राइंगरूम और बेडरूम का फ़र्नीचर और उनकी साज-सजावट ,
सब तुम्हारी मर्ज़ी का था । बिस्तर पर बिछी चादर का रंग , चाय की पत्ती का ब्रांड —
हर जगह तुम्हारी इच्छा ही सर्वोपरि थी ।
जो तुम्हें अच्छा लगे, मुझे वही करना था । जो तुम्हें पसंद हो , मुझे वही कहना-सुनना था । जैसे मैं मैं नहीं रह गई थी , केवल तुम्हारा विस्तार भर थी ।
डाइनिंग-टेबल पर तुम्हारी एक निश्चित कुर्सी थी । बेडरूम में तुम्हारे बैठने की एक निश्चित जगह थी जहाँ कोई और नहीं बैठ सकता था । घर में यदि कोई चीज़ अनिश्चित थी तो वह मैं थी — अनिश्चित और अधर में लटकी हुई ।
खाना मैं बनाती थी , कपड़े-लत्ते मैं धोती थी , बर्तन मैं साफ़ करती थी , झाड़ू-पोंछा मैं लगाती थी । तुम रोज़ आॅफ़िस से आकर ‘ आज बहुत थक गया हूँ ‘ कहते और टाँग फैला कर बिस्तर पर लेट जाते और अपना पसंदीदा टी.वी. प्रोग्राम चला लेते । एक गिलास पानी भी तुम ख़ुद उठकर नहीं ले सकते थे । फिर भी थकते सिर्फ तुम थे ।
शिकायत सिर्फ तुम कर सकते थे । उलाहने सिर्फ तुम दे सकते थे । बुरी सिर्फ मैं थी ।
कमियाँ सिर्फ मुझमें थीं । दूध के धुले, अच्छाई के पुतले सिर्फ तुम थे । ‘ हेड आॅफ़ द
फ़ैमिली ‘ के नाम पर तुम जो चाहो, करने के लिए स्वतंत्र थे ।
इन सब के बावजूद मैं यह रिश्ता निभाती रही । मैंने तुमसे कुछ ज़्यादा तो नहीं चाहा था । एक पत्नी अपने पति से जो चाहती है , मैं भी केवल उतना भर चाहती थी । काश, तुम भी मुझे थोड़ा प्यार दे पाते , घर के कामों में मेरा कुछ हाथ बँटाते , अपनी किसी प्यारी अदा से मेरा मन मोह ले जाते । काश , मेरा आकाश भी कभी सतरंगी हो पाता । मेरे मन की नदी में भी लहरें कभी गीत गातीं । मेरे अंतस् की बगिया को भी
कोई पुरवैया सहलाती । पर मेरे अंतस् की बगिया में चक्रवात आते रहे । मेरे मन की नदी में भयावह सूखा पड़ा रहा । मेरा आकाश बंजर बना रहा ।
असल में तुमने मुझसे कभी प्यार किया ही नहीं । मैं केवल घर का काम करने वाली मशीन थी , घर की नौकरानी थी जिसे रात में भी तुम्हारी ख़ुशी के लिए बिस्तर पर रौंदा जाता था । तुम्हारे लिए प्यार बिस्तर का महाभारत भर था । किसी दिन मेरी इच्छा होती तो तुम बुरा-सा मुँह बनाकर कह देते — ” आज नहीं । कल सुबह मेरी एक ज़रूरी मीटिंग है । ” पर दिन भर की थकी होने पर भी मुझे तुम्हारी इच्छा के लिए , तुम्हारी वासना की पूर्ति के लिए समर्पण करना ही पड़ता था । बिस्तर और रसोई के गणित से परे भी स्त्री होती है , यह बात तुम्हारी समझ से बाहर थी ।
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मेरे चेहरे पर उगी फुंसियों से तुम्हें चिढ़ थी । पर उन फुंसियों का क्या जो हमारे सम्बन्धों में उग आईं , जो अब फोड़े बन गए हैं , नासूर बन गए हैं ।
तुम चाहते थे कि मैं अपनी फुंसियों पर शर्मिंदा रहूँ । क्यों? क्या चेहरे पर फुंसियाँ
हो जाना कोई अपराध है जो तुम मुझे सज़ा देने पर तुले रहे ? तुम्हारी इच्छा के लिए मैंने ‘हार्मोन थेरेपी’ कराई । सुबह-शाम फुंसियों के दाग़ हल्की करने वाली क्लियरसिल और दुनिया भर की न जाने कौन-कौन-सी क्रीमें लगाती रही । जबकि तुम अपने पर्स में अपने आॅफ़िस की युवा महिला कलीग्स की फ़ोटो रख कर घूमते रहे । इंटरनेट पर अजनबी लड़कियों से चैटिंग करते रहे, फ़्लर्ट करते रहे । पाॅर्न-साइट्स देखते रहे ।
तुम्हारे चेहरे पर भी एक मस्सा उगा हुआ है । मैंने तो कभी इस बात पर एतराज़ नहीं जताया कि वहाँ वह मस्सा क्यों है ? मैंने तो कभी यह नहीं कहा कि उस मस्से की वजह से तुम बदसूरत लगते हो ।
असल में तुम्हारे लिए मेरे चेहरे पर उगी फुंसियाँ मुझे नीचा दिखाने का बहाना भर थीं । अब, जबकि मेरे चेहरे पर फुंसियाँ नहीं उग रही हैं , तुम्हें मेरे चेहरे से कोई लेना-देना नहीं है । तुमने एक बार भी नहीं कहा कि मेरा चेहरा अब कैसा लगता है । पर तुम्हारी उपेक्षा ने सब कुछ कह दिया है ।
आज तुमने किसी और बहाने से मुझ पर हाथ भी उठाया । घृणा का बरगद जब फैलने लगता है तो उसकी जड़ें सम्बन्धों की मिट्टी में बहुत गहरे तक अपने पाँव पसार लेती हैं । पता नहीं मैं इतने साल तुम्हारे साथ कैसे रह गई । अपना मन मार कर । अपना अस्तित्व मिटा कर । पर अब बहुत हो गया । मुझे तुम्हारे हाथों पिटना मंज़ूर नहीं ।
तुम एक रुग्ण मानसिक अवस्था हो और मुझे अब इस रुग्ण मानसिक अवस्था का हिस्सा और नहीं बनना । हमारे पास जीने के लिए एक ही जीवन होता है और मुझे अब यूँ घुट-घुट कर और नहीं जीना । आज मैं स्वयं को तुमसे मुक्त करती हूँ ।
एक बात और । मुझे अपने चेहरे पर उगी हुई फुंसियाँ अच्छी लगती थीं । और वे सभी लोग अच्छे लगते थे जो उन फुंसियों के बावजूद मुझे चाहते थे , मुझसे प्यार करते थे । प्यार, जो तुम मुझे कभी नहीं दे सके ।
— नेहा ।

सुशांत सुप्रिय 


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