गुरुवार, 3 नवंबर 2016

मुखरित संवेदनाएं - संस्कारों को थाम कर अपने हिस्से का आकाश मांगती स्त्री के स्वर

                                   





                 लेखिका एवम कवयित्री     किरण सिंह  जी का प्रथम काव्य संग्रह " मुखरित संवेदनाएं " एक नज़र में ही मुझे विवश करने लगा  की मैं उस पर कुछ लिखूँ , और पूरा पढने के बाद मैं अपने आप को रोक न सकी | वैसे किरण सिंह जी के आत्मीय स्वाभाव व् उनकी कविताओं से मैं फेसबुक के माध्यम से पहले से ही परिचित थी | उनकी कई  कवितायें व् कहानियां हमारे अटूट बंधन ग्रुप की मासिक पत्रिका " अटूट बंधन " व् दैनिक समाचारपत्र " सच का हौसला में प्रकाशित हो चुकी हैं व् पाठकों द्वारा सराही जा चुकी हैं | इस भावनात्मक जुड़ाव के कारण उनके पहले काव्य संग्रह पर कुछ लिखना  मुझे आल्हादित कर  रहा है |

शुरुआत करती हूँ संग्रह के पहले अंश " अपनी बात से " जैसा की किरण जी ने लिखा है की छोटी उम्र में विवाह व् घर गृहस्थी के ताम - झाम में वो भूल ही गयी की उनके अन्दर जाने कितनी कवितायें सांस ले रही हैं | जो जन्म लेना चाहती है | जाहिर सी बात है जब कांपते हाथों से उन्होंने कलम थामी तो उदेश्य बस उस बेचैनी का समाधान ढूंढना था जो हर रचनात्मक व्यक्ति अपने अन्दर महसूस करता है
| तभी तो अपनी पहली कविता में वह प्रश्न करती हैं " किस पर  लिखूँ मैं ?" वास्तव में जब मन में इतना कुछ एक साथ चल रहा हो तो एक विषय का चयन कितना दुष्कर हो जाता है | पर वो शीघ्र ही इस झिझक से बाहर आ कर मजबूती से अपनी बात रखती हैं | उन्होंने अपनि सम्वेद्नाओ को कई भागों में बांटा है जिस पर मैं क्रम से प्रकाश  डालना चाहूंगी |

मुखरित संवेदनाएं 
                     यहाँ किरण जी ने अपने लेखकीय जीवन  के शुरूआती दौर  की कवितायें रखी हैं | जहाँ एक अनजानी राह पर जाने की झिझक भी है , संकल्प भी है और सब से बढ़कर कर स्वयं को ढूँढने की बेचैनी है | इस खंड की अंतिम कविता " मैं " तक आते - आते वो इसका हल भी ढूढ़ लेती हैं  और उद्घोष करती हैं .........

               " किरने आशाओं  की मैं 
                   मैं स्वयं की स्वामिनी  हूँ "| 

नारी संवेदना के स्वर 
                                   किरण जी के काव्य संग्रह के दूसरे व् प्रमुख खंड  " नारी संवेदना के स्वर " की कविताओं को बार - बार पढने पर उसमें उस स्त्री का अक्स दिखाई देता है जो हमारे देश के छोटे शहरों , गांवों और कस्बों से निकल कर आई है | जो महानगरों की स्त्री की तरह पुरुष विरोधी नहीं है | या यूँ कहिये वो मात्र विरोध करने के लिए विरोध नहीं करती | वो पुरुष से लड़ते - लड़ते पुरुष नहीं बनना चाहती है | उसे अपने  स्त्रियोचित गुणों पर गर्व है | दया ममता करुणा  हो या मेहँदी चूड़ी और गहने वो सब को सहेज कर आगे बढ़ना चाहती है | या यूँ कहें की वो अपनी जड़ों से जुड़े रह कर अपने हिस्से का आसमान चाहती है | वो अपने पिता पति और पुत्र को कटघरे में नहीं घसीटती बल्कि  सामाजिक व्यवस्था  और अपने ही कोमल स्वाभाव के कारण स्वयमेव अपना प्रगति रथ रोक देने के कारण उन्हें दोष मुक्त कर देती है | वो कहती है ...........

क्यों दोष दूं तुम्हे 
मैं भी तो भूल गयी थी 
स्वयं 
तुम्हारे प्रेम में 
                  आज स्त्री विमर्श के नाम पर जो लिखा जा रहा है  | वो बहुत उग्र है | जिस  तरह से स्त्री खून के बदले खून मांगती है , लिव इन या बेवफाई से उसे गुरेज नहीं है | वो पुरुषों से कंधे से कन्धा मिला कर चलने में यकीन नहीं करती बल्कि सत्ता पलट कर पुरुष  से ऊपर हो जाना चाहती हैं | जिस को पढ़ कर सहज विश्वास नहीं होता | क्योंकि हमें अपने आस - पास ऐसी स्त्रियाँ नहीं दिखती | हो सकता है ये भविष्य हो पर किरण जी की कवितायें आज का यथार्थ लिख रही हैं | जहाँ संवेदनाएं इतनी इस कदर मरी नहीं हैं | पर किरण जी की कवितायें एक दबी कुचली नारी के स्वर नहीं है | वो अपने हिस्से का आसमान भी मांगती हैं पर प्रेम और समन्वयवादी दृष्टिकोण के साथ ..........

भूल गयी थी तुम्हारे प्रेम में अपना 
अस्तित्व
और निखरता गया मेरा 
स्त्रीत्व 
खुश हूँ आज भी 
पर 
ना जाने क्यों 
लेखनी के पंख से उड़ना चाहती हूँ 
मुझे मत रोको 
मुझे 
स्वर्ण आभूषण  नहीं  
आसमान चाहिए 

युग चेतना एवं उद्बोधन 
                                         काव्य संग्रह के इस खंड में उनकी आत्मा की बेचैनी व् समाज के लिए कुछ करने की चाह स्पष्ट रूपसे झलकती है | .........

सीख लें हम बादलों से 
किस पर गरजना है 
किस पर बरसना है 
किसको दिखाना है 
किसको छुपाना है 

और ...........

पीढा चढ़ कर ऊंचा बन रहे 
आत्म प्रशंसा आप ही कर रहे 
झाँक रहे औरों के घर में 
नहीं देखते अपनी करनी 
सूप पर हंसने लगी है चलनी 

भक्ति आध्यात्म 
                                           काव्य संग्रह के इस खंड में अपने हिस्से का आसमान मांगने वाली और समाज की कुप्रथाओं से लड़ने वाली कवयित्री एक भावुक पुजारिन में तब्दील हो जाती है | जहाँ वो और उसके आराध्य के अतरिक्त कोइ दूसरा नहीं है | न जमीन न आसमान न घर न द्वार | यहाँ पूर्ण  समर्पण  की भावना है | भक्ति रस में डूबे ये गीत आत्मा को आध्यात्म की  तरफ मोड़ देते हैं | ...........

जाति  धर्म में हम उलझ कर 
मिट रहे आपस में लड़ कर 
क्यों नहीं तुम आते लेकर 
शांति चैन और अमन 
पुरुषोत्तम राम आपको शत - शत नमन 


देश प्रेम , ऋतु  रंग व् मुक्तक 
                                      काव्य संग्रह के इन छोटे छोटे खण्डों में कवियत्री ने अपनी सहज लेखनी व् विविध विषयों पर लिख लेने की  क्षमता का परिचय दिया है | कुछ गीत बहुत श्रेष्ठ बन  गए हैं ...........


" खबरिया सत्य स्वप्न बलवंत 
पिया कहीं तुम ही तो नहीं बसंत "

                                              अंत में यही कहना चाहूँगी की किरण जी का यह पहला काव्य संग्रह है  जिसमें उन्होंने घर की दहलीज लांघ कर बाहर की दुनिया के सामने मुखर होने का साहस दिखाया है | इसी कारण  इसमें जहाँ एक ओर मिटटी और भावनाओ की  सुगंध है , वहीँ कुछ हडबडाहट और दुविधा भी |भाव पक्ष बेहद मजबूत है शब्द लडखडाते भी हैं तो वह कुशल गृहणी की तरह थाम लेती है | किरण जी में प्रतिभा है , वे निरंतर लिख रही हैं  और उनका लेखन दिन - प्रतिदिन निखरता जा रहा है |  देश की ८० % महिलाओ की भावनाओ को स्वर देती " मुखरित संवेदनाएं "  के लिए किरण जी को साधुवाद | हम उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं |

वंदना बाजपेयी


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2 टिप्‍पणियां:

  1. सुदृढ़ सुंदर सार्थक सटीक समीक्षा ।
    बधाई हो किरण जी एवं वन्दना जी आपको भी ।

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  2. सटीक समीक्षा पुस्तक पढने की उत्सुकता बढाती हुई
    नीलम गुप्ता

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