रविवार, 4 सितंबर 2016

पति -पत्नी के बीच सात्विक प्रेम को बढाता है तीज







  विवाह की बस एक गाँठ दो अनजान - अपरिचित लोगोंको एक बंधन में बांध देती है जिसमें तन ही नहीं मन और आत्मा भी बंध  जाते हैं | जिससे ये प्रेम जिस्मानी नहीं रूहानी हो जाता है | वैसे भी कहते हैं जोड़े आसमान में बनाये जाते हैं | हमारे देश में तो पति पत्नी का रिश्ता जन्म - जन्मान्तर का माना जाता है |जिसके साथ जिन्दगी के हर छोटे से छोटे सुख - दुःख , अच्छे  - बुरे सब पल  बिताने हैं वो कोई अपरिचित तो नहीं हो सकता | उन दोनों को मिलाने में कोई न कोई दैवीय धागे जरूर काम करते हैं | | पति -पत्नी  बीच मनाये जाने वाले ये सारे व्रत त्यौहार उसी  सात्विक प्रेम को याद दिला कर  , प्रेम की रूहानी अनुभूति को तरोताजा कर देते हैं |

                                 इन  व्रत त्योहारों को केवल परम्परा की दृष्टि से ही नहीं देखना चाहिए | नहीं तो सारे व्रत त्यौहार बस लकीर के फ़कीर हो कर रह जायेंगे | जैसे प्राण के बिना शरीर |जब कोई स्त्री अपने पति के लिए व्रत करती है | उसकी मंगलकामना और दीर्घायु के लिए व्रत करती है तो उसे भी एक आनंद की  प्राप्ति होती  है  | ये आनद होता है " प्रेम का आनंद , समर्पण के भाव का आनंद, रिश्तों की गाँठ और मजबूत होने का आनंद  | जिसे तर्क द्वारा  सिद्ध नहीं किया जा सकता , केवल इसका अनुभव किया जा सकता है |
                                                    ये सच है की आज यह मांग उठी है है की अकेले पत्नी ही व्रत क्यों करे , पति को भी व्रत करना चाहिए | अगर पति ऐसा चाहते हैं तो वो भी व्रत कर सकते हैं | अगर केवल लकीर ही पीतनी है तो पत्नी भी व्रत न करने के लिए स्वतंत्र है | पर पति भी व्रत करे इसे  मांग के रूप में नहीं माँगा जा सकता | क्योंकि प्रेम में कोई बराबरी नहीं होती | प्रेम अभिव्यक्ति में भी नहीं | प्रेम है तो छलकेगा , तरीका वही हो यह जरूरी नहीं | बराबरी व्यापार है  है और प्रेम व्यापर से परे  | जरूरत है तो हर छोटे बड़े अवसर पर रिश्ते की गाँठ को और मजबूत करने की | पति पत्नी के रिश्ते के आत्मिक और आध्यात्मिक महत्व को समझने की और जन्म - जन्मान्तर के साथ को सुखद और प्रेमपूर्ण बनाने की |  

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