बुधवार, 21 सितंबर 2016

ये तिराहा हर औरत के सामने सदा से था है और रहेगा -







" तिराहा "एक ऐसा शब्द जो रहस्यमयी तो है ही  सहज ही आकर्षित भी करता है | हम सब अनेक बार अपने जीवन में इस तिराहे पर खुद को खड़ा पाते हैं | किसी भी मार्ग का चयन जीवन के परिणाम को ही बदल देता है | पर यहाँ  मैं बात कर रहीं हूँ वीणा वत्सल जी के उपन्यास “ तिराहा “की | जिसको मैंने अभी -अभी पढ़ा हैं | और पढने के बाद उस पर कुछ शब्द लिखने की गहरी इच्छा उत्पन्न हुई | “ तिराहा “   वीणा वत्सल सिंह जी का पहला उपन्यास है परन्तु कहीं से भी कमजोर नहीं पड़ता | कथा में सहज प्रवाह है व् लेखन में कसाव जिसके कारण पाठक उपन्यास  को पन्ने दर पन्ने पढता जाता है | आगे क्या हुआ जानने की इच्छा बनी रहती हैं |मेरा अपना मानना  है की किसी उपन्यास का सरल होना उसके लोकप्रिय होने की पहली शर्त है |
               “ तिराहा “ की कहानी तीन महिला पत्रों के इर्द गिर्द घूमती है | जहाँ एक ओर मुख्य नायिका अमृता है जो डॉक्टर होने के साथ साथ सभ्य , शालीन महिला भी है | और बेहद संकोची भी | सिद्धार्थ का प्रेम उसकी छुपी हुई प्रतिभाओं को निखारने में सहायक होता है
| वहीँ उसका  संकोच प्रेम की स्वीकारोक्ति नहीं कर पाता | पाठक नायक , नायिका का शीघ्र मिलन देखना चाहता है पर दोनों ही अपने मन की बात अस्वीकार किये जाने के भय से कह नहीं पाते हैं | अंत तक उनकी स्वीकारोक्ति का रोमांच बना रहता है | वहीँ दूसरी ओर झुनकी नाम की महिला है | जो मेहतर  टोले  में रहने वाली किसी सवर्ण की अवैध संतान है | पर वह स्वाभिमानी लड़की प्रेम में कोई आतुरता नहीं दिखाती बल्कि अपने सवर्ण प्रेमी को विवश करती है की वो मेहतर टोले के विकास के लिए कुछ करे | कहीं न कहीं झुनकी स्त्री के उस आत्मबल का प्रतीक है जो विपरीत परिस्तिथियों में टूटती नहीं अपितु  त्याग , सेवा व् आत्मसम्मान के चलते परिस्तिथियों को  बदल देती है |ये पात्र मुझे बहुत प्रभावित करता है |  तीसरा और सबसे जरूरी किरदार है सुधा का ... जिसमें न स्वाभिमान है न संकोच जिसके पास है तो बस असंख्य स्वप्न बेलगाम हसरते जिनको पाने के लिए वो कुछ भी , कुछ भी कर सकती है और ... करती भी है | उसका पतन और अंत  किसी भी कीमत पर अपनी प्रतिभा और योग्यता से ज्यादा पाने की दुखद गाथा  है |ऐसे अति महत्वकांक्षी स्त्रियों के उत्थान व् पतन को हम अपने समाज में अक्सर देखते हैं |
                      वैसे तो कहानी के अन्य पात्र भी कम महत्वपूर्ण नहीं है | वस्तुत : उपन्यास को समाज के तीन स्तरों पर साधा गया है |उच्च वर्ग , माध्यम वर्ग व् निम्न वर्ग | सबकी अपनी जीवन शैली , अपनी समस्याएं व् अपने ही प्रकार की राजनीति और सब का एक कहानी के माध्यम से सुन्दर समन्वय  | पर कहीं न कहीं मुझे लगता है कि उपन्यास की लेखिका जो स्वयं एक स्त्री हैं इस बात को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती हैं की हर स्त्री एक तिराहे पर  खडी है | वो स्त्री भले ही समाज के किसी वर्ग या जाति  से आती हो ये उसका चयन है वो किस रास्ते पर चलती है | उसी पर उसका जीवन निर्भर करता है |  हम ऐसी स्त्रियों को जानते हैं जो  पढ़ी लिखी हैं , स्वाबलंबी हैं पर संकोच की लक्ष्मण रेखा उन्हें ह्रदय की बात कहने से रोकती है | जो प्रेम तो करती है पर प्रेम को स्वीकार करने में झिझकती है ... वो भाग्यशाली हो सकती है की उसे  अपना प्रेम पति रूप में मिले या कहीं तन और कहीं मन की चक्की में पिसते हुए जीवन काटने को विवश भी | दूसरी तरफ एक स्वाभिमानी स्त्री अपने आत्मबल व् स्पष्ट सोंच के चलते विपरीत परिस्तिथियों को अपनी  इच्छा के अनुरूप बदल सकती है | या तीसरी तरफ  वह अपनी हसरतों के आगे हथियार डाल  कर पतन के उस गहरे गर्त में गिर सकती है | अमृता , झुनकी और सुधा तो केवल प्रतीक हैं | ये तिराहा हर औरत के सामने सदा से था है और रहेगा | इस तिराहे में उसे कौन सी राह चुननी है इस का फैसला स्त्री को स्वयं करना होगा | 

वीणा वत्सल जी को उनके पहले उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई व् उनके लेखन के भविष्य के लिए शुभकामनाएं

वंदना बाजपेयी 
कार्यकारी संपादक 
अटूट बंधन 
                                                  

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन समीक्षा की है आपने वंदना जी... वीणा जी को हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ!

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  2. बहुत ही अच्छी और सम्यक समीक्षा लिखी है आपने वंदना जी , आभार |

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