गुरुवार, 1 सितंबर 2016

एक अनजानी पीर


मेरे लोग कहते हैं मुझसे
तुम लौट क्यों नही आती फिर कुनबे में
वहीं खपत है तुम्हारी
वही शरण है तुम्हारी
जो घटता जाता है
वह भूल क्यों नही जाती कुनबे में
तुम पढ़ती थी जब
लड़कों के साथ मिलकर
आगे निकल गयी थी उनसे
कबड्डी में लंगड़ी फँसाती थी उनको
कुनबे ने रोका
ऐसे खेलों में लड़की खो देती है

अपने कौमार्य का साक्ष्य
छोडो अब यह सब
रजस्वला होने लगी हो
तुम खाना क्यों नही पकाती कुनबे में
तुम कॉलेज जाती हो जब
शहर भर के मजनूँ रास्ते में जमा हो जाते हैं
फिकरे कसते हैं
तुम्हारे अभी अभी सुडौल होते स्तनों और नितम्बों पर
अपनी अपनी दावेदारी ठोंकते हैं
आते जाते तुम पर फिकरे कसते हैं
तुम और चिट्ठियाँ फेंकते हैं
तुम नजरें झुका कर चुपचाप आती जाती
तुम बस अपनी विद्या को सोचती हो तो क्या
वो फलाने की अम्मा ने तुम्हारी बदनामी कर दी तो?
कहाँ ब्याहेंगे फिर हम तुमको
पढ़ लिख कर क्या खोयी इज्जत कमा लोगी
इन्ही से व्यवहार है आगे का
तुम मेल क्यों नही बढाती कुनबे में
लो फिर भी दुल्हा ढूंढ लिया तुम्हारे लिए
बाबू ने
मेरी जिस पढाई को सरदर्दी बताते थे सब
उसी डिग्री के दम पर
शुक्र है कौमार्य भंग नही होने दिया अम्मा ने
समय पर मेरी कबड्डी बंद करवा दी
ट्रोफी नही मिली तो क्या
पति का विश्वास मिल गया
प्रमाण पत्र मिल गया
बहु के सच्चरित्र होने का
अब कौमार्य की चिन्दियाँ भी उड़ें तो
सबको गर्व होगा
तुम बाँझ नही हो
जल्दी बच्चा पैदा कर लो
तुम अपनी पैठ क्यों नही बनाती कुनबे में
रोज़ योनि का श्रृंगार
कहते हैं कुनबे वाले
पति के प्रेम में और खुबसूरत हो गयी हूँ
माँ हो गयी हूँ
फिर माँ हुई
फिर गर्भपात किया
मज़े मज़े के चक्कर में कुनबा नही बढ़ाना न
कमाई से ऊपर
पेट नही बनाना न
तुम भी नसबंदी क्यों नही कराती कुनबे में
तुम साडी पहना करो
भले वक्ष और नाभि देख कर
उस बूढ़े रिश्तेदार ने अकेले में तुम्हे धर दबोचना चाहा
तुम कुछ मत बोलना
चुप रहना वरना लोग क्या कहेंगे
तुम्हारा पति कहीं छोड़ देगा तो?
और हम भी उन्हें नही जताएंगे जो तुम्हे चखने की मंशा में थे
वो कुनबे के ठेकेदार जो हैं
हम उन्हें नही छोड़ सकते
हाँ तुमको भी नही छोड़ेंगे..मत डरो
पर उनके सामने तुमको नही बुलायेंगे
उनसे उनका अन्याय नही जताएंगे
जब आयेंगे घर
उन्हें चाय पानी करना
बस खुद को ढांक तोप के रहना
तुम उनसे बैठे हंसती बताती क्यों नही कुनबे में
मुझे नही रहना कुनबे में
मैं अकेली भली
हवा पानी भगवान सबको बराबर देता है
क्यों भला ...यह नही समझ आता
अगर भगवान पापियों का हवा पानी बंद करने लगे
तो पाप खत्म हो जायेंगे
मुझे भी मिल रहा है कुनबे के बाहर
ससुराल वाले एक तरफ गुट में हैं
छिनाल बोल कर उंगली उठाते हैं
मायके वाले पिछले जनम के पापों की सजा
मेरे जनम को अपना पाप बताते हैं
कुनबे के बाहर
जो नही जानते मुझे
कुछ नही कहते
सब्जी वाला सब्जी भी बेचता है
पंडित मन्दिर में प्रसाद भी देता है
मैं अब साड़ी नही पहनती
मैं अब बड़ी बिंदी और सिंदूर का दिखावा नही करती
पति दिन में लतियाता है
पर रात को खूब दुलराता है
पर अब शान्ति है
कुनबे से बाहर
जिन्दगी है
नियम कम हैं यहाँ
अनजानी दुनिया सबको अपना लेती है
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