सोमवार, 8 अगस्त 2016

बैरी_सावन


मन के दबे से दर्द जगाने
फिर से बैरी सावन आया।
सूना आँगन सूनी बगिया
माना नहीं है कोई घर में
यादें कहती मुझे बुलाकर
हम भी तो रहती हैं घर में

मायके की याद दिलाने
फिर से बैरी सावन आया।
थोड़ी सी मेहँदी लगवा लूँ
और पहन लूँ हरी चूड़ियाँ
साड़ी हरी, संग ले घेवर
और लगा लूँ माथे बिंदिया
सज कर चलूँ मायके अपने
मुझे बुलाने सावन आया।
फोटो के पास बैठकर कुछ
अपनी कहना,उनकी सुनना
थोड़ी देर बस् रूठना उनसे
और मनाने गले भी लगना
दूर बहुत ,पर है मेरे मन में
यही बताने सावन आया।
मन के दबे से दर्द जगाने
फिर से बैरी सावन आया।
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डॉ.भारती वर्मा बौड़ाई
फोटो क्रेडिट ::राकेश आनंद बौड़ाई 




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