मंगलवार, 30 अगस्त 2016

सोशल मीडिया : ख़बरों की चौपाल या फूहड़ झगड़ों का अड्डा ?





देश में मोबाइल का चलन जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उसी गति से इंटरनेट यूजर्स भी बढ़ते जा रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण है भारतीय जनमानस में सोशल मीडिया का प्रभाव।
आज भारत में 15 करोड़ से भी अधिक लोग सोशल मीडिया का प्रयोग कर रहे हैं, जिसका शहरी और ग्रामीण भारत के बीच अनुपात 4:1 का है।बड़ी-बड़ी कंपनियों से लेकर राजनीतिक दल, सरकार के विभिन्न मंत्रालय, प्रशासनिक और पुलिस विभाग भी सोशल मीडिया पर आ चुके हैं।
अखबारों और विभिन्न टीवी चैनलों के मशहूर पत्रकार, राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक और सिनेमा जगत की हस्तियां पहले से ही सोशल मीडिया पर हैं। इस तरह यह जनता के एक बड़े हिस्से, खासकर युवा वर्ग को बहुत जीवंत ढंग से आकर्षित करने वाला माध्यम बनकर सामने आया है।
खबर या अफवाह?

आज भारत के कुल इंटरनेट यूजर्स का 60 प्रतिशत हिस्सा इसके लिए मोबाइल पर निर्भर है। इनमें ज्यादातर लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय है। इस माध्यम पर युवाओं का वर्चस्व है। इसका एक बड़ा लाभ यह हुआ है कि सूचनाओं और संचार के लिहाज से दुनिया बहुत छोटी हो गई है और खबरों को नियंत्रित करने वाले मीडिया हाउसों और सरकार की दखलंदाजी रुक गई है।
समाचार को दबाना अब किसी मीडिया संस्थान या सरकार के बूते के बाहर की बात हो गई है। लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि सूचनाओं के अनियंत्रित अंबार ने खबर और अफवाह के अंतर को लगभग खत्म कर दिया है। आज हर कोई इस बात को लेकर सशंकित रहता है कि कोई खबर सच है या महज अफवाह?
सोशल मीडिया को लेकर समस्या यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि अपने विस्तार और प्रभाव की वजह से यह राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन के कैंपेन का भी बहुत बड़ा माध्यम बनकर खड़ा हुआ है। इसी वजह से सोशल मीडिया विचारधारा की लड़ाई का भी एक बड़ा अखाड़ा बन गया है।
यह वैचारिक लड़ाई जब तक बहस की सीमाओं में रहती है, तब तक तो ठीक, लेकिन जैसे ही यह अभद्र भाषा, अपशब्द, अनैतिक निंदा या व्यक्तिगत आलोचना और आरोप तक जाती है, सोशल मीडिया किसी सेमिनार हॉल से बदल कर चौराहे की पान की दुकान बन जाता है। साफ है कि तकनीकी परिवर्तनों के साथ हम मानसिक और बौद्धिक रूप से ऊपर नहीं आ पाए हैं। समाजशास्त्री विलियम एफ. आगबर्न ने इसको कल्चरल लैग (सांस्कृतिक पिछड़ापन) कहा है।
पिछले कुछ वर्षों में इस तरह की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ी है। आलम यह हो गया है कि सोशल मीडिया अदृश्य सैनिकों कीटुकड़ियों में बंटा नजर आता है, जिसमें सब अपने-अपने हथियारों से लैस खड़े हैं और कोई विरोधी नजर आते ही सभी उस पर टूट पड़ते हैं। वहां न तो तर्क होता है, न दूसरे के विचारों का सम्मान, न सीखने की लालसा और न ही सम्मानजनक असहमति।


कई बार तो मामला निजी स्तर पर जाकर गाली-गलौज और अश्लील कॉमेंट तक पहुंच जाता है, जिससे लोगों का सोशल मीडिया पर बने रहना मुश्किल हो जाता है। हाल में एक महिला छात्र नेता और पत्रकार पर अभद्र टिप्पणियों से हमला किया गया। उनकी प्रफेशनल लाइफ को निजी लाइफ से जोड़कर अपशब्द पोस्ट किए गए।
सामाजिक न्याय और पिछड़े व दलित लोगों के हित में सार्वजनिक रूप से अपना मत या विचार रखना, या उनके हक में आवाज उठाना भी आसान नहीं रह गया है। ऐसा करने वालों के खिलाफ संगठित रूप से निंदा या गाली अभियान चलाया जाता है। इससे कई बार संदेह होता है कि निहित स्वार्थ वाले समूहों ने बाकायदा कुछ लोगों को यह सब करने की नौकरी दे रखी है।
ऐसा नहीं है कि केवल बौद्धिक तबका ही इस तरह के आक्रमण का शिकार है। आज सोशल मीडिया पर मौजूद हर कोई डरा हुआ है कि पता नहीं उसकी किस पोस्ट पर किस तरह की प्रतिक्रिया आनी शुरू हो जाएगी। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लगभग उदासीन बना रहता है।
जो भी सक्रियता दिखाता है, उसको शाब्दिक अतिवादिता का शिकार होना पड़ता है। सूचना समाज के अतिविकसित दौर में आने के बाद भी हमारी चेतना बस इतनी है कि हम तर्कों में बात करने की बजाय गालियों से बात करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भले ही सोशल मीडिया को सीधे-सीधे सरकारी नियंत्रण में लेने के मंसूबे पर पानी फेर दिया हो, लेकिन आज भी ऐसे लोगों पर विभिन्न प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है, जो अपमानजनक टिप्पणी करते हैं, सार्वजनिक रूप से गाली पोस्ट करते हैं, महिलाओं के लिए अनुचित भाषा का प्रयोग करते हैं और किसी का नुकसान करने के लिए दुष्प्रचार करते हैं। लेकिन अभी तक इन प्रावधानों के तहत की गई कार्रवाइयों का विरोध ही हुआ है। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात के रूप में देखा गया।
सबकी जिम्मेदारी
निश्चित रूप से संविधान हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। यह वही स्वतंत्रता है जो प्रेस को मिली हुई है, पर अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने और इसका उपयोग किसी को आहत करने के लिए न करने की जिम्मेदारी भी हमारे ऊपर है।
जब तक हम अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे तभी तक हमारी स्वतंत्रता हमारी मुट्ठी में है, अगर हमने इसे स्वच्छंदता के रूप में लेना शुरू किया तो फिर हम अपनी आजादी खुद ही गंवा देंगे। अभी सोशल मीडिया का जो हाल हो गया है, उसे देखते हुए यह आशंका बढ़ गई है कि कहीं यह अपनी विश्वसनीयता खो न दे। वह समय वाकई खतरनाक होगा जब लोग इसे मजाक के रूप में लेने लगेंगे और इससे मुंह फेर लेंगे।

 लेखक: विनय जायसवाल



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