मंगलवार, 5 जुलाई 2016

कुछ मत चाहो दर्द बढ़ेगा ऊबो और उदास रहो- कैलाश बाजपेयी


कुछ मत चाहो दर्द बढ़ेगा
ऊबो और उदास रहो
आगे पीछे एक अनिश्चय एक अनीहा एक वहम
टूट बिखरने वाले मन के लिए व्यर्थ है कोई क्रम
चक्राकार अंगार उगलते पथरीले आकाश तले
कुछ मत चाहो दर्द बढ़ेगा
ऊबो और उदास रहो
यह अनुर्वरा पितृभूमि है
धूप झलकती है पानी
खोज रही खोखली सीपियों में चांदी हर नादानी
रहने दो विदेह वे सपने
बुझी व्यथा को आग न दो
कुछ मत चाहो दर्द बढ़ेगा
ऊबो और उदास रहो
तम के मरुस्थलों में तुम
मणि से अपनी यों अलगाए
जैसे आग लगे आंगन में
और बच्चा सोया रह जाए
अब जब अनस्तित्व की दूरी
नाप चुकी है विफलताएं
यहीं विसर्जन कर दो यह क्षण
गहरे डूबो सांस न लो
कुछ मत चाहो दर्द बढ़ेगा
ऊबो और उदास रहो

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