रविवार, 29 मई 2016

लघुकथा - सूकून



 
कुमार गौरव
मौलिक एवं अप्रकाशित

एक छुट्टी के दिन कोई पत्रकार कुछ अलग करने के ख्याल से जुगाड़ लगाकर ताजमहल में घुस गया ।
बहुत अंदर जाने पर उसे एक बेहद खूबसूरत औरत अपने नाखून तराशती हुई मिली । पत्रकार को आश्चर्य हुआ दोनों की नजरें मिली तो उसने पूछा " कौन से चैनल से हो । "
उसने बिना चेहरे पर कोई भाव लाये कहा " मैं यहीं रहती हूं । "
लडकी कुछ दिलचस्प लगी सो उसने कैमरा ऑन कर लिया और बात शुरु करी " कब से रहती हो यहाँ । "
"बहुत पहले ये बनने के कुछ दिनों बाद से ही । "
"अच्छा ये बताओ शाहजहां को तुमने देखा था कैसे थे । "


" हां बहुत करीब से उनमें वो सारी खूबियां थी की कोई उनको अपना महबूब बना ले । "
" तुम्हारे हिसाब से ताजमहल क्यूं बनवाया उनकी और भी तो बेगमें थी क्या वो उनसे प्यार नहीं करते थे । "
आह भरी उसने " हां सबसे प्यार करते थे लेकिन मैं चाहती थी की वो सिर्फ मुझसे प्यार करें इसी जिद में मैंने खाना पीना छोड दिया था और बीमार पड गई । आखिर में उन्होंने वादा किया की वो कुछ ऐसा करेंगे जिससे आने वाली नस्लें यही महसूस करेंगी की वो मुझसे बेपनाह प्यार करते थे । "
पत्रकार अचंभित रह गया " ओ मॉय गॉड आप मुमताज हैं । "
"हां मैं ही वो बदनसीब हूं जिसकी रूह इस इश्क की कब्रगाह में भटकती रहती है । "
"क्या कोई उपाय नहीं जिससे इस भटकती रूह को सूकून मिले "
बेसाख्ता खिलखिलाई वो " जब हर मर्द सिर्फ एक औरत का हमेशा के लिए हो जाया करेगा तब हर घर ताज होगा और शायद मेरी रूह को सूकून भी " कहकर वो एक चल दी ।
उसकी बात पर सोचते हुए उसने कैमरा उठाया तो देखा कैमरे के लेंस का शटर तो उठाया ही नहीं था ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें