शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

अटूट बंधन वर्ष -२ अंक -६ सम्पादकीय :समग्र जीवन की सफलता


समग्र जीवन की  सफलता

जब जानी थी
सुख –दुःख की परिभाषा
तब बड़ी ही सावधानी से खींच दिया था
एक वृत्त
सुख के चारों ओर
की कहीं मिल न जाए
सुख के चटख रंगों में
दुःख के स्याह रंग
और मैं एक सजग प्रहरी की भांति
अनवरत रही युद्ध रत
अंधेरों के खिलाफ
पर जीवन तो परिधि पर ही बीत गया

जिसकी रक्षा में रत
उसे भोगा कहाँ
इसलिए मुक्त कर  मन को
तोड़ दी है परिधि 
पड़ गए हैं सुख के चटख रंगों में
स्याह राग के छींटे
पर मन
अब शांत है , सहज है
क्योंकि ,यही तो जीवन है
                           सुधा और अरुण पति –पत्नी हैं | दो बच्चों का  छोटा सा सुखी परिवार |  इस छोटे से घर , टी वी वाशिंग मशीन व् तमाम सुख सुविधायें हैं | जो अरुण की छोटी तनख्वाह के बस में नहीं थीं | अरुण ने सब कुछ लोन पर ले लिया | उसका उदेश्य सिर्फ परिवार  को खुशियाँ देना नहीं था | वो चाहता था उसके दोस्तों व् उसकी पत्नी की सहेलियों के बीच उनकी  नाक सबसे  ऊँची रहे |पर लोन की मासिक क़िस्त  भरने के कारण अरुण की तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है | थोड़े से पैसों में बच्चों की छोटी –छोटी माँगे   अधूरी रह जाती हैं | खाने –पीने और  बच्चों की सेहत से कई बार समझौता करना पड़ता हैं | नयी साड़ी  न खरीद पाने के कारण सुधा कई बार मुहल्ले के कार्यक्रमों में नहीं जा पाती  है | क्योंकि वहाँ  कपड़ों से इंसान की औकात तय की जाती है | सुधा  और अरुण कई बार पछताते हैं की  सब कुछ जल्दी पा लेने ही होड़ में लोन न लेकर धीरे –धीरे बचत कर के लेते तो शायद ये आभाव न लगता |
      रितेश व् दीपा दोनों बड़ी कम्पनी में कार्यरत हैं | ऊँचा  ओहदा , ऊँचा  वेतन , घर में ऐशो आराम की सब चीजे सब कुछ है , नहीं है तो बस समय | खुद के लिए ,  एक दूसरे के लिए , बच्चों के लिए | कभी कभी रितेश को अपनी माँ याद आती है |जब वो अल सुबह एक एक फूल चुन कर भगवान के लिए माला बनाया करती थी व् उनके सुरीले भजन से उनकी आँख खुलती थी | अब तो कभी वो या  कभी दीपा,” हे भगवान दो मिनट लेट हो गया” कहते हुए उठते हैं | आया के हाथों पला एकलौता बेटा कब माँ की लोरी का इंतज़ार करते –करते ड्रग्स के चंगुल  में फंस गया पता ही नहीं चला | उन्हें कभी कभी लगता है जैसे सब कुछ पा के भी खाली हाथ हैं |
          नर्सरी की टीचर रोहन की माँ को बुला कर कहती हैं | पिछले ३ दिन से  रोहन स्कूल नहीं आया | क्या बात है आप रोहन का फ्यूचर स्पॉइल कर रही हैं | निकिता जी को बेटी का फ्यूचर  बनाने की जरूरत से ज्यादा चिंता है | वह ७ साल की बेटी के स्कूल से घर आते ही उसका होम वर्क कराती हैं | फिर स्वीमिंग क्लासेज में ले जाती हैं | फिर ट्यूशन पढने भेजती हैं | ट्यूशन  से आने बाद डांस क्लासेज में  | खाना खिलाते समय जब निकिता को नींद के झोंके आने लगते हैं तो उसकी मम्मी उसे जगा –जगा कर आज के सब पाठ याद कराती हैं | ७ साल की बच्ची के पास खेलने का समय नहीं है | पर माँ को अभी भी फ़िक्र है उसकी, जो सीखने से  छूटा  जा रहा है | जिंदगी की दौड़ में निकिता को विजेता कैसे बनाये |
                 आज के युग का नारा है | जिंदगी एक दौड़ है | दौड़ो विजेता बनों | हम सब जीतने आये हैं | तारे जमीं पर का एक गीत मुझे याद आ रहा है , “ दुनिया का नारा जमे रहो , मंजिल का इशारा जमे रहो | और हम सब बेतहाशा भाग रहे हैं |फिर  भी सब में खाली पन है अकेला पन है | जो भीतर ही भीतर हर किसी को खाए जा रहा है |  ये अनकंट्रोल्ड ट्रैफिक ही दुर्घटनाओं का कारण बनता है | दुर्घटनायें शारीरिक , दुर्घटनायें मानसिक और दुर्घटनायें सामाजिक | आज हर दिन अख़बार में आत्महत्याओं , रोड रेज की घटनाएं पढने को मिलती हैं | आज जब ऐसे साइकोपैथ लोगों की संख्या बढ़ गयी है जिनके  अपने ही बच्चे  व् परिवार के सदस्य दिन –रात वर्बल ऐब्युज़ का शिकार होते रहते हैं | आज अनेक घटनाएं सफलता के युग में मानवता को आदिम युग तक पीछे छोडती प्रतीत होती हैं |  चाहे वो घर में अपने बेटे के साथ क्रिकेट  खेलते डॉ नारंग की उनके बेटे के सामने की गयी नृशंस  हत्या हो , बॉयफ्रेंड का छल झेलती आनंदी उर्फ़ प्रत्यूषा  बनर्जी की आत्महत्या हो या माँ - बाप के झगड़ों से आजिज़ आ व्हाट्स एप पर अपने दोस्तों को जिंदगी और मौत के मेसेज भेज कर आत्महत्या करने वाला वो नन्हा बच्चा हो  | और क्यों न हो ऐसे घटनाएं , जब सफलता की दौड़ में जीतना ही सब कुछ है , और नंबर वन बनना ही धेय्य तो  ‘एव्री थिंग इस फेयर इन  लव एंड वार’  का नारा लगाते समाज में एक दूसरे की टांग खीच कर लंगड़ी  मार कर आगे बढ़ जाना स्वाभाविक है |
                      एक भगदड़ मची है | सब को भागना है |क्यों दौड़ रहे हैं पता नहीं |  मंजिल कहाँ है कई लोगों  को यह भी पता नहीं | पर भागना है | रुको नहीं भागो | मुझे बरबस लियो टॉलस्टाय की कहानी “ हाउ मच लैंड ए  मैं डज नीड “ याद आ रही है | कहानी का नायक जब’ जितना भाग लोगे उतनी जमीन तुम्हारी ‘का नियम सुनता है , तो बेतहाशा भागने लगता है | थोडा और थोडा और ... साँस फूलने लगती है | पर आगे की जमीन तो और उपजाऊ है , वो और भागता है | वो इतना भागता है की अन्तत : उसकी मृत्यु हो जाती है | कब्र खुद जाती है और उसके हिस्से जमीन आती है मात्र ६ फुट २ इंच | आज यही तो हमारे साथ हो रहा है |  एक –एक मिनट कीमती है | पल –पल तनाव बढ़ रहा है | जो धीरे –धीरे हमें मृत्यु की ओर ले जा रहा है | विडंबना ही है की जब हम चाँद छूने ही जा रहे होते हैं | अगले ही पल भोर हो जाती है और सूरज की तपिश से हमारे हाथ जल जाते हैं | आज बरबस कभी कहीं पढ़ी कुछ लोकप्रिय पंक्तियाँ याद आ रही हैं |
फूल मत डालो
कागज़ की तरी मत तैराओ
खेल में तुमको पुलक उन्मेष होता है
लहर बनने में सलिल को क्लेश होता है |
         सकारात्मक सोच सफल जीवन का मूल मन्त्र है | पर कहीं न कहीं मेजोरिटी ने इसे बहुत नकारात्मक तरीके से ले लिया है | हम सब में प्रतिभा है हम सब यहाँ सफल होने आये हैं | ये विचार हमारे मन में लहर का निर्माण करने लगता है | यह पढ़ते सुनते हम सब सोच में पड़ जाते हैं | अपने अन्दर  टेलेंट हंट शुरू हो जाता है | शांत जिंदगी बेचैन भी हो जाती है | हम सब अपने को सिद्ध करना चाहते हैं | हम उन  क्षेत्रों में अपनी क्षमता झोंक देना चाहते हैं जिनमें हमें कभी सफल होना ही नहीं है | लाख बताया जाए की काम से प्यार करो पर प्रतिभा की परिभाषा हमने नाम और पैसा मान ली है | हर कोई  गायक , अभिनेता , लेखक, डॉ या इंजिनीयर  बनना चाहता है |खेल से प्यार है पर सिर्फ क्रिकेट से ....हर कोई क्रिकेट का खिलाडी बनना चाहता है हॉकी का क्यों नहीं | या ये जबरदस्ती शोहरत और पैसे के क्षेत्रों में प्रतिभा ठूंस ठूंस कर भरने की नाकामयाब कोशिश है | अपच होना लाजिमी है | इसीलिए सफलता की दौड़ में भागते लोगों में से एक खासी भीड़ निराश , हताश कुंठित लोगो की तैयार हो रही है | अगर महिलाओ की बात करें तो समाज में धीरे – धीरे हाउस वाइफ शब्द गाली जैसा लगने लगा है | यह माना जाने लगा है हॉउस वाईफ मतलब कुछ न करना | किसी ख़ास मार्ग को चुन कर उस पर जबरदस्ती अपने को सिद्ध करने के लिए  चलना प्रतिभा की गलत परिभाषा है | ये सच है की अंधकार  में कौन रहना चाहता है |  पर ये जड़ की प्रतिभा है , जो वो अंधकार  में रह कर पौधे को साधती है | धरती की प्रतिभा ये है की वो सूरज के चारों  और चक्कर लगा सकती है | एक आध्यात्मिक व्यक्ति को संसारी दौड़ में लगा दिया जायेगा तो उसको आनंद नहीं आएगा | उसकी प्रतिभा  सुदूर गिरी कंदराओ में आध्यात्मिक उन्नति करने में है |  और समाज को उसकी भी जरूरत है | वो भी महत्वपूर्ण है | किसी अज्ञात शायर का एक खूबसूरत शेर सच बयाँ करता है |
तामीरे कायनात को गहरी नज़र से देख
वो जर्रा कौन सा है जो की  अहम् नहीं     
                  एक महात्मा  के पास एक निराश , हताश लड़की जाती है वो कहती है ,” मेरा जीवन भी कोई जीवन है | मैं जल्दी से जल्दी दूर उस घाटी में जाना चाहती हूँ जहाँ सुंदर फूल खिले हैं | चिड़िया चह्चहा  रही हैं | महात्मा कहते हैं कुछ पल तो यहाँ रुको | पर वो हठ  करती है | उसे जल्दी पहुँचना  है बहुत जल्दी | महात्मा उसे मार्ग बता देते हैं पर वादा करवाते हैं की तुम वहाँ  पहुँच कर एक बार पीछे मुड़  कर जरूर देखना | लड़की भागते –भागते वहाँ  पहुँचती है | जब पीछे मुड़  कर देखती है तो पीछे  यहाँ से भी ज्यादा सुन्दर फूल खिले हुए होते हैं | जिनके लिए भागी थी वो अब बौने प्रतीत हो रहे हैं | दरसल जब उसने भागना शुरू किया था तब वहाँ जमीन में  बीज दबे हुए थे | जो समय के साथ स्वयं ही अंकुरित हो गये | परन्तु वो लड़की तो उस स्थान को छोड़ चुकी थी |  जीवन के वृत्त पर भागते हुए हम दो सिरे कभी नहीं पकड सकते | केवल भागना और जीतना ही महत्वपूर्ण नहीं है | महत्वपूर्ण तो सफ़र है | सफ़र में किनारे उगे पेड़ नहीं देखे | बिजली का चमकना  नहीं देखा , फूलों और बारिश का आनंद  नहीं लिया तो जिए ही कहाँ | महत्वपूर्ण तो यह भी है की हम क्या पा रहे हैं और क्या खो रहे हैं | या किस कीमत पर पा रहे हैं | सफलता के मार्ग पर चलना अच्छी बात है पर जीवन में संतुलन बनाना ज्यादा आवश्यक है | समाज खुद मानकों के एक फ्रेम में कसा हुआ है  | और हम भी खुद को उसी फ्रेम में कसे हुए हैं | दोनों एक दूसरे को निकलने नहीं दे रहे हैं |  आखिर समाज हमीं  से ही तो बनता है | जिस तरह सफलता , सफलता सफलता कह कर एक भगदड़ मची है | वो सफल लोगों से दोगुनी रफ़्तार से निराश , हताश कुंठित लोगों की फ़ौज खड़ी कर रही है | गिरती हुई मानवीय संवेदनाएं इसका परिणाम हैं | आध्यत्मिक गुरुओ के पास भीड़ लगी है | क्या अचानक से समाज इतना आध्यात्मिक हो गया है या इतना कुंठित हो गया है की किसी तरह से उसे स्ट्रेस से बचने के लिए इन शिविरों में जाना पड़ रहा है | जिस तरह से सामाजिक संवेदनाओ का हास  हो रहा है उससे तो दूसरा कारण ही सही  प्रतीत होता है |अगर आध्यात्मिक तरीके को ही माने तो हम सब के अन्दर आत्मा है | जो आनंद स्वरुप है | वो एक निश्चित फ्रीकुएन्सी पर स्पंदन कर रही है | जो एक विशेष  काम की तलाश में है | यह ही शायद वो  प्रतिभा है जिसके साथ हमें भेजा गया है | इसी क्षेत्र में किये गए काम में हमारा आनंद छिपा है | अन्यथा एक तड़प, एक अधूरापन  एक खोज जारी रहता  है |
                    अंत में एक अच्छे जीवन के लिए सफलता जरूरी है | पर केवल नाम और पैसे के पीछे भागते हुए किसी क्षेत्र विशेष में जबरदस्ती अपनी प्रतिभा सिद्ध करने की आकांक्षा रखना  निराशा और कुंठा का कारण बनता है | आनंद, भगदड़ में नहीं काम को करने में होना चाहए | जरूरी है अपनी प्रतिभा को पहचानना उसे स्वीकार करना , चाहे वो जड़ बनकर घर के पौधे को साधना हो , या नेता बन कर देश को साधना हो, हो   | जिस काम को कर रहे हैं उसे नाम पैसे की हाय हाय से न जोड़कर उस काम को करने का आनंद लेना है | जरूरी यह भी  है की काम और परिवार के बीच संतुलन स्थापित कर सफ़र का आनंद  लेना | यही समग्र जीवन की सफलता है |

एक कोशिश है ...... कर के देखते हैं ... 
वंदना बाजपेयी 

              

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