मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

महावीर जयंती पर विशेष - मिच्छामी दुक्कड़म - आत्म शुद्धि का द्वार


आज महावीर स्वामी की जयंती पर हम जैन धर्म के की एक विशेष परंपरा के बारे में बात कर रहे हैं | ये परंपरा है ... क्षमा मांगने की और क्षमा करने की | हम कितनी ही प्रेरक कथों में पढ़ते हैं की जब तक हम अतीत के बोझ को सर पर लिए हुए चलते हैं तब तक जीवन में आगे नहीं बढ़ा जा सकता | पर कहीं न कहीं हम सब इसे लेकर चलते हैं | अतीत के बोझों में जो बोझ सबसे भरी होता है वो होता है कही सुनी बातों का बोझ | जाने अनजाने हम कितनी बातों से आहत होते रहते हैं , या किसी दूसरे को आहात करते रहते हैं इसका स्वयं हमें भी पता नहीं होता | पर जीवन पर्यंत ये बाते अपने सर पर लिए रहते हैं जो शूल की तरह चुभती रहती है | फिर आत्म उन्नति हो कैसे जब अतीत खींच रहा हो | बस एक छोटी सी क्षमा मांगने और देने से सब कितना आसान हो जाता है | जैन धर्म के अनुयायी एक ऐसा ही पर्व मानते हैं जिसे पर्यूषण पर्व कहते हैं | पर्यूषण पर्व , जैन धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है. श्वेताम्बर जैन इसे 8
दिन तक और दिगंबर जैन 10 दिन तक मनाते हैं . इस दौरान लोग पूजा, अर्चना, आरती, समागम, त्याग, तपस्या, उपवास आदि में अधिक से अधिक समय व्यतीत करते हैं .
इस पर्व का आखिरी दिन क्षमा वाणी दिवस  के रूप में मनाया जाता है जिसमे हर किसी से “ मिच्छामी दुक्कड़म ” कह कर क्षमा मांगते हैं .
“ मिच्छामी दुक्कड़म ” का शाब्दिक अर्थ है , “ जो भी बुरा किया गया है वो फल रहित हो ” ‘ मिच्छामी’ का अर्थ क्षमा करने से  और ‘ दुक्कड़म ’ का बुरे कर्मों से है. अर्थात मेरे बुरे कर्मों के लिए मुझे  क्षमा कीजिये .
ये सॉरी  कहने जैसा नहीं है , सॉरी तो हम हर दूसरी बात में बोल देते हैं; ये उससे कहीं बढ़ कर है , क्योंकि यहाँ क्षमा ह्रदय से और हर तरह की गलती के लिए मांगी जाती है, फिर चाहे वो शब्दों से हुई हो या विचारों से , कुछ करने से हुई हो या अकर्मण्य बने रहने से , जानबूझकर की गयी हो या अनजाने में। …. किसी भी प्रकार से यदि मैंने आपको कष्ट पहुँचाया है तो मुझे क्षमा करिए …. मिच्छामी दुक्कड़म।
कितनी अच्छी चीज है ये …एक ऐसा दिन जब आप दिल से हर किसी से अपनी गलतियों के लिए क्षमा याचना करते हैं . आप ये नहीं देखते हैं की सामने वाला कौन है , आपसे बड़ा है या छोटा ,उसका ओहदा क्या है …यहाँ तो बस आप अपने अहंकार  को ख़त्म करते हैं और क्षमा मांगते हैं .ऐसा करना निश्चित रूप से हमारी आत्मा को शुद्ध बनाता है , एक सुकून सा देता है , दिल पर रखा बोझ ख़त्म करता है और संबंधों को प्रगाढ़ बनाता है | ये आत्म शुद्धि का द्वार है | जिसके बाद ही साधक कोई कदम आगे बाधा पाता है | 
सरिता  जैन 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें