गुरुवार, 24 मार्च 2016

होली , होली ... आखिर हो ली






होली अपने आप में एक ख़ास पर्व है | होली रंगों का त्यौहार है और इस त्यौहार में सारे गिले शिकवे भूल कर सब स्नेह के रंगों में रंग जाते हैं पर इस बार की होली विशेष रूप से ख़ास रही |कारण होली से कुछ दिन पहले ही ये विवाद उठा की होली २३ को है या २४ को | जिससे पूंछो  वो अपनी कहानी बताता | अपने एरिया के पंडित के द्वारा दिए गए ज्ञान को पूरे जोश खरोश के साथ  बघारता | तर्क से सिद्ध करता | हाल ये हुआ की कई दिन तक फोन की घंटियाँ इसी बात पर घनघनाती रहीं की होली कब की है ? पर कोई एक उत्तर नहीं मिला |
                                                      कहतें हैं पुरे २३७ साल बाद ऐसी स्तिथि बनी है | पर हाल यह हुआ की सरकारी छुट्टी २४ को होने के बावजूद भी कुछ शहरों में होली २३ को मनाई गयी और कुछ में २४ को | भ्रम की स्तिथि के कारण एक ही शहर के ही कुछ मुहल्लों में २३ को होली मनी व् दुसरे में २४ को | महिलाओं  में आम चर्चा का विषय था  उनके मायके में किसी दिन होली मनी  व् ससुराल में किसी दिन | सबसे ज्यादा बुरी स्तिथि उन की थी जो बहुत पहले से  होली का  दिन परिवार के साथ मानाने के लिए रिजर्वेशन कराये बैठे थे , पूर्व नियोजित योजना के अनुसार जब घर पहुंचे तो पता चला होली तो हो ली | 
                                                 होली कब की है की उधेड़बुन के बीच कहीं न कहीं मुझे इस बात की कमी खली की क्या होली से पहले किसी एक दिवस पर सामूहिक रूप से मतैक्य नहीं हो सकता था |   त्यौहारों का जितना धार्मिक महत्त्व है उतना ही सामुदायिक महत्त्व भी है | मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है , वो अकेलेपन से घबराता है | पर आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मेरा घर मेरे बच्चे तक सीमित रहना उसकी आवश्कता नहीं विवशता है | पर त्यौहार हमें हमारे समाज से जुड़ने का अवसर देते हैं | इसी बहाने एक दूसरे का हाल -चाल लेते हैं और दूर रहने वाले रिश्तों की कड़ी फिर से जुड़ जाती है || सामुदायिक भावना का उदय होता है | पर इस बार २ दिन होली मनने के कारण  हर किसी ने कहीं न कहीं खुद को किसी टुकड़े से अलग पाया | 
                                                                      हमें कारण तलाशने होंगे | किसी एक तिथि पर एकमत न होने का कारण चाहे ,सोशल मीडिया द्वरा जरा से भ्रम को हवा देना हो ,   छोटे बड़े ज्योतिशाचार्यों  द्वरा अपनी -अपनी बात को तर्क या कुतर्क से ही सही सिद्ध करने की प्रवत्ति हो , या समुदाय को छोटे -छोटे टुकड़ों में बांटकर किसी एक टुकड़े की अगुआई करने की लालसा हो | कारण  चाहे कुछ भी हों हमें कारण तलाशने होंगे | इन त्योहारों के माध्यम से समाज को एक सूत्र में जोड़ना केवल  मना लेने की प्रवत्ति से कहीं ज्यादा महवपूर्ण है |

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