रविवार, 14 फ़रवरी 2016

अटूट बंधन वर्ष -२ अंक -४ सम्पादकीय -नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत न करियो कोय





नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत न करियो कोय .............

शायद ,बहुत पीड़ा से गुज़रता होगा प्रेम
जब –जब हम सिद्ध करते होंगे
उसकी उपस्तिथि
किसी पिज़्ज़ा हट में
किसी महंगे टेडी बीयर में
या किसी दिल के आकार के खिलौने में
लेने और देने में
तब –तब शायद , बहुत याद करता होगा प्रेम
किसी  तुलसी को
जो स्वेक्षा से बन जाते  है दास
किसी राधा को
जो छोड़ देती है हर रंग
या किसी मीरा को
जो अपना एक तारा लेकर
दीवानी बन निकल पड़ती हैं जगलों में

शायद , बहुत समझाता होगा प्रेम
की मात्र शब्द नहीं हैवो  मिलन या जुदाई में प्रयुक्त
की दर्द के पार जा कर ही
खिलते हैं असली प्रेम पुष्प
जहाँ एकात्म भाव में
मूल्यहीन हो जाता है
पाना  और खोना  
            वसंत ऋतु आस और उल्लास की ऋतु , जब धरती भी शीत ऋतु में पहना हुआ स्वेत कफ़न उतार कर हरित वस्त्र धारण करती है| समस्त वसुंधरा सुनहरे पीले पुष्पों  के आभूषणों से खुद का श्रृंगार कर लेती है तो मन मयूर कैसे न नाचे | आदिकाल से वसंत ऋतु प्रेम की ऋतु के रूप में मनाई जाती रही है | मौसम भी इन मानवीय भावों को उकसाता है | नृत्य का गीत का अनुराग का एक आल्हादित या उन्मादित करने वाला वातावरण बन जाता है | प्रेम गीतों की स्वर लहरियां हवा में गूँजने  लगती हैं | इसी बीच में आता है प्रेम का आयातित त्यौहार “वैलेंटाइन डे “ | प्रेम के लिए प्राण देने वाले एक संत की शहादत दुनिया भर के प्रेमियों में मन में अपने प्रेम को अभिवक्त करने का , उसे खुल कर स्वीकार करने का एक साहस दे  गयी | कुछ लोग इसे नए ज़माने का प्रेम कह कर संबोधित करते हैं | पर अगर वास्तव में प्रेम है तो वह प्रेम एक भाव है , एक मिठास जो नए  या पुराने ज़माने की नहीं होती | जो सदा से थी है और रहेगी | कहने सुनने का अभिव्यक्ति का माध्यम भले ही बदला हो पर प्रेम की यह सरिता अनवरत बहती रहेगी और हृदयों को सींचती रहेगी |
                         प्रेम शाश्वत है फिर भी प्रेम की ऋतु में प्रेम विषय पर  मैं क्या लिखने जा रही हूँ मुझे स्वयं ही नहीं पता | बड़ा ही विरोधाभास है मेरे मन में | क्यों ? क्योंकि मेरी आँखों के सामने रह रह कर दो दृश्य तैर रहे हैं | एक तरफ  लाल रंग के गुब्बारे , टेडी बीयर , दिल के आकार के खिलौने लिए युवा जो नशे में धुत आई लव यू , आई लव यू चिल्ला रहे होंगे |जश्न मना रहे होगे |  वही दूसरी तरफ इक  तारा लिए बेचैन मीरा जो जो तडफ –तडफ कर गा रही हैं ,” नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत न करियों कोय “ | कृष्ण की आराधिका कृष्ण की उपासिका मीरा जिनके बारे में कहा जाता है की उन्हें कृष्ण साक्षात् दिखाई देते थे | उनके साथ कृष्ण खाते –पीते सोते थे | मीरा की ये तड़प इस तरह सचेत करना कहीं न कहीं यह दर्शाता है जिसे हम प्रेम कहते हैं प्रेम की परिभाषा उससे कहीं अलग ,कहीं अनूठी होगी | हम सब ने अपने जीवन में  प्रेम किया है या मात्र उसका स्पर्श किया है या हम सब प्रेम की पहली पायदान पर ही खड़े हैं |  कहना मुश्किल है |
                 वास्तव में हम सब जिसे प्रेम खाते हैं वो प्रेम है ही नहीं|  वो हार्मोन का उतार चढाव है | प्रकृति का एक रासायनिक षड्यंत्र | जो स्त्री पुरुष को एक दूसरे की तरफ धकेलता हैं | क्योंकि उसे अपने को जीवित रखना है अपनी व्यवस्था चलानी है | जब तक यह रसायन काम करता है प्रेम का बुखार सर पर चढ़ा रहता है | रसायन कम होते ही बुखार उतर जाता है | विवाह भी एक व्यवस्था है |  जहाँ लेने और देने का व्यापार है | तुम मुझे ये ये ये दोगे  तो मैं तुम्हे वो वो वो दूँगी | तभी तो विवाह में  मंत्रोच्चार द्वारा ऊर्जा को बाँध कर मन को बाँधा जाता है | इसमें  जन्म –जन्मान्तर का बंधन विकल्प रहित करने की व्यवस्था रही है | जिससे समाज सुचारू रूप से चलता रहे | परन्तु यहाँ भी देने और लेने की तुला में पलड़े बराबर न होने पर विरोध उत्पन्न होता है | एक शोषित व् एक शोषक बन जाता है | प्रेम के बंधन में प्रेम कब खत्म हो जाता है और बस बंधन ही रह जाता है | पता ही नहीं चलता | मुझे महादेवी वर्मा की पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती हैं ...
“ क्या इससे भी कम होगी मेरे प्राणों की ब्रीड़ा
 तुमको पीड़ा में ढूंढा , तुममें ढूंढूंगी  पीड़ा “
                     जिसे हम प्रेम कहते हैं वह वास्तव में यही है | जब तक नहीं मिला तब तक पाने की बेचैनी जब मिल गया तो दो दिन में जी भर गया | आरोप –प्रत्यारोप शुरू हो गए | प्रेम न हुआ कोई बच्चे का खिलौना हो गया | तभी तो ज्यादातर प्रेम विवाह असफल हो जाते हैं | पाते ही आकर्षण क्षीण होने लगता है | आस –पास वालों की नज़र में विद्रोह करते वक्त जो हीरो बनने की भावना थी वो समाप्त होने लगती है | साथी के दोष दिखने लगते है | प्रेम अदालतों के चक्कर लगाने लगता है |प्रेम , जिसको समझने में ऋषि मुनियों ने अपना पूरा जीवन लगा दिया | जिसको पाने वाले अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं|  वो प्रेम किसी मेकडोनाल्ड के रेस्ट्रोंन में बैठ कर बर्गर खाते हुए आई लव यू कहने जितना हल्का तो नहीं हो सकता | पर हमने इसे हल्का समझ रखा है |हल्का बना रखा है |
     अंग्रेजी में प्रेम के लिए एक बड़ा ही खूबसूरत वाक्य प्रयोग किया जाता है ,” फाल इन लव “ अगर इसका हिंदी अनुवाद करें  तो “ प्यार में गिर पड़ना  “यानी प्रेम में आदमी न बैठ सकता है न खड़ा रह सकता है बस गिर सकता है | ये गिरना मामूली गिरना नहीं है | यह गिरना मैं का गिरना है , अहंकार का गिरना है | थोडा सा मिटना है ताकि दूसरे के लिए स्थान खाली हो सके | जहाँ मेरा कुछ न रहे जो कुछ है सो तेरा का भाव उत्पन्न हो जाए | हमारे देश में जितने भक्त हुए हैं उनके आगे दास लगाने की परंपरा रही है जैसे सूरदास , तुलसी दास | जहाँ व्यक्ति सहज ही दास बन जाता है | पर दास बनना  इतना स्वाभाविक नहीं हैं | खुद पर दूसरे का पूर्ण अधिकार स्थापित करने के लिए अहंकार का समूल नाश जरूरी है | प्रेम मिटने की प्रक्रिया है बनने की नहीं | इसी लिए पीड़ा दायक है , कष्टप्रद है | इस मिटने के बाद ही आनंद  मिलता है जहाँ दो हैं ही नहीं | बस एक है | राधा और कृष्ण की तरह | दर्द के एक आग के दरिया को पार करने के बाद ही यह संभव है |
प्रेम हमें दूसरे के रंग में रंग देता है पर प्रेम का रंग क्या होगा यह कहना मुश्किल है | रंगों का विज्ञान हमें समझाता है की रंग वस्तुओं में नहीं प्रकाश में होता है |  हमें जो वस्तु जिस रंग की दिखाई देती है वह उस रंग को छोडती है | बाकी सब रंगों को अपने पास रख लेती है केवल उस रंग को छोडती है | कोई वस्तु हरी दिखाई देती है वो  बाकी सारे रंग अवशोषित ( अपने अन्दर समाहित ) कर लेती है और जो रंग परावर्तित ( छोडती ) है हमें उस रंग की दिखाई पड़ती है | नीली वस्तु नीला रंग , लाल वास्तु लाल रंग का त्याग करती है | अगर यही सिद्धांत चिर नूतन चिर शाश्वत राधा –कृष्ण के प्रेम पर लगाये तो राधा का रंग श्वेत है वो कृष्ण मय हैं वो अपने जीवन में हर रंग का त्याग कर देती हैं | पूर्ण समर्पित प्रेमिका जिसके जीवन में सिर्फ कृष्ण हैं और कोई रंग नहीं | हर रंग उनसे टकराकर लौट जाता है | कोई रंग असर नहीं डालता | कृष्ण स्याम हैं वो हर रंग अपनाते हैं | अच्छा बुरा , दुखी , सुखी | इसलिए वो  ईश्वर हैं | शायद यही प्रेम का रंग है | या सब कुछ छोड़ दो , या सब को अपना लो | दोनों में मैं टूटेगा ही टूटेगा | या मेरे अन्दर सब या सब के अन्दर मैं | प्रेम जब जब व्यक्ति से समष्टि की ओर बढा  | प्रेम विशाल हो गया | प्रेम राधा हो गया , प्रेम श्याम हो गया | प्रेम ईश्वर हो गया |
              आज बहुत प्रेम प्रेम चिल्लाया जा रहा है | क्योंकि असली प्रेम का सर्वत्र आभाव है | यह जो कुछ भी महज आकर्षण है | हर कोई प्रेम चाहता है| पर  देना नहीं , लेना | समाज साक्षी है  जब –जब हमारे जीवन में कोई कमी होती है हमें वह ही दिखाई पड़ता है | हम उसी को चाहते हैं | भूखा रोटी चाहता है | गरीब धन चाहता है , बीमार व्यक्ति स्वास्थ्य चाहता है | प्रेम का आभाव है इसलिए सब प्रेम –प्रेम चिल्लाते हैं | चाहते सब हैं | देता कोई नहीं | सब भिखारी हों तो दे  कौन | यह आभाव निरंतर बढ़ता जा रहा है | इसलिए हर कोई दुखी है | उसे लगता है उसके जीवन में कंमी है | आभाव है | कोई विरला ही उसे पा पाता  है | जो पा लेता है वह न केवल स्वयं तृप्त होता है बल्कि छलकाता भी है |
                      प्रेम महज शब्द नहीं  है | जिसे हम यूँही इस्तेमाल कर देते हैं | प्रेम एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है | दो उर्जाओ  का एक हो जाना एक न्यूक्लीयर फ्यूजन , एक विस्फोट | बहुत कुछ टूटना तब नया बनना |  प्रेम की पहली पर्त  बहुत लुहावनी होती है | जिसकी ओर व्यक्ति आकर्षित होता है | दूसरी बहुत सख्त होती है | जिस पर कदम रखते ही व्यक्ति वापस पलट जाता है | सहन नहीं कर पाता है | पल –पल पीड़ा बढती है | तभी तो मीरा चेतावनी देती हैं,” नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत न करियो कोय “| और सच्चे प्रेमी के उसे पार करते ही पूर्ण आनंद की स्तिथि आ जाती है | जहाँ प्रेमी और प्रेमिका में एकात्म भाव स्थापित हो जाता है | जहाँ खोना और पाना मूल्यहीन हो जाता है | तभी कृष्ण की मृत्यु का समाचार सुन कर राधा हंसते हुए कहती हैं ,” पगले कृष्ण गए कहाँ हैं , वो कहाँ जा सकते हैं ... वो तो पत्ते –पत्ते में हैं , पुष्प –पुष्प पर हैं , कण –कण में हैं |
            जिन्हें सुख भोगना है उनके लिए प्रेम चॉकलेट हैं , टेडी बीयर हैं , गिफ्ट्स हैं , वैलेंटाइन डे है , आई लव यू का उद्घोष है | जो पहली सतह  पर आते ही धूमिल हो जाएगा |
परन्तु जिनको आनंद की आकांक्षा है उन्हें दर्द की पर्त को  पार  करना ही पड़ेगा | जहाँ सिर्फ देने का भाव होगा | तभी प्रेम व्यक्ति से समष्टि की और चलेगा | प्रेम विशाल होगा | प्रेम अमर होगा |     वंदना बाजपेयी 
कार्यकारी संपादक 
'अटूट बंधन '
राष्ट्रिय हिंदी मासिक पत्रिका 

            

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