शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

अटूट बंधन वर्ष -२ अंक -२ सम्पादकीय

                 



जीतनें के लिए चाहिए जोश और जूनून  
दिसंबर का महीना , साल का  आखिरी महीना | समय के वृक्ष पर २०१५ कि पीली  पत्तियाँ झड़ने को और २०१६ कि नन्हीं हरी कोंपलें उगने को तैयार हैं | आगत के स्वागत के उत्साह  में दबे पांव चलता  रहता है  बीते वर्ष का आकलन | क्योंकि शाश्वत जीवन में कुछ भी आखिरी नहीं होता न पल , न दिन , न वर्ष , न ही यह जन्म | हर आखिरी एक बुनियाद बनता है नए की | चाहे वो पल हो , दिन हो या जीवन | उसी बुनियाद पर रखी जाती है नए कि नींव | इसीलिये हमारे पूर्वज समझा गए हर पल का महत्व है | मैं  भी बीते वर्ष के लाखों पलों का हिसाब  करना  चाहती हूँ |  मुझे लगता है जैसे मैं  एक विशाल सागर के तट पर खड़ीं हूँ और स्मृतियों कि लहरे आ कर मेरे मानस  को भिगो कर लौट रहीं हैं |मैं चुन लेती हूँ हूँ कुछ पलों के मोती |

             एक  लहर आती है  बहुत सारी स्मृतियाँ “ अटूट बंधन “ के जनवरी अंक  की  लेकर | पिछले साल जनवरी की कडकडाती ठंड में  “ अटूट बंधन “ का तीसरा अंक ‘हौसलों की  उड़ान’ | जिसके पन्ने पन्ने पर बिखरी थी उन लोगों कि  गाथाएं जिन्होंने जिन्होंने भाग्य के  , दुखों के , असफलताओं के आगे कभी हार नहीं मानी और हर हार को जीत में बदल दिया | ये अंक अटूट बंधन का तीसरा अंक था | जो दो अंकों (बाल और बेमेल  विवाह ) के बाद पूर्व नियोजित दिशा में ही  अस्तित्व में आया था | पर उस अंक को मिली अभूतपूर्व सराहना के बाद हमें अहसास हो गया कि प्रेरणादायक  विचारों और दिशा देते साहित्य को पाठक कितनी व्याकुलता से खोज रहे हैं  | यह प्रेरणादायी अंक हमारे लिए प्रेरणा बन गया | “ अटूट बंधन परिवार कृत संकल्प हो गया कि वो पत्रिका को पॉजिटिव  थिंकिंग का महा अभियान बना कर लोगों के दिलों से न सिर्फ निराशा का अँधेरा दूर करेगा अपितु आशा और सफलता का दीप भी प्रज्वलित करेगा |  
              एक बार पथ निश्चित हो जाने के बाद  हमने निराशा के पथ पर अटूट बंधन का सकारात्मक दीप जला दिया |  लोग भले ही अटूट बंधन को पत्रिका कहे , हमारे लिए वो एक दीपक है | दीप का काम ही है प्रकाश देना | दीप चाहे अपने लिए जलाया जाए या दूसरे के लिए | उसका  प्रकाश एक स्थान पर नहीं रहता वो पूरे  पथ का अंधियारा दूर करता है | वो निश्चिंत  जलता रहे , प्रकाश फैलाता रहे उसके लिए हम तेल बन कर जलते रहे | निरंतर , अनवरत ... बिना रुके बिना थके | जब दुनिया पाने,  और पाने कि राह पर चल रही है ऐसे दौर में खुद जल कर रौशनी देने का अपना ही आनंद  है | पर कब तक ? तेल सीमित था |  लोगों ने इस त्याग को समझा , स्वेक्षा से आगे आये , और दीपक को जलाये रखने में हमारी मदद  की | अटूट बंधन परिवार बना और बढ़ा | ? ये अलग तरह का संघर्ष था |पर एक जुटता की  ताकत से सफ़र आसान  हो गया |
                 धीरे –धीरे समय का काफिला आगे बढ़ा | हम हर अंक को बेहतर और बेहतर बनाने के प्रयास में लगे रहे | हमारी दिशा तय थी | हमने क्वांटिटी के स्थान पर क्वालिटी को चुना | एक –एक रचना का चयन इस प्रकार किया कि पाठक जब कुछ पढ़े तो उसे यह न लगे कि उसके साथ धोखा  हुआ है | हालांकि  सुंदर  कवर में धोखा अनेक पत्रिकाएँ देती रही हैं | यही शायद उनकी अल्पायु का कारण बनता है | हजारों –लाखों रुपये प्रचार प्रसार में लगाने के बाद भी वही पत्रिकाएँ  अपना स्थान बना पाती हैं जिनके कंटेंट या विषय वस्तु में दम हो  | कठोर चयन कि यह प्रक्रिया हमने अटूट बंधन के ब्लॉग में भी जारी रखी | और उसी के अनुसार पाठकों की  तरफ से सकारात्मक परिणाम आने लगे | पाठकों के स्नेह व् प्रशंशा भरे इ मेल चिट्ठियां , मेसेज हमारी अनमोल निधि हैं |
                         
                          अटूट बंधन कि कितनी सारी स्मृतियाँ जीवित होते हुए मन पहुँच गया “ अटूट बंधन सम्मान समारोह -२०१५ पर | जब अटूट बंधन एक वर्ष पूरा कर के नए वर्ष में प्रवेश कर रही थी तो हमने सोचा कि जिस तरह से हमने संघर्ष करके विजय हासिल करी है उसी तरह ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने विपरीत परिस्तिथियों कि परवाह न करते हुए अपनी जीतने कि इक्क्षा  अपनी जिजीविषा को जीवित रखा और हजारों असफलताओं को झेलने के बाद अंतत : सफल हुए | हमने  देश भर के ११ लोगों को चुना जिन्होंने अपने –अपने क्षेत्र में  विशेष योगदान दिया है |  उनको सम्मानित करने का उद्देश्य महज़ इतना था कि हम उस संघर्ष को सम्मान दें जो लोगों के लिए प्रेरणादायक  है |
             करीब ३ घंटे चले सम्मान समारोह कि हजारों स्मृतियाँ मेरे जेहन में अंकित हैं | पर एक स्मृति जो मेरे लिए सबसे अनमोल है वो है कार्यक्रम कि मुख्य अतिथि मैत्रेयी पुष्पा  जी का सानिध्य | वो जिन्हें आप पढ़ते रहे हों , जिसका लेखन मन को छूता  हो , यह लगता हो हो कि जैसे मेरे ही मन की बात कह  दी | अपने प्रिय लेखक/ लेखिका  के रूबरू होने का मन हर पाठक का होता ही है |  आज मैत्रेयी पुष्पा जी साहित्याकाश में सबसे दैदिपय्मान  सितारा है | वो न जाने कितनी महिलाओं की  रोल मॉडल  हैं | उनको करीब से देखना , सुनना किसी सपने के पूरे होने जैसा है | महिलाओं के विषय में कही गयी उनकी एक –एक बात मुझे अपने  दिल कि बात लगी | जब मैत्रेयी पुष्पा  जी कहती है कि, “  एक स्त्री ही स्त्री कि शक्ति है |  एक स्त्री कि मौजूदगी दूसरी स्त्री में सुरक्षा का अहसास दिलाती है |क्योंकि घर के बाहर काम करने के लिए सुरक्षा स्त्री कि बुनियादी जरूरत है | “  तो  न जाने अतीत कि कितनी लहरें मेरे मानस से आकर टकरा जाती हैं | जब बचपन में दादी नानी के किस्सों के बीच  मन ढूंढता रहता था  कि इन्हीं पिछली  पीढ़ी कि महिलाओं  में से  वो कौन सी स्त्री होगी जिसने उस परमपरागत स्त्री के साँचें  को तोड़ कर पढने की इक्क्षा  जताई होगी |शायद वह अपनी कक्षा में अकेली महिला होगी | उसने बहुत से ताने अपमान सहे होंगे पर उसी ने द्वार खोला स्त्री शिक्षा का | और बाद में स्वाबलंबन का |
                                          स्त्री हो या पुरुष , बच्चा हो या बड़ा सफलता कि कामना सभी करतें है पर कहीं न कहीं कुछ कमी रह जाती है | असफलता मन को तोड़ देती है |  अटूट बंधन के उद्गम से ले कर एक वर्ष पूरा करने तक का सफ़र अटूट बंधन परिवार के लिए बहुत  सफल रहा |आज जब अनगिनत नयी पत्रिकाएँ कुछ महीनों में ही दम  तोड़ देती हैं या संयुक्तांक निकालने लगती हैं | ऐसे में अटूट बंधन का लोकप्रिय पत्रिका के रूप में स्थापित हो जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है | सफलता अपने साथ जिम्मेदारियां लेकर आती है | लोगों कि अपेक्षाओं  पर निरंतर खरे उतरते रहें |  यह हमारा प्रयास है | यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है | पॉजिटिव थिंकिंग का महाअभियान होने के कारण बहुत से लोग अटूट बंधन परिवार  से  सफलता का रहस्य पूँछतें हैं |क्यों न पूँछे ? पाठकों के साथ एक अटूट बंधन जो बन गया है |  क्षेत्र कोई भी हो , सभी सफल हों यही अटूट बंधन का उदेश्य है  और हम इस दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं | सफलता के लिए सबसे जरूरी है जोश व् जूनून | दरसल कई बार लोग छोटी –छोटी असफलताओं के आगे हथियार डाल  देते हैं और सफल व्यक्ति के प्रति दुराग्रह पाल लेते हैं | पर एक सच्चाई  जो कोई भी सफल व्यक्ति कह सकता है वह यह  है कि , “ ३६५ रातें हमने भी देखी  हैं”  | उनकों झेला है , समझा है कि  हर रात यह सन्देश ले कर आती है कि ये आखिरी नहीं है | इसके बाद फिर दिन निकलेगा , फिर सुबह होगी , चिड़ियाँ चह्केंगी | वास्तव में आखिरी कुछ भी नहीं होता | हर आखिरी बस समय कि दीवार में एक ईंट होती है जिस पर हम सपनों का महल खड़ा कर सकते हैं |  हर छोटा कदम महत्वपूर्ण होता है | अगर किसी व्यक्ति के मन में सफल होने की आकांक्षा है तो उसे असफलताओं से घबडाकर जब अपना रास्ता बद्लनें  या छोड़ने का मन करे तो दो पल  ठहरकर यह जरूर सोचना चाहिए कि आखिरकार वो अभी तक इस रास्ते पर चल क्यों रहा था | निर्विवाद सत्य है कि हम जब आधे रास्ते से पीछे लौटते हैं तो हम उतने ही कदम चल कर मंजिल तक पहुँच सकते थे | यहीं अपने मार्ग पर स्थिर रह कर सफलता पाने का सूत्र भी है |बिना संघर्ष झेले कोई भी सफल नहीं हुआ है |  
                    मुझे याद आता है पिताजी एक अंग्रेजी कहावत कहा करते थे , “ रोलिंग स्टोंस गैदर्स नो मार्क्स “| आप जिस भी क्षेत्र में प्रयासरत हैं निरंतर उसी में लगे रहिये | देर सबेर सफलता आपकी परीक्षा लेना बंद कर ही देगी | चर्चिल का एक वाक्य मुझे याद आ रहा है , “ जब आप नरक से गुज़र रहे हों तो भी चलते रहिये | चलते रहने से बाधाएं अपने आप पार हो जाती हैं | जब हम कील ठोंकते हैं तो कई प्रहार व्यर्थ जाते हैं पर अंतत : किसी एक प्रहार में कील ठुक ही जाती हैं | कई बार हम उस आखिरी प्रहार से पहले ही हिम्मत हार जाते हैं | विजय से ठीक पहले पराजय स्वीकार करलेते हैं | हम भूल जातें हैं कि खरगोश और कछुए कि रेस में जीत आज भी कछुए कि ही होती है | जीत दौड़ कर सुस्ताने से नहीं , छोटे ही सही पर निरंतर प्रयासों का नतीजा है | हमारे  पास पूर्वजों का दिया हुआ बहुत कुछ संग्रहित  ज्ञान है  है जो हमें सीखना है , सिखाना है | यह सिलसिला चलते जाना है |
                                                                    किसी की भी  सफलता का एक कारण यह भी है कि उसका  उदेश्य कितना बड़ा और व्यापक है | जितना बड़ा उदेश्य होगा उतनी ही सफलता  को पाने कि इक्क्षा बलवती होगी | विफलता क डर अपने आप समाप्त हो जाएगा | उदाहरण के तौर पर मैं एक वाकया  साझा करना चाहूंगी  जो मेरी हिंदी कि अध्यापिका हम सब को बताती थी वो हमेशा यह कहती थी कि अगर आप किसी सड़क पर जा रहे हैं कोई इंसान आप को अच्छा लगता है आप उससे बात करना चाहते हैं पर संकोच वश कि “वो मेरे बारे में क्या सोचेगा”  आप आगे नहीं बढ़ते | परन्तु जैसे ही आप किसी को लडखडाते , गिरते  हुए देखते हैं आप तुरंत उसे उठाने  पहुँच  जाते हैं | तब आप को कोई संकोच नहीं लगता | दोनों ही परिस्तिथियों में आप  और अजनबी समान थे फर्क सिर्फ आपके उदेश्य में था | जब भी हम कोई बड़ा उद्देश्य रखते हैं हम निसंकोच उस में अपनी  पूरी  ताकत लगा देते हैं |  
                यहाँ  खाम ख्याली नहीं वरन क्रूर यथार्थ चलता है | अक्सर हमें पता  होता है कि सफलता कितनी दूर है पर हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहते | हम शतुरमुर्ग की  तरह अपना सर जमीन में घुसा कर अपने को तसल्ली देते रहते हैं कि सब ठीक है | यह तसल्ली ही हमारी सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है | ऐसे समय अब हमारा दिल और दिमाग अलग अलग बोल रहा होता है तब दिमाग कि सुनने वाले ही आगे बढ़ते हैं | विपरीत परिस्तिथियों से लड़ कर विजेता बनने  के स्थान पर हम उन्हें अपने ऊपर हावी होने देते हैं और अंतत:  हार जाते हैं | जरूरी है की  विपरीत परिस्तिथियों में समस्या को दूसरी तरह से देखा जाए | जैसा की  एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने किया था | युवा  स्टीव जॉब्स ने अपने पिता के गैराज में एप्पल कंपनी कि स्थापना की |  जो दस साल में २ बिलियन  डॉलर व् दो लोगों से बढ़कर ४०० लोगों कि  कंपनी बन गयी | तभी उन्हें कंपनी से निकाल दिया गया | स्टीव जॉब्स वह पहले व्यक्ति थे जिन्हें अपनी ही बनायीं हुई कंपनी से निकाल दिया गया | दरसल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर कि मीटिंग में उनका प्रतिद्वंदी जिसे स्वयं उन्होंने ही नौकरी पर रखा था से किसी विषय पर विवाद हो गया | सारे लोग उसके पक्ष में हो गए | और जॉब्स को अपनी ही कंपनी  से अपमानित करके  निकाल दिया गया | ऐसे समय में जॉब्स ने हिम्मत नहीं हारी | दूसरी कंपनी बनायी | उसे एक साल में इतना शक्तिशाली बनाया कि एप्पल  को उसका  अधिग्रहण करना पड़ा | और स्टीव जॉब्स वापस एप्पल में आ गए | स्टीव जॉब्स का कहना था अगर आप को अपनी प्रतिभा और क्षमता पर विश्वास है तो आप समस्या को दूसरी तरह से देख सकते हैं |
                   अगर आप सफलता कि चाह रखतें हैं तो आपको  यह स्वीकार करना पड़ेगा कि  सफलता के  लिये आपको अकेले ही चलना होगा। आजतक इस दुनिया मेँ जितनेँ भी महापुरूष हुए हैँ, सबके सफलताओँ की शुरूआत अकेले ही हुई है। यहाँ आपको जितानें  के लिये कोई दुसरा नहीँ आयेगा, आपको खुद का साथ चुनना होगा। मंजिल आपके ठीक सामने है इसलिये अभी से आपको अपनेँ कदम बढानें होंगे । आप बेकार में  पीछे मुड़कर मत देखिये |  भले ही अभी कोई आपके साथ नहीँ हो पर वो दिन भी दूर  नहीँ जब दुनिया आपकी मुट्ठी मेँ होगी। जैसा की मुंशी प्रेम चन्द्र रंगभूमि में लिखते हैं , “ सफलता अत्यंत सजीवता  होती है और विफलता में असहय अशांति “|  इसीलिये अभी अकेले ही आपको आगे बढ़कर जीतना होगा। यह समझना होगा कि कि हर किसी को ईश्वर ने कुछ ख़ास बना कर भेजा है | यह जिँदगी आपको सिर्फ समय काटनेँ के लिये और सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनने के लिये ही नहीँ मिली है। इसलिये परिंदों की तरह  स्वतंत्र होकर जिँदगी जीनी है ।जैसा कि मैत्रेयी पुष्पा जी ने दूर्दाशन में  एक साक्षात्कार में कहा था , “ शुरू में कोई साथ नहीं देता , पर आप अपने मार्ग में अविचल आगे बढ़ते जाइए कारवाँ जुड़ता जाएगा | “
                                        सफलता के मार्ग में सकारात्मक  विचारों का बहुत योगदान है | स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि , “ तुम जो कुछ सोचोगे, तुम वही हो जाओगे, यदि तुम अपने को दुर्बल समझोगे, तो तुम दुर्बल हो जाओगे। वीर्यवान सोचोगे तो वीर्यवान बन जाओगे। हमारे विचार ही हमें सफल असफल बनाते हैं | विचारों में गज़ब कि चुम्बकीय शक्ति होती है वह अपने सामान परिस्तिथियों  को खींच कर ले आते है | जिसे सफलता कि कामना है उसे निराशा के स्थान पर सदा सफलता के विचार मन में लाने चाहिए | सफलता के विचार मन में हिम्मत और जोश भरतें  हैं और अंतत : सफलता का मार्ग प्रशस्त  करतें हैं |
            कहीं और ढूँढने   कि जरूरत नहीं स्टुअर्ट ने तो सफलता का मूलमंत्र ही दे डाला  “ स्टे हंगरी स्टे फुलिश “ | जैसा कि सब जानते हैं  जब आप के अन्दर किसी चीज को प्राप्त करने कि भूख होगी तभी वो चीज आपको मिलेगी | अन्यथा आधी अधूरी ही मिलेगी |  जिस क्षेत्र में काम कर रहे हैं उसमें ज्यादा से जयादा सीखने कि इक्क्षा  होनी चाहिए | जितना सीखेंगे उतना ही निखार आएगा |  स्टे फुलिश का सीधा सादा अर्थ है दुस्साहस | जब आप किसी काम को करने का दुस्साहस करतें जो कि असंभव सा जान पड़ता हो | ऐसे में आप एक बार असफल भले हों पर हर बार नया सीखतें हैं और इतिहास रचतें हैं | जैसा कि अटूट बंधन के प्रधान संपादक ओमकार मणि त्रिपाठी का कथन है , “ अटूट बंधन एक पत्रिका नहीं एक स्वप्न दृष्टा का दुस्साहस हैं | “ सफलता दुस्साहस का परिणाम ही तो होती है |सफलता के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक ये दुस्साहस या जूनून होता है |
                      अंत में  सफलता के बारे में इतना ही कहना चाहती हूँ कि  कोई भी, चाहे वो व्यक्ति  हो या संगठन उसकी कामयाबी के पीछे बहुत सारे लोगों का हाथ होता है। जो कई रूप में हमारे सामने होते हैं जैसे- शिक्षक, माता-पिता, प्रशंसक, साथी , सहकर्मी  , सलाहकार, मित्र , रिश्ते नातेदार , जीवनसाथी।जैसा की मैंने  शुरू में कहा था कोई भी सफलता या विफलता अंतिम  नहीं होती बस यह एक पड़ाव होता है जिसके आगे जाना है| जहाँ प्रतीक्षा रत हैं  नयी राहे और नयी मंजिल |  आइये पुन: आशा विश्वास के साथ, पूरे  जोश –खरोश  के साथ सफलता के मार्ग पर एक कदम और  उठाये| साथ ही तय कर लें कि है आप में वो जोश , वो जूनून ...
एक कोशिश है .... करके देखतें हैं ..
वंदना बाजपेयी 


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