शनिवार, 5 दिसंबर 2015

अटूट बंधन सम्मान समारोह -२०१५ एक रिपोर्ट

कल रविवार हिंदी भवन में हिंदी मासिक पत्रिका “ अटूट बंधन “ ने सम्मान समारोह – २०१५ का आयोजन किया | कार्यक्रम की मुख्य अतिथि सुविख्यात लेखिका व् साहित्य एकादमी दिल्ली की उपाध्यक्ष श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी थी व् मुख्य वक्ता अरविन्द सिंह जी( राज्यसभा टी. वी ) व् सदानंद पाण्डेय जी ( एसोसिएट एडिटर वीर अर्जुन ) थे | श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी ने सरस्वती प्रतिमा के आगे दीप जला कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया | उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि एक स्त्री ही स्त्री की शक्ति हैं | उन्होंने आगे कहा कि ये पुरुष प्रधान समाज की सोंच है की ,” एक स्त्री दूसरी स्त्री को पसंद नहीं करती हैं , या नीचा दिखाने का प्रयास करती है , उनमें परस्पर वैमनस्य होता है | वास्तविकता इससे बिलकुल उलट है | एक स्त्री दूसरी स्त्री का दुःख बहुत अच्छी तरह से समझ सकती है व् बाँट सकती है |
मैत्रेयी पुष्पा जी ने महिला सिपाहियों के सामने दिए गए अपने भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि जब वो विद्यार्थी थी व् बस से स्कूल जाया करती थी तो स्त्री होने के नाते उन्हें जो कष्ट , ताने , अपमान सहने पड़ते थे उसे वो मौन होकर झेलने को विवश थी | रास्ते में एक थाना पड़ता था | दिल करता था बस से कूद कर वहां उस दुर्व्यवहार की शिकायत करे परन्तु पुरुष पुलिस कर्मियों के दुर्व्यवहार के किस्से उन्हें भयभीत करते थे | अगर कोई महिला पुलिस कर्मी वहां होती तो वह जरूर बस से उतर कर थाने जाती और बस उससे लिपट कर रो लेती | न वो कुछ कहती न वो कुछ सुनती पर सारा दर्द बिना कहे सुने बयाँ हो जाता |
अपनी बात पर जोर देते हुए श्रीमती पुष्पा ने कहा कि हर क्षेत्र में महिलाओ का आगे आना जरूरी हैं क्योंकि ये दूसरी महिलाओ को सुरक्षा का अहसास दिलाता है | उन्होंने ख़ुशी जाहिर की संपादन के क्षेत्र में आज महिलाएं आगे आ रही हैं | पर अभी और महिलाओं को आगे आना चाहिए | ये अभी तक स्त्रियों के लिए वर्जित क्षेत्र था | इस क्षेत्र में महिलाओं का आगे आना पुरुष संपादकों द्वारा महिला रचनाकारों के शोषण को रोकेगा | जिससे उनकी लेखनी मुखर हो सकेगी | उन्होंने आगे कहाँ की साहित्य जीवन की शिक्षा देता हैं | व्यक्ति डाक्टर हो सकता है , इंजिनीयर हो सकता है , पर जिसने साहित्य नहीं पढ़ा उसने जीवन को नहीं पढ़ा |
पत्र –पत्रिकाओं के विषय में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक पत्रिका को रचनाकार मिल सकते हैं , बहुत प्रयास से उसका प्रचार –प्रसार भी किया जा सकता है ,परन्तु अगर उसकी विषय वस्तु में दम नहीं होगा तो पाठक नहीं मिलेंगे | जिसक पत्रिका की विषय वस्तु में दम होगा उसे पाठक ढूंढ – ढूंढ कर पढेंगे | रचना ठोस व् सत्य आधारित होनी चाहिए फिर चाहे उसमें आधुनिक जीवन शैली का वर्णन हो या लोक का | उन्होंने इस दुष्प्रचार का विरोध किया कि लोग हिंदी पढना नहीं चाहते हैं | सच्चाई ये है कि लोग हिंदी साहित्य को पढना चाहते हैं , पर भ्रामक प्रचार से दूर हो रहे हैं | इसके लिए स्कूल , कॉलेजों में कविता कहानी की कार्यशालायें लगाने पर बल दिया |
मुख्य वक्ता अरविन्द कुमार सिंह जी ने कहा कि जो साहित्य के क्षेत्र में उतरता है वह सरस्वती की सेवा के लिए उतरता है , वहां धन कमाने की अभिलाषा नहीं होती | उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का उदहारण देते हुए बताया कि ,”द्विवेदी जी ने सन १९०२ में पत्रिका निकालने के लिए अपनी नौकरी छोड़ी थी | तब वो मुश्किल से २० रुपये अपनी धर्म पत्नी को घर खर्च के लिए दे पाते थे | साहित्य एक साधना है , उन्होंने अटूट बंधन परिवार के सभी सदस्यों की इस साधना में तल्लीन होने की भूरी –भूरी प्रशंसा की | श्री सदानंद पाण्डेय जी ने कहा कि निराशा जीवन को दिशा हीन कर देती है | ऐसे में ऐसे विचारों का आगे आना बहुत आवश्यक है जो व्यक्ति में आशा का संचार कर सके | उन्होंने आशा जतायी कि आज मीडिया में जिस तरह से कर्मठ , योग्य , शिक्षित लोग आगे आ रहे हैं उससे लोगों में अच्छे विचारों का प्रचार –प्रसार होगा |
कार्यक्रम में ११ व्यक्तियों को सम्मानित किया गया इसमें मदर टेरेसा पब्लिक स्कूल पुणे के संस्थापक व् प्रिंसिपल मैथ्यूज रोजेवेला को “अटूट बंधन योग रत्न “, नेत्र चिकित्सक डॉ . अर्चना परवानी को “अटूट बंधन नारी रत्न” , लवली पब्लिक स्कूल दिल्ली की संस्थापक व् प्रिंसिपल डॉ . एस डी मलिक को ‘अटूट बंधन शिक्षा रत्न “,बांकेलाल यादव पुणे को “ अटूट बंधन व्यापार रत्न “, महेश अग्रवाल, हैदराबाद को “अटूट बंधन प्राणी मित्र रत्न” , अरविन्द गाँधी , उत्तर प्रदेश को “ अटूट बंधन समाज सेवा रत्न” , स्ट्रेट तो बाज़ार के संथापक ऋषभ चुग व् ३ नव युवाओं को “अटूट बंधन नव उद्धम रत्न” , डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक पिथौरागढ़ ,उत्तराखंड को” अटूट बंधन साहित्य रत्न ( पुरुष वर्ग ) “, नॉएडा की डॉ . छवि निगम को “अटूट बंधन साहित्य रत्न ( महिला वर्ग )” , श्री योगेश त्रिपाठी , उत्तर प्रदेश को “ अटूट बंधन मीडिया रत्न “, दिल्ली के छात्र अक्षत शुक्ला को “ अटूट बंधन बाल रत्न “से सम्मानित किया गया | इस अवसर पर अटूट बंधन के प्रधान संपादक श्री ओमकार मणि त्रिपाठी जी , कार्यकारी संपादक श्रीमती वंदना बाजपेयी जी व् प्रबंध संपादक श्रीमती रेनू चुग जी भी उपस्तिथ थी |
अटूट बंधन के प्रधान सम्पादक श्री ओमकार मणि त्रिपाठी जी ने भीड़ भरे हाल में अपने ह्रदय के उदगार व्यक्त करते हुए कहा कि ये पूंजीपतियों कि पत्रिका नहीं है बल्कि स्वप्न दृष्टा का दुस्साहस है | उन्होंने कहा कि वो पत्रकारिता जगत में पिछले २० साल से हैं और उन्होंने हजारों पत्र -पत्रिकाओं को उदय होते व् अस्त होते देखा है | वो जानते थे कि पत्र -पत्रिकाएँ निकालना आसान नहीं हैं इसमें ढेर सारी पूँजी , समय व् ऊर्जा कि जरूरत होती है | परन्तु फिर भी जब उन्होंने अपने चारों ओर निराश -हताश समाज को देखा तो उन्होंने ये दुस्साहस करने का मन बना लिया | उनका स्वप्न महज इतना था की एक ऐसी पत्रिका आये जो समाज को दिशा दे सके, उसमें धन कमाने के उदेश्य से अश्लीलता न परोसी गयी हो अपितु वो ऐसे पत्रिका हो जिसे परिवार के सब सदस्य साथ -साथ बैठ कर पढना पसंद करे , जिसे स्कूल कि लाइब्रेरी में रखवाया जाए , जो पढने के बाद पाठक कुछ पल ठहर कर सोचे कि उसे कुछ मिला है | श्री त्रिपाठी जी के अनुसार ये काम बहुत दुष्कर था | पर जब कोई समाज हित में स्वप्न देखने कि हिम्मत करता है तो उसे अपने जैसे जुनूनी स्वपन दृष्टा मिल ही जाते हैं |
उन्होंने गदगद ह्रदय से बताया कि इस पत्रिका कि नीव रखी गयी थी तब मात्र ५ सहयोगी साथ आये जिन्होंने आजीवन सदस्यता ली | क्योंकि किसी पत्रिका को चलाने के लिए पूँजी बहुत बड़ी आवश्यकता है इसलिए उनके यह योगदान मनोबल बढाने में सहायक हुआ | फिर इसके बाद लोग जुड़ते गए और अटूट बंधन परिवार बढ़ता गया | आज अटूट बंधन पत्रिका देश के १८ राज्यों के १५० से अधिक बुक स्टाल पर जा रही है और बिक रही है | उन्होंने उत्साहित होकर कहा किसी नयी पत्रिका के संपादक के लिए वो दिन अविस्मर्णीय होता है जब कोई अनजान व्यक्ति फोन कर के कहे कि आप कि पत्रिका इतनी अच्छी लगी कि मैं अपने २ रिश्तेदारों कि भी सदस्यता लेना चाहता हूँ | अक्सर लोगों के मसेज व् फोन कॉल आते हैं जो बार -बार यही कहते हैं कि , ” अटूट बंधन प्रचलित पत्रिकाओ से अलग है जिसे पढने के बाद भी पाठक उसके उच्चस्तरीय लेखों में उलझा रहता है , चिंतन करता रहता है व् नए समाज के निर्माण कने में अपने योगदान को उत्सुक हो जाता है |
श्री त्रिपाठी जी ने दुःख जताया कि कई छोटी पत्रिकाएँ मात्र फेस बुक पर ही पत्रिकाएँ निकाल कर रचनाकारों को लोकप्रिय होने का भ्रम उत्पन्न कर रही हैं वही यह उन लोगों के लिए जो तन मन धन से समर्पित हैं एक झूठी प्रतियोगिता में खड़े दिखने का स्वांग रच रही हैं | श्री त्रिपाठी जी ने अपनी टीम के सदस्यों कि भूरी -भूरी प्रशंसा करते हुए कहा कि , ” अटूट बंधन टीम का हर सदस्य अवैतनिक है , ये सब वो लोग हैं जो पत्रिका के लिए दिन रात मेहनत मात्र इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह चाहते हैं कि लोगों तक ऐसी पत्रिका अवश्य पहुंचे जो उनके जीवन में उजास भर दे | उन्होंने आगे कहा कि आगे भविष्य में उनकी टीम का विचार है कि अगर यह पत्रिका कभी लाभ कि स्तिथि में आई तो इस पत्रिका से प्राप्त धनराशी को सामाजिक कार्यों में व्यय किया जाएगा| उनके अनुसार यह एक तरह कि समाज सेवा है जिसमें लोग स्वत : ही जुड़ते जा रहे हैं |
अंत में उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को सम्मानित करने का उद्देश्य महज इतना है की जिन्होंने भी किसी क्षेत्र में अच्छा काम किया है , लोग उनके जीवन से प्रेरणा ले सके | उन्होंने स्पष्ट किया कि अपने -अपने क्षेत्र में विशेष उपलब्धियां हासिल करने वाले इन ११ लोगों को सम्मान प्रदान करने में हम स्वयं सम्मानित हो रहे हैं |
अटूट बंधन की कार्यकारी संपादक श्रीमती वंदना बाजपेयी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा आज जब वो पीछे पलट कर देखती हैं तो याद आता है वो दिन जब आज से ठीक एक वर्ष पहले अटूट बंधन परिवार के सपनों के गर्भ में अटूट बंधन का नन्हा सा शिशु आकार ले रहा था | तब से लेकर आज जब अटूट बंधन एक लोकप्रिय पत्रिका के रूप में स्थापित हो चुकी है , हर दिन एक नए संघर्ष का दिन था , हर रात एक नए संघर्ष की रात थी | किसी पत्रिका का अपने उद्भव के पहले वर्ष में ही एक लोकप्रिय पत्रिका के रूप में स्थापित हो जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है | और यह चमत्कार था अटूट बंधन परिवार के अथक एकजुट प्रयास का |
उन्होंने इसे विरोधाभास बताया कि जब सपने साकार हो जाते हैं तो संघर्ष के दिन सपनों से लगने लगते हैं |उनके अनुसार वो शायद इसलिए भी की पत्रिका की मुख्य विषय वस्तु ही पोजिटिव थिंकिंग का महा अभियान है |जिसका ध्यान इस तरफ था की निराशा एक सार्वभौमिक बीमारी है | जो बच्चे को बड़े को अच्छे को बुरे को किसी को भी घेर लेती है | निराशा अकेले आती है पर बहुत कुछ ले जाती है | एक निराश विद्यार्थी , परीक्षा में सफल नहीं होता | एक निराश रोगी जल्दी ठीक नहीं होता , एक निराश समाज काम में मन नहीं लागता और एक निराश देश सफलता की पायदाने नहीं चढ़ पाता | उन्होंने प्रश्न किया कि जब सब निराश हो तो सर्वे भवन्तु सुखिन , सर्वे सन्तु निरंमाया का भारतीय उद्घोष कैसे गूंजे ?
उनके अनुसार अटूट बंधन ने जड़ पर प्रहार करने की सोची व् मिथक के प्रतीको से शिक्षा ली कि हम सब के अन्दर एक हनुमान छिपे है ,जो दुखों के असफलताओं के , रोगों के विशाल सागर के आगे निराश बैठे जिन्हें स्वयं अपनी प्रतिभा का क्षमता का पता नहीं है | सब को चाहिए एक जामवंत जो उन्हें बस इतना अहसास दिला दे “ हां तुम कर सकते हो | सकारात्मक विचार वही जामवंत हैं जो इंसान को उसकी शक्ति का अहसास करा देते हैं जिससे वो सफलता के शिखर को छू सके | श्रीमती बाजपेयी ने जोर देकर कहा की अटूट बंधन का प्रयास महज इतना है की अच्छे साहित्य व् सकारात्मक विचारों द्वरा हर किसी में वो जोश , वो जूनून भर दे की व्यक्ति अपनी प्रतिभा की उच्चतम पायदान हांसिल कर सके |
अंत में उन्होंने सभी से अपील करते हुए कहा कि , ” हमने ये मशाल जलाई जरूर है पर थामनी आप सब को है | तभी निराशा का अँधेरा दूर होगा | उन्होंने एक एक पुराने गीत ……… “ एक अकेला थक जाएगा मिल कर बोझ उठाना “ के बोल याद दिलाये और उम्मीद जतायी , जिस तरह से अटूट बंधन परिवार बना और लोग स्वेक्षा से तन .मन धन से आगे आये , व् हमारा परिवार बढ़ता रहा | आगे भी लोग जुड़ते रहेंगे और ये कारवां इसी तरह बढ़ता रहेगा |

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